Sunday, 27 December 2015

15,000 लोगों ने साइकिल चलाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड किया कायम

इंदौर साइक्लोथॉन’ के पहले संस्करण के तहत रविवार को 15,000 से ज्यादा लोगों ने साइकिल चलाकर दक्षिण अफ्रीका में बनाए गए वर्ल्ड रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया. इंदौर साइकिलिंग एसोसिएशन के आयोजित कार्यक्रम में हुए इस कारनामे को गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्ज ने आधिकारिक मान्यता दी है.

भारत में गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्ज के प्रमुख मनीष विश्नोई ने बताया कि विश्व कीर्तिमान के बारे में इंदौर साइकिलिंग एसोसिएशन का दावा मंजूर करते हुए इस संगठन को बाकायदा प्रमाण पत्र जारी किया गया है. इस कारनामे को एक ही आयोजन में सबसे ज्यादा लोगों के साइकिल चलाने के विश्व कीर्तिमान के रूप में मान्यता दी गई है.

उन्होंने गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्ज के हवाले से बताया कि इस सिलसिले में पिछला विश्व रिकॉर्ड दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन शहर में 2012 में बनाया गया था, जहां 8,500 लोगों ने एक साथ साइकिल चलाई थी. इंदौर साइकिलिंग एसोसिएशन के आयोजित पहले ‘इंदौर साइक्लोथॉन’ में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर बतौर अतिथि शामिल हुए. बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय इस आयोजन में मेजबान की भूमिका में नजर आए.

पर्यावरण और स्वास्थ्य का खयाल
विजयवर्गीय साइकिलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन और इंदौर साइकिलिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं. उन्होंने कहा कि ‘इंदौर साइक्लोथॉन’ का आयोजन पर्यावरण और स्वास्थ्य के प्रति जागृति फैलाने के लिये किया गया था, जिसमें बच्चों से लेकर बूढ़ों तक ने हिस्सा लिया.

विजयवर्गीय ने यह भी बताया कि वह प्रशासन से चर्चा के जरिए कोशिश कर रहे हैं कि इंदौर के कुछ व्यस्त मार्गों पर पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों पर सप्ताह में एक दिन के लिए रोक लगा दी जाए और इन गाड़ियों की जगह साइकिल के इस्तेमाल को मंजूरी दी जाए.



कीर्ति आजाद ने कहा डीडीसीए में बड़ी गड़बड़ियां हुई हैं

बीजेपी के निलंबित सांसद कीर्ति आजाद ने एक बार फिर डीडीसीए में कथित घोटाले को लेकर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि डीडीसीए में बड़ी गड़बड़ियां हुई हैं। उन्होंने कहा कि मैं हमेशा खेल में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ता रहा हूं और लड़ता रहूंगा।
कीर्ति आजाद ने आज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि मुझ पर विपक्ष से मिले होने की बात कहने वालों को बता दूं कि मैं जो भी कर रहा हूं अपनी मर्जी से कर रहा हूं। उन्होंने कहा लोकसभा में मैंने जो भी कहा था वो किसी के इशारे पर नहीं कहा था।

कीर्ति आजाद ने कहा लोकसभा में कोई किसी के इशारे पर बोलने के लिए नहीं खड़ा होता। स्पीकर के आदेश के बाद ही कोई बोलता है। कीर्ति आजाद ने कहा कि मैंने सीबीआई का काम आसान कर दिया है और खुद ही काफी जांच कर ली है। अगर उन्हें मुझसे कोई मदद चाहिए तो लें ले। आजाद यही नहीं रुके, उन्होंने कहा कि डीडीसीए में एक ही काम के लिए कई बार भुगतान किया गया। एक हीं कंपनी को बार-बार ठेके दिए गए।
बता दें इससे पहले भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डीडसीए में कथित घोटाले को उजागर करने का दावा किया था। 20 दिसंबर को कीर्ति ने एक स्टिंग ऑपरेशन भी दिखाया था जिसमें दावा किया गया था कि डीडीसीए की तरफ से 14 फर्जी कंपनियों को भुगतान किए गए। यही नहीं उन्होंने ये भी आरोप लगाया था कि डीडीसीए ने लैपटॉप के लिए 3 हजार रुपए और प्रिंटर के लिए 16 हजार रुपए का भुगतान किया।

सोनिया पर की आपत्तिजनक टिप्पणी, नेहरू की नीतियों पर कांग्रेसी पत्रि‍का ने उठाए सवाल

कांग्रेस को फजीहत का सामना करना पड़ सकता है। पार्टी ने अपने ही मुखपत्र ‘कांग्रेस दर्शन’ में सोनिया गांधी के पिता को फांसीवादी कहा है। साथ ही देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के फैसलों पर भी सवाल उठाए हैं।
मुंबई कांग्रेस के मुखपत्र में लिखा गया है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पिता ‘फांसीवादी सिपाही’ थे और यह भी कहा गया है कि सोनिया ने वर्ष 1998 में सरकार बनाने की असफल कोशिश भी की थी। हालांकि कांग्रेस ने कहा है कि उनका कोई मुखपत्र नहीं है।
‘कांग्रेस दर्शन’ में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के फैसलों पर सवाल भी उठाए गए हैं। इसमें लिखा गया है कि अगर नेहरू ने सरदार पटेल की बात मानी होती तो आज कश्मीर, तिब्बत, चीन और नेपाल की समस्या नहीं होती। इस विषय को लेकर विपक्ष हमेशा से पंडित नेहरू पर सवाल उठाता रहा है।
मुखपत्र के संपादक मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष संजय निरुपम हैं। पूर्व सांसद निरुपम ने हालांकि गलती मानते हुए इसे सुधारने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि इस मामले में कार्रवाई की जाएगी। सोमवार को कांग्रेस का 131वां स्थापना दिवस है, ऐसे में विपक्ष इसे हथियार बनाने की तैयारी में है।

Tuesday, 17 November 2015

कहा से आया ISIS ?

पूरी दुनिया में इस वक्त एक ही नाम ISIS की चर्चा है। आखिर ये IS या ISI या फिर ISIS है क्या? कहां से आया, क्यों आया, किसकी वजह से आया और इसे कौन लाया? ISIS के जन्म से लेकर इसे जन्म देने वाले और फिर उसे पालने-पोसने वाले तमाम लोगों के बारे में जानें।
2006 से बगदादी ने की शुरूआत
एक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका इराक को सद्दाम हुसैन के चंगुल से आजाद करा चुका था। पर इस आजादी को हासिल करने के दौरान इराक पूरी तरह बर्बाद हो चुका था। अमेरिकी सेना के इराक छोड़ते ही बहुत से छोटे-मोटे गुट अपनी ताकत की लड़ाई शुरू करने लगे। उन्हीं में से एक गुट का नेता था अबू बकर अल बगदादी । अल-कायदा इराक का चीफ। वो 2006 से ही इराक में अपनी जमीन तैयार करने में लगा था। मगर तब ना उसके पास पैसे थे, ना कोई मदद और ना ही लड़ाके।
अल-कायदा इराक बना ISI
दरअसल अमेरिकी सेना 2011 में जब इराक से लौटी, तब तक वो इराकी सरकार को बर्बाद कर चुकी थी। सद्दाम मारा जा चुका था। इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से तबाह हो चुके थे और सबसे बड़ी बात ये कि वो इराक में खाली सत्ता छोड़ गए थे। संसाधनों की कमी के चलते तब बगदादी ज्यादा कामयाब नहीं हो पा रहा था। हालांकि इराक पर कब्जे के लिए तब तक उसने अल-कायदा इराक का नाम बदल कर नया नाम आईएसआई यानी इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक रख लिया था।

इराक से मायूस बगदादी पहुंचा सीरिया
बगदादी ने सद्दाम हुसैन की सेना के कमांडर और सिपाहियों को अपने साथ मिला लिया। इसके बाद उसने शुरुआती निशाना पुलिस, सेना के दफ्तर, चेकप्वाइंट्स और रिक्रूटिंग स्टेशंस को बनाना शुरू किया। अब तक बगदादी के साथ कई हजार लोग शामिल हो चुके थे, पर फिर भी बगदादी को इराक में वो कामयाबी नहीं मिल रही थी। इराक से मायूस होकर बगदादी ने सीरिया का रुख करने का फैसला किया। सीरिया तब गृह युद्ध झेल रहा था। अल-कायदा और फ्री सीरियन आर्मी वहां के दो सबसे बड़े गुट थे, जो सीरियाई राष्ट्रपति से मोर्चा ले रहे थे।
चार साल तक सीरिया में नहीं मिली कामयाबी
पहले चार साल तक सीरिया में भी बगदादी को कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली। अलबत्ता इस दौरान उसने एक बार फिर से अपने संगठन का नाम बदल कर अब आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) कर दिया था। जून 2013 को फ्री सीरियन आर्मी के जनरल ने पहली बार सामने आकर दुनिया से अपील की थी कि अगर उन्हें हथियार नहीं मिले तो वो बागियों से अपनी जंग एक महीने के अंदर हार जाएंगे।
पलट गए आईएसआईएस के दिन
इस अपील के हफ्ते भर के अंदर ही अमेरिका, इजराइल, जॉर्डन, टर्की, सऊदी अरब और कतर ने फ्री सीरियन आर्मी को हथियार, पैसे, और ट्रेनिंग की मदद देनी शुरू कर दी। इन देशों ने बाकायदा सारे आधुनिक हथियार, एंटी टैंक मिसाइल, गोला-बारूद सब कुछ सीरिया पहुंचा दिया और बस यहीं से आईएसआईएस के दिन पलट गए। दरअसल जो हथियाऱ फ्री सीरियन आर्मी के लिए थे, वो साल भर के अंदर आईएसआईएस तक जा पहुंचे क्योंकि तब तक आईएस फ्री सीरियन आर्मी में सेंध लगा चुका था और उसके बहुत से लोग उसके साथ हो लिए थे। साथ ही सीरिया में फ्रीडम फाइटर का नकाब पहन कर भी आईएस ने दुनिया को धोखा दिया। इसी नकाब की आड़ में खुद अमेरिका तक ने अनजाने में आईएस के आतंकवादियों को ट्रेनिंग दे डाली।
जाने-अनजाने अमेरिका का ही हाथ
आईएसआईएस के जन्म के पीछे जाने-अनजाने अमेरिका का ही हाथ रहा। ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका की मदद की वजह से ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा का जन्म हुआ। ठीक वैसे ही जैसे 1980 में ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए कैमिकल हथियार देकर अमेरिका ने सद्दाम को सद्दान हुसैन बनाया। ठीक वैसे ही सीरिया के फ्रीडम फाइटर को अमेरिका ने हथियार और ट्रेनिंग दी और अब वही फ्रीडम फाइटर आईएसआईएस के बैनर तले लड़ रहे हैं।
2013 में स्नोडेन का बड़ा खुलासा
जुलाई 2014 में ईरान के अखबार तेहरान टाइम्स को दिया गया एडवर्ड स्नोडेन का इंटरव्यू आईएस को बढ़ाने में अमेरिकी मदद की एक और थ्योरी का खुलासा करता है। एडवर्ड स्नोडेन वही शख्स हैं, जिन्होंने 2013 में अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के मकड़जाल का खुलासा किया था। स्नोडेन के मुताबिक अमेरिका, ब्रिटेन और इजराइल ने मिलकर बगदादी के संगठन आईसिस को मजबूत किया।
इजराइल ने दी बगदादी को हथियार चलाने की ट्रेनिंग
इस प्लान को बीहाइव यानी मधुमक्खी का छत्ता कोड नेम दिया गया। मकसद था कि इजराइल के आस-पास वाले देशों में आतंकवाद की ऐसी ताकत खड़ी की जाए जिसमें इजराइल विरोधी देश उलझकर रह जाएं और इजराइल सुरक्षित रहे। स्नोडेन के मुताबिक इजराइल ने खुद साल भर बगदादी को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी। खुद अमेरिका ने बगदादी से मिडिल ईस्ट में अपने दुश्मनों पर हमला कराया और मध्य एशियाई मुल्कों में आतंक फैलाकर अपनी सेनाओं को इन देशों में भेजा।
सीरिया, लीबिया और इराक तीनों ही तेल के लिहाज से काफी अमीर हैं। अमेरिका के बारे में कहा जाता है कि वहां से तेल निकालने के लिए अमेरिका ने आईएसआईएस को आगे बढ़ाया और इसमें अमेरिका की मदद सऊदी अरब और तुर्की ने की। जानकारों का मानना है कि तेल के इस खेल में आईएस को रोजाना 26 करोड़ 50 लाख रुपये आता है।

एक साल में ISIS का इन इलाकों में कब्जा
आईएसआईएस अब तक सीरिया और इराक के एक बड़े हिस्से पर अपना कब्जा जमा चुका है। इनमें इन दोनों देशों के कई बड़े शहर भी शामिल हैं। इराक में तो आईएसआईएस अब लगातार बगदाद की तरफ बढ़ता जा रहा है। जून 2014 से ISIS ने इराक और सीरिया में जो कहर बरपाना शुरू किया वो आजतक बदस्तूर जारी है। ISIS के आतंकवादी इराक और सीरिया के कई अहम शहरों पर कब्ज़ा कर चुके हैं और इन इलाकों में अपनी सरकार भी चला रहे हैं।
ISIS ने सीरिया के रक्का, पामयेरा, दियर इजौर, हसाक्का, एलेप्पो, हॉम्स और यारमुक इलाके के कई शहरों पर कब्जा जमाया हुआ है। ISIS ने इराक के भी कई शहरों पर कब्जा कर रखा है। मसलन रमादी, अनबार, तिकरित, मोसुल और फालुजा ISIS के आतंकवादियों के कब्जे में हैं। इराक में तो आलम ये है कि ISIS के आतंकी रमादी जीतने के बाद बगदाद की तरफ बढ़ रहे हैं।


Monday, 2 November 2015

आंखों में धूल झोंकने वाला अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन की अनकही दास्तां


करीब दो दशक से भारतीय पुलिस की आंखों में धूल झोंकने वाला अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन आखिरकार कानून की गिरफ्त में आ चुका है. 25 अक्टूबर को इंडोनेशिया के बाली में उसको गिरफ्तार कर लिया गया. यह ऑपरेशन सीबीआई, इंटेलीजेंस यूनिट, मुंबई क्राइम ब्रांच, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया पुलिस के साथ इंटरपोल के सफल कोऑर्डिनेशन के जरिए सफल हो सका. उसे लाने के लिए सीबीआई की टीम बाली पहुंच चुकी है.

कभी दाऊद इब्राहिम की पनाहों में रहने वाला छोटा राजन मुंबई हमलों के बाद उससे अलग हो गया था. अंडरवर्ल्ड में दाऊद और छोटा राजन गैंग के बीच कई बार टकराव भी हुए. जानलेवा हमलों की खबरें भी आईं. लेकिन वह पुलिस और दाऊद की नजरों से बचता रहा. हमेशा वीओआईपी के जरिए कॉल करने वाले राजन ने 24 अक्टूबर को व्हाट्सएप के जरिए अपने एक शुभचिंतक को फोन किया, जिसे सुरक्षा एजेंसियों ने टेप कर लिया.

फोन पर छोटा राजन ने कहा कि वह ऑस्ट्रेलिया में सुरक्षित नहीं है. बहुत जल्द से यहां से निकल जाएगा. इसके बाद सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट हो गईं. इंटरपोल ने भी अलर्ट जारी कर दिया. 25 अक्टूबर को ऑस्ट्रेलियन फेडेरल पुलिस को खबर मिली कि भारतीय मूल का एक नागरिक बाली जा रहा है. ऑस्ट्रेलिया ने फौरन इंटरपोल के जरिए बाली इमिग्रेशन डिपार्टमेंट को इसकी सूचना दी और छोटा राजन को एयरपोर्ट पर ही गिरफ्तार कर लिया गया.

कौन है छोटा राजन
छोटा राजन का असली नाम राजेंद्र सदाशिव निखलजे है. उसे प्यार से 'नाना' या 'सेठ' कहकर भी बुलाते हैं. उसका जन्म 1960 में मुंबई के चेम्बूर की तिलक नगर बस्ती में हुआ था. महज 10 साल की उम्र में उसने फिल्म टिकट ब्लैक करना शुरू कर दिया. इसी बीच वह राजन नायर गैंग में शामिल हो गया. जुर्म की दुनिया में नायर को 'बड़ा राजन' के नाम से जाना जाता था. यह नायर का दाहिना था, इसलिए लोग इसे 'छोटा राजन' कहने लगे.

ऐसे हुआ दाऊद से हुआ संबंध
बड़ा राजन की मौत से बाद छोटा राजन ने पूरे गैंग की कमान संभाल ली. इसी दौरान अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से इसका संबंध बन गया. दोनों एक साथ मिलकर मुंबई में वसूली, हत्या, तस्करी और फिल्म फाइनेंस का काम करने लगे. 1988 में वह दुबई चला गया. इसके बाद दाऊद और राजन मिलकर भारत ही नहीं पूरी दुनिया में गैर-कानूनी काम करने लगे. मुंबई में उनकी तूती बोलने लगी. लेकिन इसी बीच कुछ ऐसा हुआ, जिसने उनको अलग कर दिया.

क्यों हुई दाऊद से दुश्मनी
भारत में अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहिम के बाद बड़े गैंगस्टरों में दूसरे नंबर पर छोटा राजन का ही नाम आता है. वह लंबे समय तक डी कंपनी के साथ काम करता रहा. लेकिन बाबरी कांड के बाद 1993 में मुंबई बम ब्लास्ट ने राजन को दहला दिया. जब उसे पता चला कि इस कांड में दाऊद का हाथ है, तो वह उसका दु्श्मन बन बैठा. उसने खुद को दाऊद से अलग करके नया गैंग बना लिया. दोनों एक-दूसरे के जानी-दुश्मन बन बैठे.

कई बार हुए जानलेवा हमले
मुंबई ब्लास्ट के बाद दाऊद और राजन ने भारत छोड़ दिया. इस दौरान दोनों एक-दूसरे को मारने का प्लान बनाते रहे. दाऊद ने छोटा राजन पर कई बार जानलेवा हमला करवाया, लेकिन वह बचता रहा. राजन पर हमले की बड़ी साजिश दुबई में दाऊद के खास शूटर शरद शेट्टी के घर में रची गई. साल 2000 में पिज्जा डिलीवरी ब्वॉय बनकर आए दाऊद के लोगों ने बैंकॉक के एक होटल में राजन पर हमला कर दिया.

ऐसे लिया हमले का बदला
छोटा राजन पर कई राउंड फायरिंग की गई, लेकिन वह वहां से बचकर भाग निकला. कहा जाता है कि छोटा राजन को बचाने में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का भी हाथ था. हालांकि, इसे खुद राजन इस बात से इंकार करता है. बैंकॉक में हुए हमले का उसने बदला लिया. उसका हवाला कारोबार संभालने वाले उसके भाई रवि और विमल ने 2003 में दुबई के एक क्लब में छोटा शकील के खास शरद शेट्टी की हत्या कर दी थी.

जब छोटा राजन ने कहा था, 'मैं जिंदा हूं'
अप्रैल, 2014 में बड़ी तेज़ी से एक खबर उड़ी थी. खबर ऐसी थी कि पूरे अंडरवर्ल्ड के साथ-साथ खुद पुलिस भी सकते में रह गई. कहा गया कि अंडरवर्ल्ड डॉन और डी कंपनी के जानी दुश्मन छोटा राजन की मौत हो गई है. ये भी बताया गया कि छोटा राजन की किडनी पहले से ही खराब थी. डायलसिस के दौरान उसकी हालत और खराब हो गई जिससे उसकी जान चली गई. इस खबर के आने के बाद छोटा राजन ने फोन पर बातचीत में आजतक से कहा...'मैं जिंदा हूं'. मेरे मरने की झूठी खबर दाऊद इब्राहिम फैला रहा है.

छोटा डॉन पर दर्ज हैं कई केस
भारत में छोटा राजन पर 65 से ज्यादा आपराधिक केस दर्ज है. राजन नायर गैंग में रहते हुए उसके खिलाफ पहले से अवैध वसूली, धमकी, मारपीट और हत्या की कोशिश के मामले दर्ज थे. दाऊद के साथ आने के बाद उसका क्राइम ग्राफ बढ़ गया. भारत में उसके खिलाफ 20 से ज्यादा लोगों की हत्या के केस दर्ज हैं. सन 2011 में मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या में भी उसका हाथ माना जाता है.

डॉन के लिए यूपी से जाते थे शूटर
भारतीय जांच एजेंसियों के मुताबिक, छोटा राजन के ज्यादातर शूटर यूपी के हुआ करते थे. इलाहाबाद, अंबेडकरनगर, बाराबंकी, सीतापुर, आजमगढ़ और जौनपुर जैसे जिलों से शूटर्स भेजे जाते थे. शूटर्स की सप्लाई का काम राजेश यादव नाम का एक शख्स किया करता था. मुंबई के चर्चित काला घोड़ा और फरीद तनाशा हत्याकांड में राजेश का भी नाम आया था. इसके साथ ही पूर्वांचल का माफिया डॉन बबलू श्रीवास्तव भी उसका करीबी था.

ऐसा है छोटा राजन का साम्राज्य
अंडरवर्ल्ड के इस डॉन ने अपना कारोबार भारत से समेट कर विदेशों में जमाया. आज तक को मिली जानकारी के मुताबिक, दुबई में काम बंद करने के बाद उसने मलेशिया का रुख किया. उसने जर्काता में डांस बार, डिस्को और नाइट क्लब खोल दिए. मलेशिया में कारोबार जम जाने के बाद थाईलैंड में भी ऐसा ही कारोबार खड़ा कर लिया. इसके अलावा उसने विदेशों में कई जगह बेनामी संपत्ति अर्जित की है.

लेडी डॉन है छोटा राजन की पत्नी
छोटा राजन की पत्नी का नाम सुजाता निखलजे है. उस पर साल 2006 में एक्सटॉर्शन का मामला दर्ज किया गया था. उसकी तीन बेटियां हैं. एक बेटी ब्रिटेन में एमबीए कर रही है. दूसरी इंजीनियर है. राजन की पत्नी सुजाता उर्फ नानी चेंबूर के तिलकनगर में रहती है. मुंबई पुलिस ने उसको बिल्डर से फिरौती मांगने के केस में हिरासत में लिया था. छोटा राजन और सुजाता की शादी में दाऊद भी आया था. सुजाता दाऊद को भाई मानती थी.

यहां बीता था डॉन का बचपन
पश्चिम महाराष्ट्र के सतारा के फल्तान तहसील के गिरवी गांव में छोटा राजन का पैतृक घर है. वहां कभी एक झोपड़ी हुआ करती थी, जो अब एक महलनुमा बंगले में बदल चुकी है. यहां छोटा राजन ने अपना बचपन बिताया था. गांववालों ने बताया कि पारिवारिक समारोह में राजन के भाई यहां आते रहते हैं. इस बंगले में राजन के पिता सदाशिव सखाराम निकाल्जे की मूर्ति भी है, जो 50 के दशक में मुंबई चले गए थे.

पैतृक गांव जाते हैं उसके परिजन
राजन के पैतृक गांव के एक बुजुर्ग बताते हैं कि वह अच्छा बच्चा था. अक्सर उनकी दुकान पर आता था. गर्मियों और दिवाली की छुट्टियों में उसके परिवार के लोग हमेशा गांव आते थे. अंडरवर्ल्ड की दुनिया में कुख्यात होने के बाद राजन ने गांव आना छोड़ दिया. हालांकि उसकी पत्नी और भाई परिवार में कोई समारोह होने पर गांव आते रहते हैं. 1976 में राजन के पिता की मृत्यु हो गई थी.

ऐसे पकड़ा गया छोटा राजन
25 अक्टूबर को इंडोनेशिया के बाली में अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन को गिरफ्तार किया गया. इससे पहले भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने उसकी एक फोन कॉल टेप की झी, जिससे पता चला कि वह ऑस्ट्रेलिया में सुरक्षित नहीं है. बहुत जल्द से वहां से निकल जाएगा. इसके बाद सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट हो गईं. रविवार को ऑस्ट्रेलियन फेडेरल पुलिस को खबर मिली कि भारतीय मूल का एक नागरिक बाली जा रहा है.

पुलिस ने एयरपोर्ट पर लिया दबोच
खबर जब तक मिली तब तक प्लेन सिडनी एयरपोर्ट छोड़ चुका था. इसके बाद ऑस्ट्रेलियन फेडेरल पुलिस ने फौरन इंटरपोल के जरिए बाली इमिग्रेशन डिपार्टमेट को इसकी सूचना दी. खबर मिलते ही बाली एयरपोर्ट फौरन हरकत में आता है. इमिग्रेशन और बाली पुलिस प्लेन लैंड करते ही उस शख्स को फौरन दबोच लिया, जिसकी सूचना इंटरपोल से मिली रहती है. पासपोर्ट पर लगी फोटो से उसकी पहचान हो जाती है.

गिरफ्तारी के वक्त डरा था राजन
हालांकि, छोटा राजन के पासपोर्ट में मोहन कुमार नाम लिखा था. लेकिन पुलिस के पास मौजूद फोटो से उसका चेहरा मैच हो गया और पता चल गया कि पकड़ा गया शख्स इंडिया का मोस्ट वॉन्टेड राजेंद्र सदाशिव निखलजे है, जो 22 सालों से फरार था. गिरफ्तारी के समय छोटा राजन डरा हुआ था. उसने खुद पर खतरे की बात भी कबूल की. उसने बताया कि डी कंपनी यानी दाऊद का गैंग उसके पीछे पड़ा हुआ है.

महत्वपूर्ण है छोटा राजन की गिरफ्तारी
छोटा राजन की गिरफ्तारी भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. वह कई मामलों में वांछित है. एक वक्त में वह भारत के मोस्ट वॉन्टेड अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का सबसे खास आदमी था. वह भारतीय एजेंसियों को उसके बारे में अहम जानकारी दे सकता है. उसके सहारे एजेंसियां दाऊद के नेटवर्क में भी सेंध लगा सकती हैं. इसके साथ ही उन भारती नामों का भी खुलासा हो सकता है, जो दाऊद की मदद करते हैं.

दाऊद के खिलाफ भारत की मदद
कभी दाऊद का जिग्री दोस्त छोटा राजन 1993 में हुए बम ब्लास्ट के बाद अलग हो गया. उसके बाद दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन हो गए. दोनों भारत छोड़कर विदेश में रहने लगे, लेकिन एक-दूसरे को मारने का प्लान भी बनाते रहे. छोटा राजन की मदद से भारत दाऊद इब्राहिम को पाकिस्तान में ही मारने की योजना बना चुका था, लेकिन मुंबई पुलिस के कुछ अफसरों की वजह से वह बच गया.

मुंबई पुलिस ने प्लान किया फ्लॉप
पूर्व गृह सचिव आरके सिंह ने आजतक से बातचीत में खुलासा किया था कि अटल सरकार के समय दाऊद को मारने के लिए छोटा राजन गैंग के लोगों को ट्रेनिंग दी गई थी. इस मिशन को वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल निर्देशित कर रहे थे. दिल्ली के एक होटल में पूरी तैयारी हो चुकी थी. इसी बीच मुंबई क्राइम ब्रांच की टीम वहां पहुंच गई और उन शूटरों को गिरफ्तार कर लिया.

दाऊद से नहीं डरता डॉन
अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन ने बुधवार को बाली में कहा कि वह दाउद इब्राहिम के गैंग से नहीं डर रहा है. उसने यह बात तब कही है जब इंडोनेशिया की पुलिस ने विशेष कमांडो सुरक्षा के बीच ले जा रही थी. बाली पुलिस के प्रवक्ता हेरी वियांतो ने कहा कि उन्हें राजन के सामने मौजूद खतरों के बारे में पता है. इसलिए उसकी सुरक्षा में विशेष कमांडों लगाए गए हैं. उसकी सुरक्षा में कोई चूक न हो सकती. वह बिल्कुल स्वस्थ्य है.

अंडरवर्ल्ड की दुनिया पर बनी फिल्में
बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड का रिश्ता काफी पुराना है. अंडरवर्ल्ड का बहुत पैसा फिल्मों लगता रहा है. कई एक्टर और एक्ट्रेस के नाम अंडरवर्ल्ड डॉन से जुड़ते रहे हैं. ऐसे उनकी जिन्दगी से प्रभावित फिल्में बनना स्वाभाविक है. छोटा राजन की जिंदगी पर भी कई फिल्में बनी हैं. अपराध जगत पर बनने वाली फिल्मों में महेश मांजरेकर की वास्तव: द रियलिटी, रामगोपाल वर्मा की कंपनी, सत्या, डी और वंस अप ऑन ए टाईम इन मुंबई प्रमुख हैं.

Tuesday, 6 October 2015

बिहार में महागठबंधन कौन पास कौन फेल?

वैसे तो बिहार का देश की राजनीति में हमेशा एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है !कहते है कि दिल्ली कि सत्ता का रास्ता बिहार से होकर ही गुजरता है ! लेकिन इस बार का चुनाव थोड़ा भिन्न है,बिहार के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हुआ है ! जब एक साथ कई सारी पार्टियाँ दाव आजमाने को तैयार है !
एक ओर विकास का चेहरा बने नीतीश कुमार जहां लालू और काँग्रेस के साथ मिलकर बिहार की गद्दी एक बार फिर सँभालने को तैयार है वही भारतीय जनता पार्टी भी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती ‘ रा.ज.द से निष्कासित साँसद बाहुबली पप्पू यादव ने जहां मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा खोल अपनी चुनौती को बरकरार रखा है ! वहीं ओबैसी की पार्टी AIMIM ने मुस्लिमि बाहुल सीमांचल में अपने उम्मीदवार उतारकर लालू के वोट बैंक पर प्रहार किया है !
कुछ पार्टी जिसके पास शायद खोने को ज्यादा नहीं है ! वो भी किसी और बड़ी पार्टी के पतवार के सहारे अपनी नैया पार लगाना चाहते है !जिसका ताजा उदाहरण मॉँझी की पार्टी हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा है ! महागठबंधन के इस महाखेल में लालू की पार्टी राजद ,जे डी यू और कांग्रेस सहित तीन पार्टियां है!

वहीं भारतीय जनता दल की सहयोगी पार्टियों में पासवान की लोजपा ,उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और मॉँझी की हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा सहित चार पार्टियाँ है !
तीसरा मोर्चा में समाजवादी पार्टी और पप्पू यादव की जान अधिकार पार्टी सहित कुल दो पार्टियाँ है ! और ओवैसी की AIMIM अकेली चुनाव लड़ रही है ! इतनी सारी पार्टियों की इस चुनावी खिचड़ी में देखना है कि कौन अपनी दाल गलाने में कामयाब हो पाता है!
अगर बात हम सम्भावनायो की करे तो मामला काफी दिलचस्प सा लगता है !
विकास का चेहरा लिए नीतीश कुमार को लालू की पार्टी रा ज द से गठबंधन महँगा पड़ सकता है !
वहीं काफी समय से सत्ता से बाहर चल रहे लालू यादव के लिए सत्ता से और बाहर रहना संभव नहीं होगा !
इन्होने तो इस चुनाव को पहले ही पिछडो और अगड़ो की लड़ाई घोषित कर चुके है ! वहीं बाहुबली पप्पू यादव ने जहां यादवो का नया नेता बनकर लालू की परेशानी बढा दी है तो ओवैसी ने मुस्लिम वोटो के दम पर अपनी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति चमकाने की कोशिश की है ! याद रहे कि ओवैसी को महाराष्ट्र में भी आंशिक सफलता मिली थी !

लालू के यादव और मुस्लिम वोटो पर पप्पू यादव और ओवैसी का प्रहार देखकर तो लगता है कि इस बार भी लालू की राह आसान नही होगी !
अब रही बात भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल की, तो उनके सामने कोई ख़ास चुनौती नहीं जान पड़ती ,क्योकि जहां मोदी का भ्रष्टाचार मुक्त चेहरा और उनकी एक कद्दावर नेता की छवि है !वही उनकी देश-विदेश में लोकप्रियता का परचम चरम पर है!
साथ ही ओवैसी मुस्लिम वोट काटकर अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय जनता पार्टी को ही मदद पहुँचा रहे है !
बहरहाल ,नतीजा जो भी हो ,कुल दस पार्टियो के इस चुनावी महासंग्राम में ऊँट किस करवट बैठता है ,ये तो बक्त ही बताएगा !

Thursday, 1 October 2015

वो आखिर सफर और हमारी यादे

अजीब दिन थे । बाहों में बाहें डाले चहलकदमी करते रहने के दिन । उतरते हुए सूरज और ढलती हुई शामों के दिन । दूजे के हाथों प्रेम संदेशा पहुँचाने के दिन । गली के नुक्कड़ पर उसका इतंजार करते रहने के दिन । किताबों के आखिरी सफहों पर मन में पिघल रहे कुछ शब्दों को लिख देने के दिन ।

ऐसे ही उन दिनों में कस्बाई सपने, जो सुबह सूरज के साथ उगते थे और ढलती हुई शामों के साथ छतों से कपड़ों की तरह उतार लिये जाते थे । कई आँखें थी आस पास जो मिल जाने पर शरमा कर झुक जाया करती थीं। कई आँखों में दबे-छुपे से प्रणय निवेदन तो कई आँखें जो भुलायी नहीं जा सकती । शराफत के दिन, नजाकत के दिन, मोहब्बत के दिन, आरजुओं के दिन ।

वो उसे बस यूँ ही एक रोज़ अपनी छुट्टियों के होने पर वापसी में घर जाते हुए उसी स्टेशन पर मिल गयी । तब ना यूँ किसी को 'फ्लर्ट' करने के तरीके आते थे और ना ही कोई किसी को 'इम्प्रेस' करने की कोशिश किया करता था । बहुत सादगी हुआ करती थी । एक दूजे के आमने सामने बैठे हुए भी कई घंटे बिना बात किये हुए बीत जाते थे और जो नज़रें मिल जाएँ तो अन्दर ही अन्दर अजीब सी हलचल सी मच जाया करती थी ।

कनिका, हाँ यही तो नाम बताया था उसने जब वो विनय को दूसरी बार फिर यूँ ही उसी रास्ते घर को जाने के लिये स्टेशन पर मिली थी । फिर हर बार ही उनमें कुछ ऐसी अनकही बातें सी हो गयीं थीं कि छुट्टियां होने पर वो स्टेशन पर एक दूजे का इंतज़ार किया करते और जब तक दूसरा ना आ जाता तब तक पहला ना जाता । बड़े सुहाने दिन थे, तब शायद वो रेलगाड़ियाँ भी दोस्त हुआ करती थीं । जो दोनों के साथ हो जाने तक वहीँ खड़ी रहती थीं।


कनिका  को विनय  दो स्टेशन पहले ही उतरना होता था । तब आज की तरह उन कस्बाई रूहों में बाय बाय या टाटा-टाटा कहने का रिवाज नहीं हुआ करता था । बस विनय उसका सामान उसे उसके रेलगाड़ी से नीचे उतर जाने पर पकड़ा दिया करता था और कनिका "अच्छा" कहती हुई चली जाया करती थी ।

जब साथ हुआ करते तो उन्हें सब पता रहता था कि अब कौन सा स्टेशन आएगा या किस स्टेशन पर कौन सी खाने की चीज़ अच्छी मिलती है । दूसरे के बोलने से पहले ही कोई बोल पड़ता कि चलो ये खायें या फिर कभी कभी दोनों एक साथ ही बोल पड़ते, ये भी एक अजीब बात थी कि दोनों की जुबान से एक से ही लफ्ज़ निकलते थे
साथ वापस आते और फिर साथ ही दोबारा कॉलेज जाते हुए उस दूर बसे दूसरे शहर के लिये दिल में कुछ पैदा हो गया था । शायद ऐसा कुछ कि क्या ये नहीं हो सकता कि ये जिंदगी ऐसे ही सफ़र करते हुए कट जाए । कहने को तो ना ही कनिका ने कुछ कहा था और ना ही विनय ने कभी कुछ पूंछना चाहा ।

उन्हीं दिनों में जब "आई लव यू" कहने का रिवाज़ ना था । ना ही कोई अपने प्रेम का इजहार यूँ खुले रूप में करता था । मौन स्वीकृतियां ही प्रेम कहानी बन जाया करती थी । तब तो बस वही भोले भाले से प्रेम पत्र हुआ करते थे जो कि चाहने वालों के दिलों से निकली हुई आवाजें दूजे के दिल तक पहुँचाया करते थे ।

वो चेहरे के भाव, वो आँखें, वो ख़ामोशी और फिर रह रहकर कुछ बात कर लेने की आदत । सब कुछ तो याद हो गया था विनय को । एक दूजे की कई आदतें पता चल चुकी थीं, उन किये हुए सफर के दौरान । दोनों ओर से मौन रहते हुए भी, कुछ भी ऐसा नहीं था कि जो कहने को बाकी था ।

तब उस रोज़ वो अकेली नहीं थी । एक बुजुर्ग चेहरा भी उस चेहरे के साथ था । साफ़ था, कि वो जाहिरी तौर पर उसके पिताजी ही थे । उस रोज़ रेलगाड़ी भी वही थी और सफ़र करने वाले भी वही, मगर आँखों में ख़ुशी नहीं थी । सवाल तो कभी उन आँखों ने पूंछे ही न थे । तब उस रोज़ की ख़ामोशी ने सब कुछ पहले ही बयाँ कर दिया था । ऐसी गहरी ख़ामोशी तो कभी न रही थी उस चेहरे पर जो कि सीधे दिल में उतर जाए और छा जाए एक खामोश पल बनकर ।

जब रेलगाड़ी से उतरते हुए उसने वो किताब उस बुजुर्ग चेहरे के सामने ही विनय को वापस की थी । तो बहुत कुछ तो बिना जाने ही उस दिल को आभास हो चला था ।

किताब का आखिरी सफ़हा जो कि अब कनिका की जुबाँ थी और जो कह रही थी । अब अगले बरस मैं नहीं आ सकूँगी, आगे की पढाई शायद अब मैं ना कर सकूँ । पिताजी अब यही चाहते हैं ।

उस आखिरी सफ़हे का साफ़ कहना था कि अब कनिका फिर इस सफ़र पर नहीं आएगी और आगे की पढाई ना करने का मतलब था कि उसके पिताजी ने उसका रिश्ता कहीं तय कर दिया है । उस रोज़ वो कनिका का आखिरी सफ़र था जिसमें कब कौन सा स्टेशन गुज़र गया, ना ही तो कनिका ने जानना चाहा था और ना ही विनय ने ।

ट्रेन से उतर जब वो उस पुल पर पहुँची थी तब उसने पलट कर एक बार देखा था और जाते हुए अपना रुमाल गिराया था । विनय तब चाहते हुए भी वहाँ पहुँच वो रुमाल नहीं उठा सका था । रेलगाड़ी में उसका सामान रखा हुआ था । किताबें, पेन, कपड़े और वो आखिरी किताब भी जिसके आखिरी सफ़हे पर कनिका के लिखे हुए आखिरी लफ्ज़ थे । रेलगाड़ी चल दी थी और तब विनय के पास इतना वक़्त ना था कि वो दौड़कर जाकर उस रुमाल को उठा ले । उसकी आखिरी निशानी भी तो ना ले सका था विनय।

इतने बरस बीत गये । पता नहीं कहाँ होगी कनिका । उस आखिरी रोज़ के आखिरी सफ़र में वो निशानी भी जाती रही ।