Tuesday, 12 November 2013

मीडिया क्या है

मीडिया....जैसा सोचा था,शायद वैसा है नही और शायद क्या वैसा है ही नही। मीडिया मे बहुत ज्यादा  उतार-चढाव है....या युं कहुं की बहुत गंदगी है यहां....उस कचरे के ढेर से ज्यादा जिस पर हजारों मक्खियां है..

मीडिया जन सूमह तक सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाने का एक माध्‍यम है। यह संचार का सरल और सक्षम साधन है। जो अर्थव्‍यवस्‍था के समग्र विकास में मुख्‍य भूमिका निभाता है। ऐसे युग में जहां ज्ञान और तथ्‍य आर्थिक राजनैतिक और सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान के लिए औजार हैं, देश में सुदृढ़ और रचनात्‍मक मीडिया की मौजूदगी व्‍यष्टियों, सम्‍पूर्ण समाज, लघु और वृह्त व्‍यवसाय और उत्‍पादन गृहों, विभिन्‍न अनुसंधान संगठनों निजी क्षेत्रों तथा सरकारी क्षेत्रों की विविध आवश्‍यकताओं को पूरा करने में महत्‍वपूर्ण है। मीडिया राष्‍ट्र के अंत:करण का रक्षक है और हमारे दिन प्रतिदिन के जीवन में उसे बहुत से कार्य करने है। यह सरकार को विभिन्‍न सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक लक्ष्‍य हासिल करने में सहायता करता है शहरी और ग्रामीण जल समूह को शिक्षित करने, लोगों के बीच उत्तरदायित्‍व की भावना जागृत करने और जरूरत मदों को न्‍याय प्रदान करने में सहायता करता है। इसमें मोटे तौर पर प्रिंट मीडिया जैसे समाचार पत्र पत्रिका, जर्नल और अन्‍य प्रकाशन होते हैं तथा इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया जैसे रेडियो, टेलीविजन इंटरनेट आदि। विश्‍व के बदलते परिदृश्‍य के साथ इसने उद्योग का दर्जा प्राप्‍त कर लिया है। भारत में, मीडिया और मनोरंजन उद्योग में उल्‍लेखनीय परिवर्हन हो रहा है और यह एक सबसे तेज विकसित होता क्षेत्रक है। इसके लिए उत्तरदायी मुख्‍य कारक हैं प्रति व्‍यक्ति / राष्‍ट्रीय आय को बढ़ाना, उच्‍च आर्थिक वृद्धि और सशक्‍त मेक्रो-आर्थिक मूलभूत तत्‍व, और लोक तांत्रिक व्‍यवस्‍था, अच्‍छा शासन साथ ही देश में कानून और व्‍यवस्‍था की अच्‍छी स्थिति। विशिष्‍ट रूप से टेलीविजन उद्योग का उल्‍लेखनीय विकास, फिल्‍म निर्माण और वितरण के लिए नए प्रारूप निजीकरण और रेडियों का विकास, क्षेत्रक के प्रति सरकार की उदारीकृत मनोवृत्ति, अंतरराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों के लिए/से सरलता से पहुंच, अंकीय संचार का आगमन और इसके प्रौद्योगिकीय अभिनव परिवर्तन इस क्षेत्रक के विकास की अन्‍य विशेषताएं हैं। मीडिया उद्योग देश में मजबूत व्‍यापार माहौल का सृजन करने के अतिरिक्‍त सूचना और शिक्षा मुहैया कराने द्वारा राष्‍ट्रीय नीति ओर कार्यक्रमों के प्रति लोगों में जागरूकता लाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रकार से यह राष्‍ट्र निर्माण के प्रयासों में जनता को सक्रिय भागीदार बनने में सहायता करता है।
सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत में मीडिया उद्योग से संबंधित नियमों, विनियमों और कानून के निर्माण एवं प्रशासन के लिए नोडल प्राधिकरण है। यह विभिन्‍न आयु वर्ग के लोगों की बौद्धि और मनोरंजनक आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने में लगा हुआ है। और यह राष्‍ट्रीय अखंडता, पर्यावरणीय रक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और परिवार कल्‍याण निरक्षरता का उन्‍मूलन तथा महिला बच्‍चों और समाज के कमजोर वर्ग से संबंधित मुद्दों की ओर जन समूह का ध्‍यान आकर्षित करता है। यह सूचना के मुक्‍त प्रवाह का अभिगमन के लिए लोगों को सहायता करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह जन संचार, फिल्‍मों और प्रसारण के क्षेत्र में अंतरराष्‍ट्रीय सहयोग के लिए जिम्‍मेदार है और भारत सरकार की ओर से विदेशी पक्षों के साथ अन्‍योन्‍याय क्रिया करता है :-
लोगों के लिए आकाशवाणी (एआईआर) और दूरदर्शन (डीडी) के माध्‍यम से समाचार सेवा प्रदान करना
प्रसारण और टेलीविजन नेटवर्क का विकास करना तथा फिल्‍मों का निर्यात एवं आयात का संवर्धन करना
सरकार के विभिन्‍न विकासात्‍मक क्रियाकलापों और कार्यक्रमों में अधिकाधिक भागीदारी के लिए लोगों को शिक्षित करना और प्रेरणा देना।
सूचना औश्र प्रचार के क्षेत्र में राज्‍य सरकारों और उनके संगठनों के साथ संबंध बनाना
देश में फिल्‍मोत्‍सव और सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान का आयोजन करना
समाचार पत्रों के संबंध में प्रसे और पुस्‍तक पंजीकरण अधिनियम, 1968 को प्रवृत्त करना
राष्‍ट्रीय महत्‍व के विषयों को प्रकाशन के माध्‍यम से देश के भीतर और बाहर भारत के बारे में सूचना का प्रचार-प्रसार करना
लोक हित के मुद्दों पर सूचना प्रचार के अभियान के लिए अन्‍तर व्‍यैक्ति संचार और पारम्‍परिक लोक कला के रूपों का उपयोग करना
केन्‍द्र सरकार की योजनाओं और कार्यक्रमों से संबंधित सरकारी सूचना और मूलडाला का स्‍वीकृति केन्‍द्र के रूप में कार्य करने द्वारा सरकार और प्रेस के बीच सतत सम्‍पर्क के रूप में कार्य करना।
मंत्रालय को निम्‍नलिखित स्‍कंधों में विभाजित किया गया है, अर्थात:-
सूचना स्‍कंध – यह नीतिगत मामलों, प्रिंट मीडिया तथा सरकार की प्रेस और प्रचार संबंधी आवश्‍यकताओं पर कार्य करता है। इस स्‍कंध में मीडिया यूनिट निम्‍नलिखित हैं:-

प्रेस सूचना ब्‍यूरो
फोटो प्रभाग
अनुसंधान, अवलोकन और प्रशिक्षण प्रभाग
प्रकाशन विभाग
विज्ञापन और दृश्‍य प्रचार निदेशालय
क्षेत्र प्रकाशन निदेशालय
संगीत और नाटक प्रभाग
भारत के लिए समाचारपत्र पंजीयक
भारतीय प्रेस परिषद
भारतीय जनसंचार संस्‍थान।
प्रसरण स्‍कंध – यह इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया से संबंधित मामले पर कार्य करता है। यह इस क्षेत्र के लिए नीतियों और रूपरेखा नियमों तथा विनियमों का निर्धारण करता है, जिसमें लोक सेवा प्रसारण, केबल टेलीविजन का प्रचालन, निजी टेलीविजन चैनल, एफएम चैनल, उपग्रह रेडियो, सामुदायिक रेडियो, डीटीएच सेवा आदि का प्रसारण शामिल है। इस स्‍कंध के अंतर्गत संगठन में निम्‍नलिखित शामिल है:-

इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया निगरानी केन्‍द्र
प्रसार भारती (भारतीय प्रसारण निगम) – इसकी स्‍थापना आयोजन करने और लोगों का मनोरंजन करने के लिए किया गया है और एजेंसियों जैसे:- (i) आकशवाणी और (ii) दूरदर्शन के माध्‍यम से रेडियों और टेलीविजन पर प्रसारण का संतुलित विकास सुनिश्चित करने लिए किया गया है।
ब्राडकास्‍ट इंजीनियरिंग कंसल्‍टेंस (रेडियो) लिमिटेड (बीईसीआईएल)

फिल्‍म स्‍कंध – यह फिल्‍म क्षेत्रक से संबंधित मामलों पर कार्य करता है। अपने विभिन्‍न यूनिटों के माध्‍यम से यह डाक्‍युमेटरी फिल्‍मों के निर्माण और वितरण में रत है जिनकी आवश्‍यकता आंतरिक और बाहय प्रचार के लिए होती है, फिल्‍म उद्योग से संबंधित विकासात्‍मक और संवर्धनात्‍मक क्रियाकलाप, जिसमें प्रशिक्षण, अच्‍छी सिनेमा का संवर्धन, फिल्‍मोत्‍सव का आयोजन करना, विनियमों का आयात और निर्यात करना आदि शामिल है। इस स्‍कंध के निम्‍नलिखित मीडिया यूनिट हैं:

फिल्‍म प्रभाग
फिल्‍म प्रमाणन का सिनेमा बोर्ड
भारतीय राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार
राष्‍ट्रीय फिल्‍म विकास निगम
भारतीय फिल्‍म और टेलीविजन
सत्‍यजीत राय फिल्‍म और टेलीविजन संस्‍थान
फिल्‍मोत्‍सव निदेशालय
बाल फिल्‍म सोसाइटी

समेकित वित्त स्‍कंध – यह मंत्रालय के लेखा का रखरखाव और निगरानी का महत्‍वपूर्ण कार्य ''मुख्‍य लेखा नियंत्रक'' के अ‍धीनस्‍थ कार्यालय के माध्‍यम से करता है।

मीडिया उद्योग ने देश में उदार निवेश क्षेत्र से उललेखनीय लाभ पहुंचाता है। इसके विभिन्‍न खंडों में विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश की अनुमति दी गई है। प्रिंट मीडिया के लिए गैर समाचार प्रकाशन सहित शत प्रतिशत एफडीआई की अनुमति है और समाचार और ताजा मामलों को शामिल करने वाले प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के लिए 26 प्रतिशत तक के एफडीआई (एफआईआई सहित) की अनुमति है। जबकि एफआईआई, एनआरआई और पीआईओ के लिए नए क्षेत्र भी खुले हैं। एफएम रेडियो प्रसारण क्षेत्र में एफडीआई (एफआईआई सहित) को 20 प्रतिशत की अनुमति दी गई है। जबकि एफडीआई और एफआईआई को केबल नेटवर्क, प्रत्‍यक्ष रूप से घर में (डीटीएच) के लिए 49 प्रतिशत तक की अनुमति है (इस सीमा के अंदर एफडीआई का घटक 20 प्रतिशत से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए), अपलिंकिंग, हब (टेलीपोर्ट) आदि जैसी हार्डवेयर सुविधाओं की स्‍थापना। वर्तमान में भारत में 110 मिलियन टेलीविजन रखने वाले घर हैं, जिनमें से लगभग 70 मिलियन घरों में केबल और सेटेलाइट है और शेष 40 मिलियन घरों को सार्वजनिक प्रसारक द्वारा सेवा प्रदान की जाती है अर्थात दूरदर्शन। इसी प्रकार देश में 132 मिलियन रेडियो सेट हैं। पुन: पिछले कुछ वर्षों में निजी उपग्रह टीवी चैनलों की संख्‍या बहु तेजी से 2000 में एक टीवी चैनल से बढ़कर 31 दिसम्‍बर 2007 तक 273 टीवी चैनल तक पहुंच गई है। समाचार और ताजा मामलों के टीवी चैनल 58 प्रतिशत और गैर समाचार तथा ताजा मामलों के टीवी चैनल कुल अनुमत 273 टीवी चैनलों का 42 प्रतिशत हैं। पूर्व चैनलों की संख्‍या 2000 में केवल 1 से बढ़ कर 31 दिसम्‍बर 2007 को 158 हो गई है, जबकि दूसरे की संख्‍या 0 से 115 तक पहुंच गई है।
मंत्रालय द्वारा अनेक नीतिगत सिद्धांत बनाए जाने के साथ अनेक मार्गदर्शी सिद्धांत तैयार किए जाते हैं ताकि देश में विभिन्‍न जन संचार मीडिया के स्‍वस्‍थ विकास के लिए एक उपयुक्‍त परिवेश बनाया जा सके।
'टेलीविजन चैनलों के डाउनलिंकिंग के लिए नीतिगत दिशानिर्देश' जिसका निहितार्थ सभी उपग्रहण टेलीविजन चैनलों को डाउनलिंकिंग जिनका भारत में जनता के देखने के लिए डाउनलिंग किया गया/प्राप्‍त किया गया और पारेषण एवं पुन: पारेषण किया गया। इसके अधीन कोई व्‍यक्ति या कम्‍पनी चैनल डाउनलिंक नहीं करेगा जिसका पंजीकरण मंत्रालय द्वारा नहीं किया गया है। इसलिए टेलीविजन उपग्रह प्रसारण सेवा प्रदान करने वाले सभी व्‍यक्ति/कंपनी दूसरे देशों के दर्शकों के साथ भारत में अपलिंक होते हैं तथा कोई भी कंपनी जो ऐसी उपग्रह टेलीविज़न प्रसारण सेवा प्रदान करना चाहता है जो जनता के देखने के लिए भारत में प्राप्‍य हो उसे निर्धारित निबंधनों और शर्तों के अनुसार मंत्रालय से अनुमति प्राप्‍त करने की आवश्‍यकता होगी। नीतिगत दिशानिर्देश कुछ अर्हक मानदण्‍ड आवेदक कंपनी के लिए निर्धारित करता है, जो निम्‍नलिखित हैं:-

कंपनी (आवेदक कंपनी) चैनल डाउनलिंक करने की अनुमति के लिए आवेदन करता है, विदेशों से अपलिंक्‍ड होता है वह ऐसी कंपनी होगी जिसका पंजीकरण कंपनी अधिनियम 1956 के अधीन किया गया है इसमें इसका इक्विटी ढांचा, विदेशी स्‍वामित्‍व या प्रबंधन नियंत्रण चाहे जो भी हो।
आवेदक कंपनी का भारत में वाणिज्यिक मौजूदगी हो जिसका मुख्‍य व्‍यापार स्‍थान भारत में हो
यह या तो उस चैनल का मालिक हो जिसे वह जनता के देखने के लिए डाउनलिंक करना चाहता है या भारत के भूभाग के लिए उसके लिए उसके पास विशिष्‍ट विपणन/वितरण अधिकार हो जिसमें विज्ञापन और चैनल के लिए खरीद राजस्‍व हो और उसे आवेदन के समय पर्याप्‍त प्रमाण जमा करना होगा।
यदि आवेदक कंपनी के पास विशिष्‍ट विपणन/और वितरण अधिकार है तो इसके पास विज्ञापन के लिए, खरीद और कार्यक्रम विषय वस्‍तु के लिए चैनल की ओर से संविदा तय करने का भी अधिकार होना चाहिए।
आवेदक कंपनी के पास निर्धारित विवरण के अनुसार न्‍यूनतम निवल मूल्‍य होना चाहिए, अर्थात 1.5 करोड़ रु. का निवल मूल्‍य एक चैनल की डाउन लिंकिंग के लिए और प्रत्‍येक अतिरिक्‍त चैनल के लिए एक करोड़ रु. होने चाहिए।
इसे कंपनी के सभी निदेशकों के नाम और विवरण तथा मुख्‍य कार्यपालकों के जैसे कि सीईओ, सीएफओ और विपणन प्रमुख आदि की जानकारियां उनके राष्‍ट्रीय सुरक्षा समाशोधन प्राप्‍त करने के लिए देनी चाहिए।
इसे तकनीकी विवरण जैसे कि नामकरण, मेक, मॉडल, उपकरण / उपस्‍कर के विनिर्माता का नाम और पता, जिसका उपयोग डाउन लिकिंग और वितरण के लिए किया जाएगा, डाउन लिंकिंग तथा वितरण प्रणाली के ब्‍लॉक योजनाबद्ध आरेख और साथ ही इसे 90 दिनों के लिए निगरानी एवं भण्‍डारण अभिलेख क सुविधा का प्रदर्शन भी करना चाहिए।
इसी प्रकार 'भारत से अप लिंकिंग के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत', की अधिसूचना में, जहां आवेदक द्वारा एक अप लिंकिंग हब /टैली पोर्ट की स्‍थापना या एक टीवी चैनल को अपलिंक करने या एक समाचार एजेंसी द्वारा अपलिंक की सुविधा स्‍थापित करने हेतु अनुमति मांगी जाती है तो यह कंपनी भारत में कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत पंजीकृत कंपनी होनी चाहिए। यह कंपनी केवल उन टीवी चैनलों को अपलिंक करेगी, जिन्‍हें मंत्रालय द्वारा विशिष्‍ट रूप से अनुमोदित या अनुमत किया गया है। आवेदक कंपनी के साथ अपलिंकिंग हब / टेली पोर्ट की स्‍थापना के लिए विदेशी इक्विटी धारिता एनआरआई / ओसीबी / पीआईओ सहित 49 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। निवल मूल्‍य आवश्‍यकता चैनल की एक से दस तक क्षमता के लिए 1 करोड़ से 3 करोड़ के बीच होती है। आवेदक कंपनी का स्‍वामी चाहे कोई भी हो, इसकी इक्विटी संरचना या प्रबंधन का नियंत्रण गैर समाचार और ताजा मामलों के टीवी चैनल की अपलिंकिंग के लिए अनुमति पाने का पात्र होगा। निवल मूल्‍य जो एकल टीवी चैनल के लिए आवश्‍यक है, इसकी राशि प्रत्‍येक अतिरिक्‍त चैनल के लिए 1.5 करोड़ रु. और 1 करोड़ रु. है जबकि एक समाचार और ताजा मामलों वाले टीवी चैनल की अपलिंकिंग के लिए एकल टीवी चैनल हेतु निवल मूल्‍य 3 करोड़ रु. और प्रत्‍येक अतिरिक्‍त टीवी चैनल के लिए 2 करोड़ रु. है।

मंत्रालय ने भारत में डायरेक्‍ट टू होम (डीटीएच) प्रसारण सेवा प्रदान करने के लिए लाइसेंस प्राप्‍त करने हेतु दिशानिर्देश', जारी किया है, जहां डीटीएच सेवा का अभिप्राय केबल ऑपरेटर जैसे किसी माध्‍यम के पास से आए बगैर ग्राहक के परिसरों को टीवी सिग्‍नल मुहैया कराने हेतु उपग्रह प्रणाली का उपयोग करके कु-बैंड में चैनल टीवी कार्यक्रम का वितरण करना है। दिशानिर्देश के अर्हक मानदण्‍डों में निम्‍नलिखित शामिल हैं :-

आवेदक कंपनी भारतीय कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत पंजीकृत के भारतीय कंपनी होनी चाहिए।
आवेदक कंपनी में एफडीआई / एनआरआई /ओसीबी / एफआईआई सहित कुल विदेशी इक्विटी धारिता 49 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। विदेशी इक्विटी के अंदर एफडीआई का घटक 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
आवेदक कंपनी में भारतीय प्रबंधन नियंत्रण के साथ मंडल में अधिकांश प्रतिनिधित्‍व तथा कंपनी के मुख्‍य कार्यकारी का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है, आदि।

एक 'निजी एजेंसियों के माध्‍यम से एफएम रेडियो प्रसारण सेवाओं के विस्‍तार पर नीति (फेज-II)' की घोषणा ऑल इंडिया रेडियो के प्रयासों को पूरकता और पूर्ति प्रदान करने के लिए निजी एजेंसियों के माध्‍यम से एफएम रेडियो नेटवर्क के विस्‍तार हेतु की गई है। इसे ऐसे रेडियो स्‍टेशनों के प्रचालन द्वारा किया जाना है जो स्‍थानीय सामग्री और सार्थकता के साथ कार्यक्रम प्रस्‍तारित करते हैं, ग्राह्यता और उत्‍पादन में फीडेलिटी की गुणवत्ता में सुधार करते हैं, स्‍थानीय प्रतिभा की भागीदारी को प्रोत्‍साहन देते हैं और रोजगार उत्‍पादन करते हैं। ऐसे 21 चैनल प्रथम चरण में पहले से ही कार्यरत हैं। इन 337 चैनलों में से दूसरे चरण के दौरान आशय पत्र 245 चैनलों को प्रदान किया गया, इनमें से सभी चैनलों ने करार नामों पर हस्‍ताक्षर कर दिए हैं। कुल मिलाकर 178 निजी एफएम चैनल भारत में अब तक प्रचालनरत हैं, जिसमें प्रथम चरण के 21 चैनल शामिल है।

'सिनेमेटोग्राफ फिल्‍मों और अन्‍य फिल्‍मों के आयात', के लिए भी है जहां सिनेमेटोग्राफ फीचर फिल्‍मों और अन्‍य फिल्‍मों (जिसमें वीडियो टेप में फिल्‍म, कॉम्‍पैक्‍ट, वीडियो डिस्‍क, लेसर वीडियो डिस्‍क या डिजिटल वीडियो डिस्‍क शामिल हैं) को लाइसेंस के बगैर अनुमत किया गया है। फिल्‍म के आयातक फिल्‍मों के वितरण और प्रदर्शन को शासित बनने वाले सभी प्रयोज्‍य भारतीय कानूनों का अनुपालन करेंगे जिनमें सिनेमेटोग्राफी अधिनियम, 1952 के तहत निर्धारित सार्वजनिक प्रदर्शन प्रमाणपत्र प्राप्‍त करने की अपेक्षाएं शामिल हैं। इसके तहत किसी अनधिकृत नकली फिल्‍म का आयात प्रतिबद्धित है। भारतीय फिल्‍मों का विदेशी रिप्रिन्‍ट का आयात मंत्रालय में लिखित रूप में पूर्वानुमति के बिना अनुमत नहीं होगा।

'प्रसारण सेवा विनियमन विधेयक प्रारूप, 2007' की घोषणा एक क्रमबद्ध रूप में प्रसारण के प्रबंधन और सामग्री को प्रोत्‍साहन, सुविधा और विकास प्रदान करने के लिए की गई है। इस प्रयोजन के लिए इसका लक्ष्‍य एक ऐसे स्‍वतंत्र प्राधिकरण की स्‍थापना है, जिसे भारतीय प्रसारण विनियामक प्राधिकरण कहा जाए और यह शैक्षिक, विकास संबंधी, सामाजिक, सांस्‍कृतिक और अन्‍य जरूरतों के लिए उत्तरदायी रूप से प्रसारण सेवाओं को प्रोत्‍साहन दें तथा लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करें एवं उनके कार्यक्रमों में लोक सेवा संदेश तथा सामग्री आदि को शामिल किया जाए।

ऐसी सभी पहलों के परिणामस्‍वरूप भारत में मीडिया उद्योग ने वर्षों से उल्‍लेखनीय वृद्धि दर्शाया है लगभग दो अंकीय वृद्धि हुई है। इसे 437 बिलियन रु. के आकलित आकार से वर्ष 2011 तक एक ट्रिलियन रु. तक बढ़ने का अनुमान है। अधिक पूंजी प्रवाह लाता है और प्रत्‍यक्ष और प्रत्‍यक्ष दोनों प्रकार के रोजगार के लिए महत्‍वपूर्ण मार्ग दर्शाता है। यह विभिन्‍न राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय मुद्दों के बारे में लोगों का दृष्टिकोण और विचार बनाने में सहायता करता है इस प्रकार से योजनाओं के निर्माण, नीतियां और कार्यक्रम बनाने में सहायता करता है। यह मनोरंजन देने, सूचना का प्रचार-प्रसार करने, विभिन्‍न मतों का पोषण और विकास करने भारत के नागरिकों को जानकारी, नागरिक बनने में शिक्षित बनाने और सशक्‍त बनाने के लिए शक्तिशाली माध्‍यम है ताकि लोग प्रजातंत्रिक प्रक्रिया में प्रभावी रूप से भाग ले सकें तथा देश की विविध भारतीय संस्‍कृति और योग्‍यता का संरक्षण, संवर्धन और अभिकल्‍पना करने में सहायता करता है।

अल्पसंख्यक शिक्षा की लाईफ लाइन बना मौलाना आजाद फाउंडेशन

स्वतंत्र भारत में अल्पसंख्यकों के भविष्य को देखते हुए जब अबुल कलाम मुहियुद्दीन अहमद आजाद ने शिक्षा के महत्व पर जोर दिया तो उस समय केशव बलिराम हेडगेवार और उनके सहयोगियों ने मौलाना आजाद की दूरदृष्टि का मजाक उड़ाते हुए उन्हें समय का ज्ञान न होने के साथ पक्षपाती और अदूरदर्शी करार दिया था।

आलोचनाओं की परवाह ना करते हुए मौलाना ने अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा को ही सबसे बेहतर बताने की वकालत जारी रखी और अपने इस सपने के साथ उन्होंने भारत के विभाजन का विरोध किया। वे अच्छी तरह से जानते थे कि मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों का भविष्य पाकिस्तान जैसे गैर धर्मनिरपेक्ष देश की धरती पर अपनी ताकत और प्रतिभा को बर्बाद करने की बजाये संयुक्त भारत में अधिक बेहतर होगा।

उनकी एकजुट रहने की पुरजोर अपीलों के बावजूद भारतीय इतिहास ने विभाजन जैसी भयावह वास्तविकता का सामना किया और मौलाना आजाद ने खुद को स्वतंत्र भारत के अल्पसंख्यकों के कल्याण कार्य में लगा दिया। बाद में, 1988 में उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर जब ‘मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन’ स्थापित किया गया तो इसके प्रयासों ने कुछ ही वर्षों के भीतर हेडगेवार को पूरी तरह से गलत साबित कर दिया। इसकी नींव भारतीय समाज में शैक्षिक रूप से पिछड़े अल्पसंख्यकों और अन्य कमजोर वर्गों के बीच शिक्षा को समग्र रूप से बढ़ावा देने के पर टिकी थी।

आसमा इकबाल बताती हैं कि मौलाना आजाद फाउंडेशन के अंतर्गत उन्होंने कुछ साल पहले कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं का फायदा लेने के लिये दरवाजा खटखटाया तो इस फाउंडेशन ने साबित कर दिया कि यह उनकी श्क्षिा के लिये ही वरदान नहीं है बल्कि इसके जरिये वे किसी भी योग्य भारतीय अल्पसंख्यक की तरह ही बेहतर जीवन जीने के लिए आर्थिक रूप से सशक्त बनने के काबिल हुईं।

आस्मा इस संरक्षण संस्था के बारे में गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहती हैं कि ‘‘मेरी शिक्षा के लिये माता-पिता द्वारा अपनी तरफ से पूरी कोशिशों के बाद भी ऐसी स्थिति भी आई जब मुझे चिकित्सा विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए और अधिक धन की जरुरत थी। मैंने फाउंडेशन से संपर्क किया और फिर मेरी पात्रता तथा अन्य जरुरी चीजों पर गौर करने के बाद फाउंडेशन लगभग सारे खर्चों को उठाने पर सहमत हो गया।’’

वित्तीय मदद देने के अलावा फाउंडेशन ने प्रतिस्पर्धा और बाजार की ताकतों से निपटने के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया! ‘‘मैंने यह सोचा भी नहीं था कि एक फाउंउेशन इस तरह के अपेक्षित मार्गदर्शन के साथ आगे आयेगा। लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि इस सेटअप में कुछ पेशेवरों ने मुझे शैक्षिक सशक्तिकरण के तहत कई फायदे देने की पेशकश की। मैंने ना सिर्फ समय पर अपनी शिक्षा को पूरा किया बल्कि हैदराबाद में एक रोग अनुसंधान केंद्र में बढ़िया नौकरी भी हासिल की। आस्मा गर्व से बताती हैं।

कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 12वीं योजना में अल्पसंख्यक बच्चों के आर्थिक सशक्तिकरण और बेहतर भविष्य के लिए नेतृत्व गुणों के विकास पर विशेष ध्यान देने के साथ मौलाना आजाद फाउंडेशन का कॉरपस फंड 750 करोड़ से बढ़ाकर 1500 करोड़ कर दिया। भारत के 30 करोड़ योग्य अल्पसंख्यकों - मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी - में भरोसा बढ़ाने के लिये ढेरों कल्याणकारी योजनाएं बनाई गई हैं। इस उद्देश्य को हासिल करने के लिये फाउंडेशन को अपने कोष का बड़ा हिस्सा उपभोग करने की खुली छूट दी गई है।

शैक्षिक सशक्तिकरण के तहत छात्रवृत्ति आधारित कार्यक्रमों के अलावा फाउंडेशन उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान करता हैं और इनमें उद्यमशीलता की आकांक्षाओं को बढ़ावा देने में मदद करता है। फाउंडेशन की योजनाओं से फायदा प्राप्त करने वाली एक और लाभार्थी जसप्रीत कौर के मुताबिक केंद्र सरकार अल्पसंख्यक छात्रों को शिक्षा में पूरी मदद और उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए छोटे व्यवसाय/इकाईयां स्थापित करने के लिए प्रचुरता से योजनाओं को चला रही है, लेकिन दुर्भाग्य से जागरुकता की कमी इन योजनाओं का लाभ प्राप्त करने में बड़ी बाधा बन रही है।

‘‘मैंने अपना व्यवसाय प्रबंधन पाठ्यक्रम पूरा करने के तुरंत बाद मैंने फाउंडेशन सहित विभिन्न वित्तीय संस्थानों से संपर्क किया। मैंने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम (एनएमडीएफसी) के अधिकारियों से मुलाकात की। अपनी समस्या को हल करने के लिए मुझे सुझाव दिया गया कि सूक्ष्म वित्त विकल्प और फाउंउेशन की कुछ अन्य योजनाओं को देखूं। मैं आर्थिक सशक्तिकरण योजनाएं जैसे अन्य विकल्पों को भी ध्यान में रखे हुए था, लेकिन अंत में, मैंने काफी रियायती दर पर मिले सावधि ऋण का विकल्प चुना। इस छोटी सी शुरुआत के साथ आज मैं 2 करोड़ रुपये की बिक्री वाले ‘पैकेजिंग’ व्यवसाय को चला रही हूं।’’ जसप्रीत ने कहा।

यूपीए सरकार ने सैद्धान्तिक तौर पर अल्पसंख्यकों के आर्थिक और शैक्षिक सशक्तिकरण के लिए काफी कुछ किया है इस बात को अपने अनुभव के जरिये बताने वाली जसप्रीत ही केवल अकेली नहीं हैं। इस तरह के लाभ प्राप्त करने वाले प्रावधानों और तकनीकी प्रक्रिया का फायदा अल्पसंख्यकों तक पहुंचाने की दिशा में काफी जागरुकता फैलाने की जरुरत है।

‘‘मैंने हाल ही में मौलाना आजाद फाउंडेशन में अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए वित्तीय मदद के लिए आवेदन किया है। मुझे विश्वास है कि यह मुझे मिल जायेगा और मेरा भविष्य भी उज्जवल होगा। जहां तक मार्गदर्शन की बात है, मैं आपको बता दूं कि फाउंडेशन बहुत अच्छा काम कर रहा है। ऐसा महसूस हो रहा है कि सरकार ने अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए खजाने को खोल दिया है। दिल्ली के जाकिर हुसैन कॉलेज के छात्र सोहेल आलम ने मुस्कुराते हुए कहा।

एक तरफ सरकार ने मौलाना आजाद फाउंडेशन को प्रचुर मात्रा में शैक्षिक सशक्तिकरण योजनाओं से लैस किया है, दूसरी ओर योग्य अल्पसंख्यकों में से युवाओं में भी उज्ज्वल भविष्य के लिए शिक्षा पर जोर देने की आकांक्षा कुलाचें मार रही हैं। बस यह देखना होगा कि जागरुकता की कमी को कैसे दूर किया जायेगा।

Thursday, 7 November 2013

राज्य चुनावों को लेकर सट्टा बाजार में बीजेपी की हवा

सट्टा बाजार में बीजेपी की हवा है। नवंबर में दांव पर लगी रकम 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच सकती है। हालांकि, अगर किसी बड़े नेता का निधन होता है, तो सट्टा कैंसल माना जाएगा। दिल्ली और मुंबई के बुकीज ने यह जानकारी दी है। सट्टा बाजार में 'किसी बड़े नेता के निधन' वाला क्लॉज पहली बार डाला गया है। पटना में नरेंद्र मोदी की रैली से पहले हुए बम धमाकों के बाद सट्टे के लिए यह शर्त जोड़ी गई है।
बुकीज को डर है कि दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में हिंसा हो सकती है। सट्टा सिंडिकेट के दिल्ली के मेंबर ने बताया, 'अगर चुनाव के दौरान हिंसा या बम धमाकों में किसी बड़े नेता की मौत होती है, तो सभी सट्टे खत्म माने जाएंगे।' बुकीज का यह भी मानना है कि चारों राज्यों में बीजेपी का परफॉर्मेंस अच्छा रहेगा। दिल्ली के एक सूत्र ने बताया, 'मोदी को सपोर्ट करने वालों की संख्या बढ़ रही है। इस वजह से चारों राज्यों में बीजेपी की जीत होगी।'...
बुकीज का मानना है कि राजस्थान में बीजेपी आसानी से कांग्रेस को हरा देगी। राज्य में 230 विधानसभा सीटें हैं। सट्टा बाजार में बीजेपी के इनमें से 101 सीटें जीतने पर 1 रुपए पर 14 पैसे अधिक देने का वादा किया जा रहा है। अगर कांग्रेस राज्य में 60 सीटें भी जीत पाती हैं, तो बुकी 1 रुपए पर 26 पैसे ज्यादा देने को तैयार हैं।
कांग्रेस के 75 से ज्यादा सीटें जीतने पर 2.8 रुपये का भाव है। कांग्रेस के पास अभी 96 सीटें हैं। दिल्ली की 70 सीटों में से बीजेपी के 28 सीटें जीतने पर बुकीज 24 पैसे ज्यादा देने को तैयार हैं। जो लोग इस पर दांव लगा रहे हैं, उन्हें पार्टी के 28 से कम सीटें जीतने पर रकम गंवानी होगी। 2008 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को दिल्ली में 23 सीटों पर जीत मिली थी।
बुकीज का कहना है कि आम आदमी पार्टी दिल्ली में 8 से ज्यादा सीटें नहीं जीतेगी, लेकिन वह बड़ी पार्टियों का खेल बिगाड़ सकती है। पहले सीएम कैंडिडेट पर अलगसे सट्टा लगता था। हालांकि, इस बार इस तरह का सट्टा नहीं लग रहा है। बुकीज का कहना है कि इस बार एकदम साफ नहीं है कि इन राज्यों में कौन सीएम बनेगा? मध्य प्रदेश में भी बीजेपी के सत्ता में फिर से आने के चांस हैं। राज्य में 230 विधानसभा सीटें हैं। बुकीज कांग्रेस के राज्य में 70 या इससे ज्यादा सीटें जीतने पर 1.10 रुपये का भाव देने को तैयार हैं।

कांग्रेसी युवराज

वैसे कांग्रेसी, युवराज को हाफ स्लीव शर्ट पहनने की सलाह क्यों नहीं देते...। बेचारे कुर्ते की बांह को उपर करने में परेशान रहते हैं.. इसी से सारी गड़बड़ी हो जाती होगी कुछ का कुछ बोल जाते होंगे

Tuesday, 8 October 2013

प्रेम कहानी

एक बहुत पुरानी बात है और बहुत नई भी। एक काले रंग का शहर था, जो रात को जल्दी सो जाता था और सुबह मुँहअंधेरे उठ जाता था। उसमें एक लड़का रहता था और एक लड़की भी।

लड़की साँवली सी थी और चंचल भी। बचपन में अक्सर सभी चंचल होते हैं, मगर लड़का नहीं था। लड़का बहुत सोचता था, बहुत गंभीर रहता था। उसे पता नहीं चला कि उसके स्कूल में पढ़ने वाली उसकी हमउम्र एक लड़की उसे देखने के लिए दिनभर बहाने ढूंढ़ती है और उसी के बारे में सोचती रहती है। लड़का पढ़ने में बहुत होशियार था और बोलने में भी। लड़की चंचल थी, लेकिन बोलती कम थी। 

लड़के के मन में स्त्री जाति के प्रति दुराग्रह सा था। और भी कम उम्र में दो-तीन बार लड़कियों के साथ खेल-खेल में हुए झगड़े ही इसके लिए उत्तरदायी थे या कोई जन्मजात भावना इसके पीछे थी, यह कोई नहीं जानता था। दुराग्रह कम न होने का एक कारण यह भी था कि उसने होश संभालते ही स्वयं को लड़कियों से दूर रखना शुरु कर दिया था। तो लड़की को उसका दुराग्रह, कटा-कटा रहना और गंभीर रहना ही अच्छा लगने लगा। लड़का तो अनभिज्ञ था, सो एक दिन लड़की ने ही बात का आरंभ करना चाहा। वह लड़के की तरह बोलने में चतुर नहीं थी, इसलिए कई दिन तक तय नहीं कर पाई कि क्या बोले? उसने दूसरा रास्ता चुना। 

वे दोनों छठी कक्षा में पढ़ते थे। स्कूल की छुट्टी के बाद लड़का जब अपने दोस्त के साथ घर के लिए निकलता था तो लड़की उसके पीछे रहती थी। दो-तीन सौ बच्चों की भीड़ में लड़की का काम और भी आसान हो जाता था। लड़की का घर पहले आता था- स्कूल से करीब सौ मीटर दूर। उस बीच में लड़की, लड़के की पीठ पर टँगे बस्ते पर चॉक से टेढ़ी-मेढ़ी आकृतियाँ बना दिया करती थी और फिर मुस्कुराकर अपनी गली की ओर मुड़ जाती थी। 

लड़का रोज शाम को घर पहुँचकर अपने बस्ते पर बनी सफेद रेखाएँ देखता और उन्हें साफ करते हुए अपराधी का अनुमान लगाने का प्रयास करता। उसके शक की उंगली कई लड़कों पर जाती, लेकिन किसी लड़की पर कभी नहीं।

एक सप्ताह तक लड़की भीड़ का फायदा उठाती रही और लड़का अपराधी को नहीं पहचान सका। सोमवार को उसे एक तरीका सूझा। उसने अपने दोस्त को पीछे कुछ दूरी पर रहने और अपनी तरफ देखते रहने को कहा। लड़की चंचल थी, मगर चतुर नहीं। उसके दोस्त ने उसे पहचान लिया।

पता चलते ही लड़के के मन का दुराग्रह और मजबूत हो गया और उसने बदला लेने की ठानी। अब छुट्टी के समय वह और उसका दोस्त सबसे अंत में स्कूल से निकलते और लड़की के पीछे रहते। मौका देखकर लड़का, लड़की के बस्ते पर आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींच देता। 

लड़की द्वारा बनाई गई रेखाएँ और आकृतियाँ मधुरता लिए होती थीं, जबकि लड़के द्वारा खींची रेखाएँ बहुत कठोर थीं। 

लेकिन लड़का प्रतिशोध नहीं ले पाया। अब लड़की जानबूझकर उससे आगे रहती थी और अपनी गली आने पर मुस्कुराकर मुड़ जाती थी। अगली सुबह जब वह कक्षा में आती तो बस्ते पर वे आड़ी-तिरछी रेखाएँ बनी रहती थीं। उसने उन्हें एक दिन भी साफ नहीं किया। घर जाकर सबसे पहले अपना बस्ता उतारती और उसे दौड़कर छत पर ले जाती। वहाँ कोई नहीं होता था। फिर बस्ते को सामने रखती और उसे तब तक देखती रहती, जब तक कि कोई उसे बुलाने न आ जाता।

पाँच दिन तक जब लड़की के बस्ते पर बनी रेखाएँ और गली में मुड़ते समय की उसकी मुस्कुराहट बढ़ती ही गई तो लड़के ने रेखाएँ खींचना बन्द कर दिया। उसका प्रतिशोध का भाव खो गया था और अब उसके मन में लड़की की मुस्कान का राज जानने की जिज्ञासा पनपने लगी। शनिवार की शाम को वह इसी उलझन में घर लौटा और लड़की मुस्कुराती हुई लौटी, इस बात से अनजान कि आज उसके बस्ते पर लड़के की उंगलियाँ नहीं थिरकी हैं।

लड़की पीठ से बस्ता उतारकर दौड़ी दौड़ी छत पर गई और एक कोने में आराम से बैठकर बस्ता सामने रखा। उसे देखते ही उसका चेहरा उतर गया। उसने घुमा-फिरा कर पूरा बस्ता देखा। चॉक का एक भी नया निशान नहीं था। वह मुँह लटकाए बैठी रही और सोचती रही। वह लड़के जितनी गंभीर हो गई थी।

थोड़ी देर बाद माँ ने आवाज दी- दूध पी ले। 
वह वहीं बैठी रही।
पाँच मिनट बाद फिर से आवाज आई- आजा, दूध पी ले।
वह नहीं हिली।
अब उसकी माँ ऊपर आई और उसका हाथ पकड़कर नीचे ले गई।
उस रात को लड़की सबसे अंत में सोई। बिस्तर पर अपनी माँ की बगल में लेटी-लेटी जाने क्या-क्या सोचती रही।
लड़का भी अपने घर में सबसे अंत में सोया। वह सोचता रहा कि लड़की की खुशी और चंचलता रोज बढ़ती ही क्यों जा रही थी? स्त्री जाति के लिए जो भाव उसके मन में पहले से थे, वे इसका उत्तर नहीं दे पाए। जब वह सोया तो उसके मन में लड़की के लिए एक मधुर कोना बनने लगा था, जो सुबह तक और बड़ा हो गया था।
लड़का अगले दिन किसी कारण से स्कूल नहीं जा पाया। उदास लड़की की नज़रें पूरा दिन उसे ही खोजती रहीं। आधी छुट्टी में उसका टिफ़िन नहीं खुला और वह सब लड़कियों से दूर एकांत में बैठी रही। शाम को स्कूल से लौटते हुए जब वह अपनी गली में मुड़ी तो उसके चेहरे पर हर दिन वाली मुस्कान नहीं थी।
- आज खाना क्यों नहीं खाया?
उसकी माँ ने पूछा। 
वह उस दिन दौड़कर छत पर भी नहीं गई थी। माँ के प्रश्न का उसने कोई उत्तर नहीं दिया। 
- तेरी तबियत तो ठीक है? माँ ने लाड़ से उसकी कलाई पकड़ते हुए कहा।
वह चुप रही। उसका मन किया कि जोर से रोने लगे, मगर वह रोई नहीं। वह रोई तब, जब माँ के लाख मनाने पर भी उसने रात का खाना नहीं खाया और माँ ने गुस्से में उसे थप्पड़ मारा।
- शायद मैं रोने का बहाना ढूंढ़ रही थी।
लड़की अपनी माँ की बगल में लेटी-लेटी सोचती रही। 

उस एक दिन में लड़के के मन की जिज्ञासा भी बढ़ गई और उस मधुर कोने का आकार भी। वह अगले दिन स्कूल गया तो रास्ते भर लड़की के बारे में ही सोचता रहा। लड़की गुमसुम हुई अपनी सीट पर बैठी थी। लड़के ने पीछे से जाकर उसका कंधा थपथपाया।
- तू उदास क्यों है?
वह बातें बनाने में वाकई होशियार था। लड़की ने पलटकर उसे अपने पीछे खड़ा देखा तो एकदम से उसकी आँखें मुस्कुराने लगीं। वह बोली नहीं।
- मैं तेरे बस्ते पर चॉक चलाता था।
उसने लड़की के बस्ते पर बनी हुई सफेद रेखाओं की ओर इशारा करते हुए कहा।
- क्यों?
लड़की भी वाकई चंचल थी, हालांकि बोलती कम थी। अब उसकी आँखों की मुस्कान चेहरे पर भी आ गई थी।
- क्योंकि पहले तू चलाती थी।
उसकी बात सुनकर लड़की खिलखिलाकर हँस दी। लड़के को भी उसका हँसना अच्छा लगा। उसके चेहरे पर भी एक गर्वीली मुस्कान आ गई।
-आज आधी छुट्टी में मेरे साथ खाना खाएगी?
लड़की ने तुरंत स्वीकृति में गर्दन हिला दी। खाना खाते हुए लड़की को लगा कि लड़का उतना भी गंभीर नहीं है, जितना दिखता है। लड़की उसकी हर बात पर मुस्कुराती रही।

दस दिन बाद लड़के ने रात में एक सपना देखा। वह एक पेड़ के पास लड़की के साथ बैठा था और बाकी सपना वह समझ नहीं पाया। सुबह उठा तो उसे लगा कि इतना प्यारा सपना उसने पहले कभी नहीं देखा था।
- कल रात मैंने सपने में तुझे देखा।
अगले दिन वह आधी छुट्टी में लड़की को बता रहा था।
लड़की फिर मुस्कुराने लगी।
- मेरा मन करता है कि मैं सारा दिन तेरे साथ ही बैठी रहूँ।
- मेरा भी... 
आधी छुट्टी ख़त्म होने से पहले ही वे दोनों स्कूल के पीछे के मैदान में आकर एक पेड़ के पीछे छिप गए। दोनों के चेहरों पर मुस्कान थी।
- तू फ़िल्म देखती है?
थोड़ी देर बाद लड़के ने पूछा। तब तक कक्षाएँ शुरु हो चुकी थीं।
- हाँ... 
लड़की के चेहरे की मुस्कान बढ़ गई थी।
- उसमें जैसे होता है ना...
लड़का कुछ सोचकर रुक गया।
- क्या होता है?
लड़की के स्वर में आत्मीयता और जिज्ञासा थी।
लड़का कुछ क्षण वैसे ही खड़ा रहा, फिर अप्रत्याशित ढंग से उसने लड़की का गाल चूम लिया। बिल्कुल बालसुलभ चुम्बन था वह, जो केवल बच्चों के कोष में ही होता है- बहुत निर्मल और प्यारा।
लड़की इससे घबराकर एकदम से दो कदम पीछे हट गई और स्तब्ध सी होकर लड़के को देखती रही। इस प्रतिक्रिया से लड़के के मन में अपराधबोध सा आ गया और उसके चेहरे की मुस्कान चली गई। लड़की ठिठककर वहीं खड़ी रही और उसे एक अपरिचित की तरह देखती रही। 
- तू बहुत गन्दा है।
लड़का नहीं समझ पाया कि उसके शब्दों में घृणा ही थी या कुछ और था?
लड़की की आँखें भर आई थीं। लड़का कुछ न कह सका, उसे देखता रहा। 
- तू सच में बहुत गन्दा है।
लड़की ने फिर कहा और दौड़ती हुई क्लास की तरफ चली गई। लड़के ने दूर से देखा कि वह दौड़ते-दौड़ते एक हाथ से अपने आँसू भी पोंछ रही थी। 
दोपहर भर लड़का उसी पेड़ के नीचे बैठकर अपने आप को अपराधी की तरह कोसता रहा। 
रात को अपनी माँ के साथ बिस्तर पर लेटी हुई लड़की ने माँ से पूछा- मम्मी, गन्दे बच्चे अच्छे नहीं होते?
उसकी माँ हँस दी। 
- बेटा, जो गन्दा होता है, वह अच्छा नहीं हो सकता। 
- कोई गन्दा क्यों होता है?
- तू सो जा अब।
माँ ने करवट बदल ली थी। लड़की फिर देर से सो पाई।

अगले पूरे दिन बरसात होती रही। लड़की स्कूल नहीं गई। लड़का गया, लेकिन वह और दिनों की अपेक्षा अधिक गंभीर था। उसकी आँखें दिनभर लड़की को खोजती रहीं, लेकिन अमावस की रात में चाँद ढूंढ़ना संभव नहीं था।
शाम तक उसका अपराधबोध चरम पर पहुँच गया। उसके बाद का छुट्टियों का एक हफ़्ता उसके लिए एक साल की तरह बीता और उसके बाद का एक-एक साल, जन्मों की तरह.... 
और लड़की?
लड़की के पिता का तबादला हो गया था। छुट्टियों के दौरान एक सुबह वह उदास लड़की अपने परिवार के साथ उस काले शहर को छोड़कर चली गई।
कोई उम्मीद नहीं छोड़ी गई, कोई संदेश नहीं छोड़ा गया। लेकिन बेशर्म काला शहर उसके बाद भी जल्दी सो जाता था और मुँहअंधेरे जग जाता था। केवल वह एक लड़का देर से सोने और जल्दी जगने लगा था।
- तू बहुत गन्दा है।
लड़का इस वाक्य को सुनने के लिए और लड़की इस वाक्य को दोहराने के लिए वर्षों तड़पती रही। लड़का काले रंग के शहर में और लड़की सफेद रंग के शहर में... 
पेड़, स्कूल, बस्ते और गली, सबका रंग खून सा लाल हो गया था। 


सात साल गुजर गए। 
लड़का काले शहर को छोड़कर होस्टल जा रहा था। ट्रेन के उस डिब्बे में कम ही लोग थे। लड़का चुप बैठा उस ट्रेन से बहुत दूर कुछ सोच रहा था। उसकी आँखें अब धुंधली सी हो गई थीं। ऐसा लगता था, जैसे हर समय आँसू तैरते रहते हों। अचानक उसे कुछ याद आया। अपनी सीट के नीचे रखा अपना बैग उसने बाहर निकाला और उसे खोलकर एक छोटा सा स्कूल बैग बाहर निकाल लिया।

बैग पुराना पड़ चुका था और उस पर सफेद रेखाओं के कुछ फीके से निशान थे। लड़का उसे हाथ में लेकर देखता रहा। कोई भाव उसके गंभीर चेहरे से बाहर नहीं आ पाया। आँखें कुछ ज्यादा धुंधली लगने लगी थीं।
कुछ क्षण बाद जैसे ही वह उस स्कूल बैग को फिर से बैग में रखने लगा, एक मीठी सी आवाज़ कानों में पड़ी। 
- तुम बहुत गन्दे हो।
काले शहर में एकदम से बादल छा गए थे और तेज बारिश शुरु हो गई थी। एक स्कूल के मैदान में खड़ा एक पेड़ तेज हवा में उड़ने को तैयार था। एक गली का मोड़ तेजी से दौड़ने लगा था। रद्दी की दुकान पर पड़ा हुआ एक टिफ़िन बॉक्स लुढ़कता हुआ दूसरे से जा टकराया था। एक मकान की छत अपने आसमान से कुछ कह रही थी।
लड़के ने चेहरा उठाकर देखा। सामने एक लड़की बैठी थी। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें उसके होठों के साथ मुस्कुरा रही थीं। 
- क्या?
- तुम बहुत गन्दे हो।
उसकी मुस्कान बढ़ गई थी। लड़का कुछ पल चुप रहा। उसे लगा कि यदि वह बोला तो अपनी बात कहने के लिए उसे हज़ारों शब्द एक साथ बोलने पड़ेंगे।
उसका चेहरा अब उतना गंभीर नहीं लग रहा था, न ही आँखें उतनी धुंधली लग रही थीं।
- तुम अब भी उतना ही कम बोलते हो?
लड़के की आँखों से अश्रुधार बह निकली। लड़की के पास बैठा एक आठ-नौ साल का बच्चा लड़के को घूर-घूरकर देखता रहा। फिर उसने प्रश्नात्मक दृष्टि लड़की पर डाली। लड़की की बड़ी-बड़ी आँखें अपनी जगह पर नहीं थीं। वे अपने चेहरे से छूटकर आसमान में कुछ ढूंढ़ रही थीं।
- कहाँ थी तुम?
लड़का बहुत कोशिश करके बोल पाया।
लड़की अपने पास बैठे बच्चे को लक्ष्य करके बोली- अभी एक बहुत बड़ा मन्दिर आएगा। तू डिब्बे के दरवाजे पर जाकर खड़ा हो जा। उसके आगे हाथ जोड़कर जो भी माँगो, मिल जाता है।
बच्चा कुछ न समझ पाने की मुद्रा में उसे देखता रहा और फिर धीरे से उठकर चल दिया। जाते-जाते उसने आँसुओं से भीगे चेहरे वाले लड़के की ओर भी देखा। 
- कहाँ थी तुम?
लड़का अब बेचैनी से बोला 
- इसी दुनिया में थी।
वह बाहर देखने लगी थी।
- कोई ऐसे चला जाता है क्या? बिना कोई आस छोड़े....
- हाँ... 
- जानती हो.... लड़का कहता-कहता रुक गया।
काले शहर में बारिश थमने लगी थी। पेड़ ने अनिश्चित भविष्य के डर से अपने पंख सिकोड़ लिए थे। गली के मोड़ के कदम पीछे हटने लगे थे। रद्दी की दुकान का शटर अपने आप ही बन्द होने लगा था। आसमान से एक बूँद मकान की छत पर टपकी।
लड़की अपनी खुली हुई हथेली और उसमें खारे आँसू की बूँद को देखती रही और फिर हथेली होठों से लगाकर पी गई। उसकी आँखें उसके चेहरे पर लौट आई थीं और उस दृश्य को कैद कर लेने के लिए बन्द हो गई थीं। 
- जानती हो, मैं कितने महीनों तक शाम को लौटते समय पीछे मुड़कर नहीं देखता था कि तुम आओ और बेफ़िक्र होकर चॉक चला सको... 
- जानते हो, मैंने अपने घर में वैसा ही एक नीम का पेड़ लगाया था। सोचती थी कि किसी दिन जब मैं घर लौटूँगी, तुम उसके नीचे वैसे ही खड़े मिलोगे... 
अंत तक आते-आते लड़की ने जोर से आँखें मींच लीं। 
- कहाँ जा रही हो अब?
लड़की ने धीरे से आँखें खोलीं और मुस्कुराने का असफल प्रयास किया। 
- तुम कहाँ जा रहे हो?
- होस्टल... लड़की चुप होकर बाहर की ओर देखती रही। 
- कहाँ जा रही हो तुम?
इस बार लड़के के स्वर में बेबसी आ गई थी। 
- क्या फ़र्क पड़ता है कि मैं कहीं भी जाऊँ?
लड़की अब उसकी ओर देखती हुई बोली। पेड़ पर बैठी एक चिड़िया बारिश थमने पर उड़ी और गीले पंखों के कारण वहीं गिर पड़ी। 
- उसे फ़र्क पड़ता है, जो सात साल तक इस आग में जलता रहा कि तुम उसकी एक छोटी सी गलती के कारण बिना कुछ कहे चली गई थी। 
- तुम्हें अब तक याद है? 
- भूल जाता तो अब रो रहा होता? आँसुओं भरा चेहरा हँसकर बोला। 
- मैं नादान था तब। 
- मैं भी.... कहकर लड़की उसके पास आकर बैठ गई। 
- वह मेरा छोटा भाई है।
लड़की ने डिब्बे के दरवाजे पर खड़े बच्चे की ओर इशारा करते हुए कहा। बच्चा उस मन्दिर की राह देख रहा था, जो कभी बना ही नहीं था। 
- तुम अब और भी सुन्दर हो गई हो। 
- तुम्हारी आँखें अब और भी उदास लगने लगी हैं। ऐसा लगता है, जैसे सालों से जाग रहे हो।
दो आँखें, दो आँखों से जा मिली थीं। 
- इतना पढ़ने लगे हो क्या?
कहकर खिड़की की तरफ वाली दो आँखें, दूसरी दो आँखों से छूट गईं और उत्तर की प्रतीक्षा में बाहर के भागते मैदानों में भटकने लगीं। 
- नहीं...पढ़ाई में फिर मन नहीं लगा। अब सबने कहा कि किसी और शहर में चला जा। घरवालों ने होस्टल में भेज दिया।
कहते-कहते लड़के को काला शहर याद आ गया।
- बारिश के दिनों में वहाँ की गलियों में अब भी घुटनों तक पानी भर जाता है?
उस प्रश्न के लिए लड़की की आँखों में वही पुरानी चंचलता लौट आई थी।
- कई बरसों से बारिश ही नहीं हुई। 
- ऐसा लगता है कि तुम बहुत दिनों से बहुत अकेले हो।
लड़की की आवाज में बेचैनी आ गई थी। 
- मुझे भी लगता है.... 
- घर पर सब कैसे हैं? 
- घर पर सब अच्छे हैं.....और मैं अकेला! 
.....मैं अकेला क्यों हूँ?
खिड़की से दूर वाली दो आँखों में बच्चों सी मासूम जिज्ञासा थी। लड़की ने कुछ नहीं कहा। उसके हाथ पर अपना एक हाथ धीरे से रख दिया और उसकी बेचैनी को पढ़ने की कोशिश करती रही। 
- कहाँ जा रही हो तुम?
बेचैनी पढ़े जाने की सीमा में नहीं थी। 
- तुम किसी को ढूंढ़ लो, अपना साथ देने के लिए... 
- कहाँ जा रही हो? 
- तुम आओगे? 
लड़का कुछ नहीं बोला। लड़की की हथेली थोड़ा दूर होने लगी तो लड़के ने उसे फिर थाम लिया। 
- हमें मिलना होगा तो इसी तरह फिर मिल जाएँगे....और नहीं मिलना होगा तो.... 
- मैं उस मन्दिर से कोई उम्मीद नहीं रखता।
लड़के ने दरवाजे की ओर देखते हुए कहा। 
- मेरा विश्वास है भगवान में।
लड़की की हथेली का दबाव विश्वास से बढ़ गया था। ट्रेन रुक गई। बच्चा दौड़ा-दौड़ा आया। 
- चलो दीदी, उतरना है।
लड़की ने हाथ अलग किया, एक गहरी साँस ली और विश्वास की डोर थामकर अपने भाई के साथ उतर गई। ट्रेन चलने को थी। लड़के ने बैग उठाया और सफेद शहर के उस भीड़-भाड़ वाले स्टेशन पर उतर गया। लड़की ने पीछे मुड़कर देखा। पूरा आसमान एक घर की छत पर उतर आया था। 


- तुम फिर इस तरह बैठे हो.... 
लड़की ने कमरे में घुसते ही उसे देखकर कहा। लड़का उस छोटे से कमरे के एक कोने में दीवार से पीठ टिकाकर जमीन पर बैठा था। लड़की की आवाज सुनकर, उसने सिर उठाकर देखा और हल्का सा मुस्कुरा दिया। 
- मैं बहुत देर से उस मकड़ी को देख रहा हूँ। उसने इतना बड़ा जाल बुन दिया और...और मैं यहाँ खाली बैठा हूँ- उसे देखता हुआ.... 
वह छत की ओर देखते हुए बोला। 
- मुझे डर लगता है कि तुम पागल न हो जाओ। 
लड़की उसके बिल्कुल सामने आकर खड़ी हो गई थी। 
- मुझे भी लगता है... 
उसकी आवाज़ में चिंता नहीं थी, केवल खालीपन था। लड़की ने उसे उठाने के लिए अपना हाथ आगे किया। लड़के ने हाथ थाम लिया। 
- कोई देख तो नहीं लेगा?
लड़के ने उसकी आँखों में उसी खालीपन से देखते हुए कहा। 
- सब बाहर गए हैं।
लड़का उसके हाथ का सहारा लेकर खड़ा हो गया। 
- भूख लगी है।
लड़के ने इस तरह से कहा, जैसे बच्चा माँ से कहता है।
- मैं लाती हूँ कुछ।
लड़के का दर्द, जाती हुई लड़की की आँखों में प्रतिबिम्बित हो रहा था। जब लड़की थाली लेकर लौटी तो लड़का वहीं खड़ा हुआ छत की ओर देख रहा था। उसे देखकर लड़का कुर्सी पर बैठ गया। लड़की ने एक स्टूल सरकाकर थाली उस पर रख दी। 
- जल्दी खा लो...
इससे पहले कि कोई आ जाए। लड़के ने रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा था। उसका हाथ कुछ क्षण तक हवा में रहा और फिर उसने टुकड़ा वापस थाली में रख दिया। 
- हम चोरी कर रहे हैं क्या?
उसके स्वर में कुछ था कि छत पर दौड़ती हुई मकड़ी रुक गई। 
- हाँ, छिपकर कोई भी काम करना चोरी ही होता है।
लड़की ने भी उसी तरह कहा, जैसे माँ बच्चे को समझा रही हो। 
- फिर मैं नहीं खाऊँगा। 
- कब तक भूखे रहोगे?
लड़की ने निवेदन के स्वर में कहा। उसकी चंचलता तो वर्षों पहले ही समाप्त हो गई थी। 
- जब बिना चोरी का खाने को मिले। 
- अच्छा, यह चोरी का नहीं है। अब खा लो प्लीज़।
लड़का आज्ञा मानकर खाने लगा। लड़की उसके पास खड़ी होकर उसका चेहरा निहारती रही। एक रोटी खाकर वह रुक गया।
फिर कुछ सोचकर बोला- कब तक खिलाती रहोगी मुझे? कब तक चोरी करके पैसे लाती रहोगी मेरे लिए? 
- जब तक मैं रहूंगी.... 
लड़की दूसरी ओर देखने लगी थी। 
- मैंने तो कुछ भी नहीं किया तुम्हारे लिए। बोझ बनकर यहाँ पड़ा रहता हूँ दिनभर... 
लड़की ने उसके होठों पर हाथ रख दिया और अगले ही क्षण रोने लगी। 
- प्लीज़, तुम मत रुलाया करो मुझे। कुछ मत बोला करो। 
वह रोते हुए बोली। लड़का उसे देखता रहा। उसे देखकर लगता था कि वह कमज़ोर काठ हो गया है।
कुछ पल बाद लड़की अपने आप ही चुप हो गई। 
- अच्छा ये बताओ कि कल कौनसी कविता लिखी?
लड़की दुपट्टे से अपने आँसू पोंछते हुए बोली। 
- कल कुछ नहीं लिखा और.... 
वह कहता-कहता रुक गया। 
- और क्या?
रोने से लड़की का चेहरा लाल हो गया था। लड़के ने कमरे में ही एक तरफ इशारा किया। राख का एक बड़ा सा ढेर था और कुछ अधजले कागज़ के टुकड़े हवा में इधर-उधर उड़ रहे थे।
लड़की एक गहरी साँस लेकर धम्म से खाट पर बैठ गई और उस ढेर की ओर देखती रही। 
- ये क्यों किया तुमने? 
- माँ की याद आ रही थी। कुछ और तो था नहीं मेरे वश में, केवल ये कविताएँ थीं। अपनी कविताएँ जला देने का दर्द वह माँ ही समझ सकती थी, जिसे अपने बच्चे की हत्या करनी पड़ी हो। बाकी कोई कहता कि वह उस दर्द को महसूस कर सकता है, तो झूठ कहता। 
- तुम घर क्यों नहीं चले जाते? चार साल से घरवालों को कोई ख़बर भी नहीं दी। वह उसके दोनों हाथ, अपने हाथों के बीच में पकड़कर प्यार से बोली। 
- तब जाता तो वे तुमसे दूर किसी होस्टल में भेज देते और तब नहीं गया तो अब कैसे जाऊँ? उन्होंने सोचा होगा कि कहीं मर गया हूँ। 
काले शहर ने एक ठण्डी साँस भरी। 
- इतना प्यार क्यों करते हो कि जीना मुश्किल हो जाए? 
- तुम रोज़ खाना क्यों लाती हो कि जीना पड़े? 
- क्योंकि तुम्हें खिलाए बिना नहीं खा सकती। 
- जब मैं नहीं रहूँगा तो क्या करोगी?
लड़के की धुंधली आँखों का रंग मटमैला हो गया था। इस बार ऐसा बोलने पर लड़की ने उसके होठों पर हाथ नहीं रखा। 
- मेरे कारण तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद हो गई है.... 
- बर्बाद कहाँ हुई? अभी तो तुम हो। जब नहीं रहोगी, तब पूछना....
लड़के के चेहरे पर बहुत वेदना से भरी हुई मुस्कुराहट दौड़ गई। 
- तुम घर लौट जाओ प्लीज़। 
- तुम रह पाओगी? 
- न भी रह पाऊँ तो क्या रहूंगी नहीं? 
- मैं तो जी भी नहीं पाऊँगा। 
- हम साथ न रह सकें तो भी मेरे लिए जीते रहना।
लड़की ने उसके हाथों को और कसकर पकड़ लिया था। 
- मैं चलती हूँ अब।
वह हाथ छोड़कर खड़ी हो गई। लड़का कुछ नहीं बोला, सिर झुकाए कुर्सी पर बैठा रहा। 
लग रहा था कि कमजोर काठ भीतर से जल रहा है। लड़की चल दी। दरवाजे पर पहुँचकर कुछ क्षण रुकी।
- पापा मेरे लिए लड़का ढूंढ़ रहे हैं। और चली गई। ...............
कोई जाए, मगर यूँ सारी उम्मीदें साथ लेकर न चला जाए। थाली की दाल-रोटी, कमरे की दीवारों और फ़र्श के गले जा लगीं। अधजले कागज़ के टुकड़े पूरे जला दिए गए। भरी दुपहरी में कमरा अँधेरा हो गया और उम्मीद के आखिरी जुगनू को ‘पापा’ नाम को कोई जीव निगल गया। 
...............कोई जाए, मगर यूँ किसी का जीवन साथ लेकर न जाए। 


कमरे के एक दरवाजे पर खड़ी एक लड़की ने एक बार भीतर झाँका और फिर बाहर धीमे-धीमे टहलने लगी। 
- भगवान के लिए कुछ बोलो। तुम्हारी चुप्पी नहीं सही जाती। वह बड़े से आईने के सामने कुर्सी पर बैठी थी। बदन पर भारी-भरकम चमचमाते कपड़ों और गहनों का बोझ था और दिल पर उससे ज्यादा....
वह उसके कदमों के पास चुपचाप बैठा रहा। उसके आँसू लड़की के पैरों पर बार-बार गिरते थे। लड़की के आँसू दुल्हन के कपड़ों में बीच में ही कहीं खो जाते थे, जैसे दुल्हन के सपने... 
- और मत रोओ...सारा मेकअप खराब हो जाएगा।
पास खड़ी छोटे बालों वाली मोटी औरत ने रुमाल से उसका चेहरा हल्के से पोंछ दिया और फिर एक ब्रश उठाकर चेहरे पर रंग पोतने लगी। लड़का बोला नहीं, लड़की के पैरों पर गिरते उसके आँसुओं की गति बढ़ गई। लड़की का मन किया कि आँसुओं से सारा मेकअप धो डाले, ऐसे कि वो फिर कभी न चढ़ पाए और सब कपड़े इस तरह फाड़कर कहीं फेंक दे कि वैसे कपड़े फिर कभी न सिल पाएँ।
लड़के ने झुककर लड़की के पैरों को चूम लिया और उन्हें चूमता हुआ भी रोता रहा। छोटे बालों वाली औरत आश्चर्य से उसे देखने लगी थी। लड़की सामने आईने में अपने आप को देखती रही। आँसुओं से फिर मेकअप बिगड़ने लगा।
तभी लड़के की धुंधली होती आँखों में उसके पैरों पर लगी मेंहदी चुभी और वह चौंककर इस तरह दूर हट गया, जैसे कुछ याद आ गया हो।
मोटी औरत फिर उसी निर्लिप्त भाव से अपने काम में लग गई, जैसे उसे कुछ सुनता न हो, कुछ दिखता न हो। 
- मैं आज कुछ नहीं कहूँगा। मैं अब कभी कुछ नहीं कहूँगा।
बिलखते हुए वह बोला। कमरे में आने के बाद यह उसके मुँह से निकली हुई पहली बात थी।
लड़की अपने आप को रोक नहीं पाई और अपने चेहरे पर से मोटी औरत का हाथ झटककर कुर्सी से उठकर लड़के के सामने बैठ गई और उसके माथे और आँसुओं से भरे चेहरे को बेतहाशा चूमने लगी।
लड़का बिलखता रहा, जैसे आसमान से आग बरसकर उसे चूमती हो।
एक बड़े से हॉल के बीचोंबीच फव्वारा था। मेहमान आने लगे थे। एक सजी-धजी सुन्दर औरत एकटक उस फव्वारे को ही देख रही थी। उसकी आँखों में हल्का सा पानी तैर गया। 
- क्या हुआ?
एक आदमी ने उसके कन्धे पर प्यार से हाथ रखते हुए कहा। 
- कुछ नहीं.... 
वह उसकी ओर देखकर मुस्कुराई। आँखों में तैरते पानी ने मुस्कुराने से साफ मना कर दिया। 
- हमारी शादी को याद कर रही हो? 
- हाँ.... 
लेकिन आँखों ने झूठ बोलने से भी मना कर दिया। भीतर कहीं पीड़ा के फव्वारे फूट पड़े थे। 
कुछ क्षण बाद लड़की संभल गई और उसके चेहरे से दूर हट गई। फिर उसे देखकर कुछ पल तक रोती रही और रोती-रोती ही अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गई।
लड़के का रोना बहुत कम हो गया था। मोटी औरत फिर अपना काम करने लगी। 
- जब आखिरी बार सोया था तो सपने में एक गली दिखी थी, जिसके सब घर जल गए थे। एक नीम का पेड़ दिखा....कह रहा था कि वो मर रहा है.... 
लड़के की आवाज़ बहुत दूर से आती लग रही थी। अब वह रो नहीं रहा था। 
- मुझे याद मत करना, मेरी कसम है तुम्हें।
लड़की काँपते हुए स्वर में बोली और कसम अगले ही क्षण टूटकर खनखनाती हुई बिखर गई।
हॉल में तेज आवाज़ में संगीत बज रहा था। फव्वारे के पास खड़ी उस औरत ने संगीत और रंग-बिरंगे चेहरों में स्वयं को खोने का प्रयास किया, लेकिन नाकाम रही। उसका पति किसी परिचित को देखकर उससे मिलने चला गया। 

उसके दिल में गूंज रहा था- हमारी शादी को याद कर रही हो? और उसके मन में आया कि ये फव्वारे समन्दर बन जाएँ और वह डूब मरे। 
- रोओ मत, टाइम नहीं है बार-बार मेकअप करने का।
मोटी औरत ने कड़े शब्दों में कहा तो लड़की कुछ धीमी आवाज़ में रोने लगी। हालांकि आँसुओं की गति कम नहीं हुई। 
- यह भी दिखा कि आकाश से दर्द बरस रहा है और उस शहर की सब गलियाँ घुटनों तक भर गई हैं....
लड़के की आवाज़ भर्रा गई थी। वह बहुत कमज़ोर हो गया था और रोने से और भी कमज़ोर लगने लगा था। 
- मैं उसके साथ रह लूँगी, जी लूँगी, सो भी लूँगी, लेकिन तुम्हारे सिवा कभी किसी से प्यार नहीं करूँगी.... 
यदि देवियाँ वरदान देती होंगी तो बिल्कुल उसी तरह देती होंगी, जिस तरह लड़की बोल रही थी।
इस कथन पर मोटी औरत ने रुककर उसके चेहरे को ध्यान से देखा, फिर लिपस्टिक उठाई और उसके काँपते हुए होठों पर लगाने लगी। 
- याद है, हमारी शादी में तुम्हारी वज़ह से कितनी देर हो गई थी? तुम्हारे मेकअप के चक्कर में सब फेरों के लिए एक घण्टा इंतज़ार करते रहे थे।
उसका पति फिर उसके पास आकर खड़ा हो गया था। इस बार वह मुस्कुरा भी नहीं पाई। उसे लगा कि चारों ओर मातम के गीत गाए जा रहे हैं। फव्वारों के गिरने की आवाज़, लहरों की गर्जना बनकर उसके दिमाग से टकरा रही थी। ऐसे में वह क्यों मुस्कुराती और कैसे मुस्कुरा पाती? 
- दीदी, बारात आ गई है। सब कह रहे हैं कि जल्दी करो।
दरवाजे पर खड़ी लड़की चिल्लाकर बोली। छोटे बालों वाली औरत ने उसी क्षण अपना काम ख़त्म किया और संतोष की साँस ली। दरवाजे वाली लड़की भी भीतर आ गई और मंत्रमुग्ध सी होकर दुल्हन को देखती रही।
मोटी औरत और दरवाज़े वाली लड़की ने सहारा देकर उसे कुर्सी से उठाया और लेकर बाहर की और चल दीं। 
- कब मिलोगी? पास बैठी लाश ने जैसे अंतिम शब्द कहे थे। इस पर दोनों ने घूमकर उसे देखा और रुक गईं। लड़की अब रो नहीं रही थी, न ही उसने लड़के की ओर देखा। 
- कभी नहीं।
और चल दी।
फव्वारे के सामने खड़ी औरत को दिखने लगा कि कोई समन्दर की ओर बढ़ा ही जा रहा है। उसका शरीर लहरों से नहीं डरता, बढ़ा ही जा रहा है....और वह धीरे-धीरे डूबता जाता है, बचने के लिए कोई प्रयास नहीं करता।
कमरे की लाश एक ओर को लुढ़क गई। फव्वारे के पास खड़ी औरत गश खाकर गिर पड़ी। संगीत बजता रहा। 


- तुम बहुत गन्दे हो मामा।
मेरा दस साल का भांजा मुझसे कहता है। 
- क्यों?
- पूरी कहानी क्यों नहीं सुनाते? हमेशा अधूरी छोड़ देते हो। 
- ............. 
- और न ही ये बताया है कि लड़के-लड़की का नाम क्या था? कौन थे वे?
मेरे पास कोई उत्तर नहीं होता। मैं मुस्कुराने की कोशिश करता हूँ, शायद नहीं मुस्कुरा पाता। वह जिज्ञासा से मेरी ओर देखता रहता है और मैं डायरी बन्द करके रख देता हूँ।
‘तुम बहुत गन्दे हो...’ बहुत देर तक वातावरण में गूँजता रहता है।