प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यकाल के पहले साल में महिला सशक्तिकरण, मेक इन इंडिया और आम आदमी के विकास पर बल
दिया था। अगर पूरे एक साल पर चर्चा की जाए, तो
न तो महिला सशक्त हो पायी, मेक
इन इंडिया से इंडिया का भला हो पाया और ना ही आम आदमी को चैन नसीब हैं।
एनडीए
सरकार ने महिलाओं के हक में बजट के दौरान बहुत सी घोषणाएं की थी। महिलाओं पर
होने वाले अपराध रोकने के लिए 1,000
करोड़ का निर्भया फण्ड बनाया गया था। महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने
बलात्कार पीड़ितों के लिए 660
ऐसे सेंटर बनाने का ऐलान किया था। पर पैसे की कमी के चलते अब सिर्फ़ 36 ऐसे सेंटर खोले जाएंगे। ये सेंटर पीड़ित
महिला को मेडिकल मदद, क़ानूनी
जानकारी, शेल्टर
इत्यादि देने के लिए बनाए जाने थे।
पर
ऐसे सेंटर चाहे 36
बने या 360
क्या महिलाओं पर हो रहे अपराधों को रोकने में सक्षम होंगे? आये दिन महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों
की ख़बरें आती रहती हैं। केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार महिलाओं को उनके सशक्त
होने का विश्वास नहीं जगा पायी।
26 जनवरी 2015
की गणतंत्र परेड इस बार महिला सश्क्तिकरण को समर्पित थी और अमेरिका के
राष्ट्रपति और दुनिया को भारत की महिला
की शक्तिरूपा छवि दिखाई गयी पर क्या हकीकत में देश की नारी इतनी ही आज़ाद और
शक्तिशाली हैं कि वह समाज और मजबूरियों से लड़ सके?
अगर
सिर्फ लड़कियों की शिक्षा की बात की जाए तो आजकल हमारे प्रधानमंत्री का एक नारा
जोर-शोर से देश में गूंज रहा हैं। “बेटी
बचाओ- बेटी पढाओं” की
शुरुआत हरियाणा से हुई जो भ्रूणहत्या के लिए विख्यात हैं। भ्रूणहत्या के आंकड़ों
से हटकर अगर से नारे के आखिरी भाग अर्थात “बेटी
पढाओं” पर ध्यान दिया जाए तो राज्य में 34 फीसदी लड़कियां बीच में पढ़ाई छोड़ रही
हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल. उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर की भी यही स्थिति है। सरकारी
प्रोत्साहन के बावजूद लड़कियों की पढ़ाई छोड़ने में कमी नहीं आई है।
देश
में हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के परीक्षा
नतीजों में बेटियों ने भले ही लड़कों को पछाड़ दिया हो, लेकिन देश की करीब 52.2 फीसदी लड़कियां बीच में ही अपनी स्कूली
पढ़ाई छोड़ रही हैं।टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने इस क्रम में साल 2014
सितंबर में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में
भी कहा गया है कि गांव के स्कूलों में कक्षा एक में दाखिला लेने वाली 100 छात्राओं में से औसतन एक छात्रा दसवीं के
बाद की पढ़ाई पढ़ती है। शहरों में प्रति हजार में से 14 छात्राएं ही ऐसा कर पा रही हैं।
एचआरडी
में राज्यमंत्री (स्कूली शिक्षा) उपेन्द्र कुशवाहा के मुताबिक यह सरकार और
मंत्रालय के लिए एक चुनौती है। लोग लड़कों की तुलना में लड़कियों पर कम ध्यान
देते हैं। सरकार इसका समाधान निकालने के लिए संवेदनशील है। मंत्रालय के संयुक्त
सचिव के मुताबिक लड़कियों का बीच में पढ़ाई छोड़ना जटिल समस्या है। एचआरडी
मंत्री ईरानी ने भी संवाददाता से सवाल के दौरान इसे गंभीर मुद्दा माना और
लड़कियों की स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति को रोकने के दिशा में काम करने का
आश्वासन दिया था, लेकिन
मंत्रालय सूत्रों के अनुसार मामले में कोई खास प्रगति नहीं हो पाई है।
भारत
सरकार के स्कूली शिक्षा 2011-12
के आंकड़े के अनुसार सभी वर्गों(अनुसूचित जाति, जनजाति
सहित) की कक्षा 1
से 5, 1 से 8
और 1 से 10
के दौरान क्रमश: 52.2%, 40.0 % और
21.0 फीसदी छात्राएं पढ़ाई छोड़ देती हैं। जबकि
इसी क्रम में अनुसूचित जाति, जनजाति
की क्रमश: 67.6, 57.1 और 35.3 % छात्राएं पढ़ाई छोड़ती हैं।
कक्षा
1 से 10
के दौरान सभी वर्गों की 50.7(उत्तर
प्रदेश),
37.4(उत्तराखंड), 42.2(जम्मू-कश्मीर), 7(हिमाचल)
और 18.5 प्रतिशत हरियाणा की छात्राएं स्कूली
शिक्षा को तौबा कर लेती हैं। प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य गुजरात में भी
कक्षा 1-10 के दौरान सभी वर्गों की 59.3 प्रतिशत छात्राएं स्कूल छोड़ देती हैं।
प्रधानमंत्री
के अनुसार गुजरात मॉडल विकास की दृष्टि से एक आदर्श हैं तो क्या गुजरात के इस
आदर्श मॉडल में लड़कियों और महिलाओं का स्थान हैं? महिलाओं
के विकास और सशक्तिकरण में शिक्षा सर्वप्रथम होती हैं तो अगर गुजरात की 59.3 फीसद लडकियां दसवी के बाद नहीं पढ़ती तो
कैसा विकास और कैसा आदर्श मॉडल हैं?
आंकड़े
के मुताबिक सभी वर्गों की14-15
साल की पूरे देश में करीब दो करोड़ 42
लाख 45 हजार 557
छात्राएं थी। जबकि 16-17 साल
की छात्राओं की संख्या दो करोड़, 14
लाख, 25 हजार, 355
रही। यानी दो साल के भीतर छात्राओं की संख्या में करीब 28 लाख की गिरावट। हर साल बढ़ने वाली
जनसंख्या के अनुपात को घटा दें तो करीब नौ साल स्कूल जा चकी छात्राओं की दो साल
के भीतर पढ़ाई छोड़ने की संख्या 24
लाख से अधिक है।
हरियाणा
में 1-12 कक्षा तक 34
फीसदी लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। मेवात, झज्जर
जैसे जिलों में 40
फीसदी से ज्यादा लड़कियां स्कूल छोड़ रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति
ज्यादा विकट है। इसका एक बड़ा कारण स्कूलों की दूरी और बेटियों की सुरक्षा के
प्रति अभिभावकों की चिंता है। हरियाणा सरकार ने15
जुलाई 2016 तक प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में
लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाने का बीड़ा उठाया, लेकिन
लड़कियों की शिक्षा और लिंगानुपात के अंतर में कोई खास बदलाव नहीं आया है।
उत्तर
प्रदेश में वर्तमान में कक्षा पांच में 22लाख
से अधिक तथा कक्षा 10
और 12 में क्रमश: महज 15,71,602, 12,13,218 छात्राएं है। यू-डायस
के आंकड़ों के मुताबिक हर साल कक्षा एक से पांच तक की 5.02 छात्राएं बीच में पढ़ाई छोड़ देती हैं।
कक्षा छह से आठ तक हर साल करीब 6.02
फीसदी छात्राएं स्कूल छोड़ती हैं।
गुजरात
में हाईस्कूल, इंटर
के बाद छात्राओं के स्कूल छोड़ने का प्रतिशत 4
से 6 है। जबकि छात्राओं को प्रोत्साहन देने के
लिए 746 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय खोले गए
हैं। इसमें कक्षा 6
से 8 तक की छात्राओं को मुफ्त शिक्षा, आवासीय सुविधा, नाश्ता और भोजन की व्यवस्था है। राज्य
सरकार ने इंटर के बाद आगे की पढ़ाई के लिए कन्या विद्या धन(30 हजार रुपये सालाना) योजना भी शुरू की है।
पंजाब
में 2014-15 के दौरान छात्राओं का 0.92(प्राइमरी), 1.79(अपर
प्राइमरी), 5.75(सेकेंडरी)
और सीनियर सेकेंडरी में 8.38
प्रतिशत ड्रॉप आउट है। खराब स्कूली कमरे,शौचालय
की कमी, पीने के पानी की किल्लत, स्कूल का घर से दूर होना, परिवहन सुविधा का अभाव और महिला शिक्षिका
की कमी इसका मुख्य कारण हैं।
अभिभावकों
का नकारात्मक नजरिया और सुरक्षा संबंधी चिंता सामाजिक कारण हैं। हालांकि राज्य
सरकार ने छात्राओं के प्रोत्साहन के लिए मुफ्त साइकिल देने और पंजाब स्कूल
शिक्षा बोर्ड ने आदर्श स्कूल योजना शुरू की। पिछले साल सरकारी स्कूलों के मेरिट
वाले बच्चों के लिए छह मेरिटोरियस स्कूल खोले, जहां
शिक्षा, रहना, खाना
आदि मुफ्त है।
हिमाचल
के सरकारी स्कूलों में इस समय पहली से बाहरवीं कक्षा तक 5,05,851 छात्राएं हैं। एक से दसवीं कक्षा में
छात्राओं की संख्या 3,90,997
है। 10 वीं के बाद करीब 10 फीसदी छात्राएं आगे दाखिला नहीं लेती है।
बारहवीं में 50,927
छात्राएं हैं। इनमें से औसतन 25
फीसदी छात्राएं कॉलेज में दाखिला नहीं ले पाती। इसका प्रमुख कारण घर के नजदीक
कॉलेज या परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होना है। हालांकि राज्य सरकार ने
छात्राओं को स्कूल और कॉलेज में निशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया है। 25 से 30
किलोमीटर के दायरे में कॉलेज खोले जा रहे हैं।
तलाश
योजना के तहत जम्मू कश्मीर में 2012-13
में स्कूल छोड़ चुके विद्यार्थियों की पहचान हुई थी। सर्वे में पूरे राज्य में 59061 बच्चे सामने आए थे। इनमें ज्यादातर
ग्रामीण इलाकों के थे। 23435
लड़के व 35626
लड़कियां थी।पिछले दो साल से न तो विद्यार्थियों के स्कूल छोड़ने को लेकर कोई
सर्वे हुआ और न उन्हें स्कूल वापस लाने के लिए प्रयास।
अगर
विकास की राह में पहले मोड़ यानी की शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति
इतनी गंभीर हैं तो फिर हम कैसे मान ले कि हमारी सरकार की विकास कथा में कही भी ‘म’ से
महिला नाम का शब्द अपनी सशक्त पहचान बना पायेगा ?
|
मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि भ्रम रुपी संसार में ये रेतीले रेगिस्तान भी आते हैं और शायद उनका आना लाजमी और तय हैं,
Thursday, 28 May 2015
मोदी सरकार महिलाओं को उनके सशक्त होने का विश्वास नहीं जगा पायी
मोदी सरकार का एक साल कितना पास कितना फेल
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश-विदेश के अपने हर भाषण में एक बात ज़रूर कह रहे हैं कि पिछले बारह महीनों में भारत ने अपना ‘खोया हुआ’ स्वाभिमान वापस पाया है। भारत की सकारात्मक छवि पूरे विश्व में फिर से स्थापित हुई है। क्या ऐसा सच में हुआ है? ऐसा क्या हुआ है इन 12 महीनों में कि नरेन्द्र मोदी ने कहा कि पहले लोग भारत में जन्म लेने के कारण शर्मिंदा महसूस करते थे और अब अपने भारतीय होने पर गर्व महसूस करने लगे हैं? वैसे यह कहना तो अतिशयोक्ति होगी की इन चंद महीनों में स्थिति ‘शर्म’ से ‘गर्व’ तक पहुच गयी है पर निश्चित रूप से भारत की छवि बेहतर तो हुई है। पर बदलाव जितना ज़मीनी स्तर पर दिखना चाहिए था उससे कहीं ज्यादा अभी सिर्फ़ मनोवैज्ञानिक है।
मनमोहन सिंह की युपीए 2 के अंतिम महीनों तक अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी नहीं थी और सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिरी हुई थी। दुनिया भर में यह माना जा रहा था कि भारत की बढ़ती ताकत स्थिर होती जा रही है। पर जब से नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, वे इस नकारात्मक छवि को तोड़ने में लगे हैं। मोदी सरकार ने पूरी चमक-दमक के साथ ऐसी योजनाओं की शुरुआत की जिनसे दुनिया भर यह माहौल बने कि भारत में सर्वंगीण विकास हो रहा है। निसंदेह स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया, बेटी बचाओ और जनधन जैसी योजनायें काफ़ी प्रभावशाली दिखती हैं। इसके अलावे कोयला और टेलिकॉम की नीलामी के तरीके को बेहतर करने की कोशिश की गयी। अर्थव्यवस्था में सुधार के प्रति अपनी गंभीरता दिखाने के लिए सरकार ने अध्यादेश का रास्ता अपनाया और विपक्ष की काफ़ी आलोचना भी झेली। राज्यों के विकास के लिए अधिक फण्ड की व्यवस्था की गयी। प्रधानमंत्री की विदेश यात्रायों से भी देश को फ़ायदा होगा। उम्मीद है जापान और चीन से भारत में निवेश आने की अच्छी सम्भावना बनी है। मगर फिर भी यह स्वीकार करना होगा की साल भर में कोई बहुत बड़ा निवेश देश में नहीं हुआ है। नरेन्द्र मोदी ने अपनी विदेश यात्रायों से ना सिर्फ़ भारत के साथ अन्य देशों के सम्बन्ध मजबूत करने की कोशिश की बल्कि आगे से नेतृत्व करते हुए भारत की छवि चमकाने का भी पूरा प्रयास किया। लगभग सभी देशों में एनआरआई जनता को संबोधित करके यही करने की कोशिश की जा रही थी।
इन सब के बावजूद, मोदी सरकार के पहले साल के ख़त्म होते-होते सरकार के कामकाज के ढंग को देखते हुए ऐसे भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह सरकार अपने ताम-झाम वाली योजनायों को सफलतापूर्वक अंजाम तक पंहुचा पायेगी! फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता की सरकार इस सन्दर्भ में दूरदर्शिता दिखाते हुए किसी दीर्घकालिक योजना पर काम कर रही हो। सरकार के पास कोई असरदार रोडमैप नहीं दिखता। निवेश के रूप में अगर काफ़ी सारे छोटे-छोटे प्रोजेक्ट शुरू भी होते हैं तो अर्थव्यवस्था को तो दूरगामी लाभ नहीं होने जा रहा। सरकार अपनी प्राथमिकताओं को ले कर भी हमेशा भ्रम में दिखती है। जैसे कि भूमि अधिग्रहण बिल को पास करने में अपनी सारी ताक़त झोकने से बेहतर यह होता की सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए प्रतिबद्धता दिखाती और किसानों का विश्वास जीतती। अगर आर्थिक सुधार की नज़र से देखें तो अर्थव्यवस्था को गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स बिल की ज़रूरत भूमि अधिग्रहण बिल से अधिक है।
अब आगे के लिए सरकार को शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने, अल्पसंख्यकों को विश्वास में लेने, अधिक से अधिक रोजगार के अवसर पैदा करने और किसानों के हित में अविलम्ब काम करने की ज़रुरत है। साथ ही राज्यसभा में बहुमत के आभाव से जूझती सरकार को अधिक से अधिक विपक्ष को साथ ले कर चलना भी सीखना होगा। विकास और स्वाभिमान का मनोवैज्ञानिक प्रभाव अधिक दिनों तक नहीं चलने वाला यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जितना जल्दी को समझ लेना पड़ेगा। अच्छे दिनों का तिलिस्म टूटते देर नहीं लगेगी।
Monday, 18 May 2015
घूमने फिरने की वो जगह ज़हां दिल खुश हो जाए
छुटि्टयों का मतलब सिर्फ मौज-मस्ती ही नहीं है। और जब गर्मी की छुटि्टयों की बात हो तो बच्चे ही नहीं बड़े भी इसमें शामिल होकर शहरी जीवन की भागमभाग से दूर जाकर जीवन का आनंद लेना चाहते हैं। यकीनन छुटि्टयां हमें तरोताजा कर देती हैं। लेकिन ये छुटि्टयां सिर्फ बोरियत दूर करने के लिए नहीं रहीं। इन दिनों लोग कुछ रोमांचक करना चाहते हैं। साहसिक कार्य और खेल-कूद जैसा कुछ हो जाए तो इन छुटि्टयों में मानों बचपन लौट आता है। भारत में ऐसी कई जगह हैं जहां आप इन छुटि्टयों में साहसिक यात्रा पर निकल सकते हैं। इन जगहों पर आप डोंगी चलाइए, तीरंदाजी करिए, पहाड़ों पर चढि़ए या ऊंट की सवारी करिए। वो सब कुछ कीजिए जो आपने बचपन में नहीं किया।
गंगा नदी में कश्ती चलाना काफी मुश्किलों भरा होता है। फिर भी पर्यटक अपनी डोंगी में बैठकर इसका मजा लेते हैं। औली की ढलानों पर स्कींग करने का मजा ही अलग है। यहां हर साल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्कींग प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। ट्रैकिंग का भी यहां मजा लिया जा सकता है। यहां घूमने का बेहतरीन समय मई से नवम्बर तक है।
इनके अलावा भारत में ऐसी कई बेहतरीन साहसिक जगहें हैं, जहां आप खेलों का मजा लेकर अपनी छुट्टी को और भी मजेदार बना सकते हैं। तो इन छुटि्टयों में परिवार और दोस्तों के साथ साहसिक खेल का आनंद लेना हो तो एक बार इन जगहों के चक्कर जरूर लगाइए।
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