आजाद भारत में सत्ता, अधिकार और दबंगई की प्रतीक रही एम्बेस्डर कार का निर्माण
आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया है..और इसी के साथ..देश में एक युग का अंत हो गया।
एम्बेस्डर कार बनाने वाले हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड के आर्थिक तंगी से जूझ रहे
उत्तरपाडा संयंत्र को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया है.. पश्चिम बंगाल में हुगली
जिले के उत्तरपाड़ा में....देश का पहला और एकमात्र ओटोमोबाइल प्लांट... हिंद
मोटर पिछले कई सालों से आर्थिक तंगी का सामना कर रही है। देश में साल 1942 में पहली
स्वदेशी कार बनाने वाली ये कंपनी.... समय के साथ और ईंधन की बढ़ती कीमत के मुताबिक
कार के माडलों को एडवांस नहीं बना पाई, जिससे इसे आर्थिक रूप से काफी नुकसान झेलना
पड़ा... और आखिरकार प्लांट में काम रोकना पड़ा।
आधी सदी से अधिक समय तक भारतीय सडकों पर राज करने वाली हिन्द मोटर्स की सफेद एम्बेस्डर कार भारतीय समाज में पद और प्रतिष्ठा का हिस्सा बनी रही। भारत सरकार ने कई साल अपने बेड़े में एम्बेस्डर कार की संख्या कम करने का फैसला किया तो इसके बुरे दिन शुरू हो गए. ...नई तकनीक वाली कारों के आने से इसकी लोकप्रियता कम होने लगी और ग्राहक नई कारों की तरफ रुख करने लगे... बाजार में नई कारों के मुकाबले ये पिछड़ने लगी और ग्राहकों को नहीं लुभा पाई.... सरकारी अधिकारियों और नेताओं के सुरक्षा मानकों पर ये गाड़ी फेल होने लगी...यही वजह है कि दिन-ब दिन बाजार में एम्बेस्डर की मांग कम होने लगी..और एक वक्त ऐसी आया.. कि इसकी बिक्री ना के बराबर रह गई...
बाजार में मांग कम होने के चलते कपंनी का उत्पादन घटने लगा , फैक्ट्री का मेंटीनेंस, रखरखाव बढ़ता चला गया.... जो कंपनी के लिए महंगा साबित हुआ...एम्बेस्डर कार बनाने वाले हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड आर्थिक तंगी के मकड़जाल में उलझ गई... उत्तरपाडा संयंत्र को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया। एम्बेस्डर कार बनाने वाली कंपनी में ताला लगने के साथ ही.. ये कार हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास के पन्नो में दर्ज हो गई... आने वाली पीढ़ियां भले ही इसे याद न करें लेकिन पुराने लोगो की जो यादें एम्बेस्डर के साथ जुड़ी हैं..उन्हें शायद ही वो कभी भुला पाएं।
जापानी कंपनी टोयटा के बाद एशिया की इस दूसरी सबसे पुरानी कार कंपनी की स्थापना..आजादी से पांच चाल पहले 1942 में हुई थी... तब से लगातार पांच दशक तक... कार बाजार में इन कारों का एकछत्र राज रहा... लेकिन 90 के दशक में मारूति के बाजार में उतरने से... एम्बेस्डर की स्थिति डांवाडोल होने लगी। 80 के दशक में देस में साला 24 हजार एम्बेसडर कारें बिकती थीं... लेकिन 90 के दशक में ये संख्या कुल 12 हजार रह गई। इसके बाद तो प्लांट को चलाना.. घाटे का सौदा हो गया था... घाटे से उबरने के लिए कंपनी ने फैक्ट्री परिसर की 314 एकड़ अतिर्क्त ज़मीन बेच दी... लेकिन हालात नहीं बदले...2012 में कंपनी को बीमार घोषित कर भारतीय औद्योगिक पुनर्गठन बोर्ड यानी बीआईएफआर के हवाले कर दिया गया...पिछले साल के आखिर तक... कंपनी का घाटा बढ़कर सौ करोड़ तक पहुंच गया था.. इस घाटे की भरपाई के लिए कंपनी ने चेन्नई स्थित प्लांट को भी बेच दिया... लोकिन घाटे पर अंकुश नहीं लगाया जा सका।
हिंदुस्तान मोटर्स के हालात बद से बदतर होते चले गए.... पिछले पांच सालों के दौरान एम्बेस्डर कारों की ज्यादातर बिक्री कोलकाता में टैक्सी को तौर पर इस्तेमाल होने लगी... लेकिन बाद में दूसरी कंपनी के इस क्षेत्र में घुसने की वजह से कंपनी को और झटका लगा। आखिरी कुछ में यहां रोजाना महज़ पांच कारें ही बन रही थीं... इसके मुकाबले दूसरे भारतीय आटोमोबाइल संयेत्रों में रोजाना औसतन 160 कारें बनती हैं। जबकि कंपनी के खर्चे जस के तस बने हुए थे।
लंबे समय से घाटे का दंश झेल रही हिस्दुसातन मोटर्स को आखिर कार एम्बेस्डर बंद करने का फैसला लेना पड़ा.. कंपनी में काम करने वाले 2400 कर्मचारियों के अलावा करोड़ों भारतीयों को उस वक्त धक्का लगा...जब हिंदुस्तान मोटर्स ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को इस बात की जानकारी दी..कि उन्होंने एम्बेस्डर कार के उत्पादन को रोक दिया है। कंपनी के प्रवक्ता राजीव सक्सेना ने बताया कि... 'कम उत्पादन, घटता अनुशासन, पैसों की कमी, मांग में कमी, ये सब बहुत भारी पड़ रहे थे और इन्हीं वजहों से एम्बेस्डर का उत्पादन रोक दिया गया है।'
कपंनी ने घाटे से उबरने के हर जतन किए..लेकिन हर कोशिश नाकाम साबित हुई...इस परिस्थिति में कार का उत्पादन कम करने के अलावा.. कंपनी के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था। हालांकि कि ये बात और है कि भारत की सबसे पुरानी कार होने के नाते करोड़ों लोगों की भावनाएं इससे जुड़ी हैं..लेकिन सच्चाई ये भी है कि कंपनी भावनाओं से नहीं चलती।
शायद आप नहीं जानते होंगे कि एम्बेस्डर गाड़ी सबसे पहले 1956 में इग्लैंड में बनाई गई थी... उस वक्त इसका नाम था मॉरिस ऑक्सफोर्ड.. लेकिन जैसे ही ये गाड़ी भारत में आई... ये भारत की पहचान बन गई... भारतीयों ने तो एम्बेस्डर को खूब प्यार दिया है... विदेश से आने वाले सौलानियों ने भी इसे खूब सराहा। लेकिन बदलते वक्त के साथ एम्बेस्डर का नशा लोगों के दिलों से उतरने लगा..और ये गाड़ियां सड़कों से लुप्त होने लगीं। आखिर क्या वजह रही कि कंपनी को एम्बेस्डर कार की रफ्तार रोकनी पड़ी।
पुरानी तकनीक बड़ी वजह - COMMON HEADER
ओटोमोबाइल विशेषज्ञों की मानें तो एम्बेस्डर कार क पछड़ने की सबसे बड़ी वजह उसका पुरानी डिजाइन और क्वालिटी है... क्योंकि 50 के दशक में जब इस गाड़ी की शुरुआत हुई थी.. तब से लेकर आज तक कंपनी ने इसके डिजाइन में कोई खास परिवर्तन नहीं किए.. वहीं गाड़ी की उपरी बनावट भी जस की तस बनी रही.. हालांकि कुछ नए मॉडल्स को लेकर कंपनी ने इसमें छोटे-मोटे सुधार भी किए..लेकिन खरीदारों कसौटी पर ये गाड़ी खरी नहीं उतर पाई।
विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि 'अगर कंपनी ने पिछले साठ साल के दौरान इसकी क्वालिटी में निरंतर सुधार किया होता तो ये गाड़ी भारतीय रॉल्स रॉयस बन सकती थी।' सत्ता, प्रतिष्ठान, अभिनेताओं, नौकरशाहों और बड़े अधिकारियों की पहली पसंद होने के बावजूद इस गाड़ी का बाजार से यूं रुखसत होना.. बेहद दुखदायी है। एम्बेस्डर के बंद होने से कंपनी में काम करने वाले करीब ढाई हजार कर्मचारी भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं... जिसके घरों में रोजी-रोटी के भी लाले पड़े हैं। कंपनी में पिछले छह महीनों से उन्हें कोई वेतन नहीं मिला... और ना ही काम बंद करते वक्त उन्हें किसी तरह का मुआवजा दिया गया । मतलब साफ है कि भले ही बंगाल सरकार कंपनी को दोबोरा शुरु करने की बात कह रही हो..लेकिन पहले से ही घाटे में चल रही..और करोड़ों के देनदारी से जूझ रही...हिंदुस्तान मोटर्स दोबारा चले.. ऐसा मुमकिन नज़र नहीं आता।
आधी सदी से अधिक समय तक भारतीय सडकों पर राज करने वाली हिन्द मोटर्स की सफेद एम्बेस्डर कार भारतीय समाज में पद और प्रतिष्ठा का हिस्सा बनी रही। भारत सरकार ने कई साल अपने बेड़े में एम्बेस्डर कार की संख्या कम करने का फैसला किया तो इसके बुरे दिन शुरू हो गए. ...नई तकनीक वाली कारों के आने से इसकी लोकप्रियता कम होने लगी और ग्राहक नई कारों की तरफ रुख करने लगे... बाजार में नई कारों के मुकाबले ये पिछड़ने लगी और ग्राहकों को नहीं लुभा पाई.... सरकारी अधिकारियों और नेताओं के सुरक्षा मानकों पर ये गाड़ी फेल होने लगी...यही वजह है कि दिन-ब दिन बाजार में एम्बेस्डर की मांग कम होने लगी..और एक वक्त ऐसी आया.. कि इसकी बिक्री ना के बराबर रह गई...
बाजार में मांग कम होने के चलते कपंनी का उत्पादन घटने लगा , फैक्ट्री का मेंटीनेंस, रखरखाव बढ़ता चला गया.... जो कंपनी के लिए महंगा साबित हुआ...एम्बेस्डर कार बनाने वाले हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड आर्थिक तंगी के मकड़जाल में उलझ गई... उत्तरपाडा संयंत्र को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया। एम्बेस्डर कार बनाने वाली कंपनी में ताला लगने के साथ ही.. ये कार हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास के पन्नो में दर्ज हो गई... आने वाली पीढ़ियां भले ही इसे याद न करें लेकिन पुराने लोगो की जो यादें एम्बेस्डर के साथ जुड़ी हैं..उन्हें शायद ही वो कभी भुला पाएं।
जापानी कंपनी टोयटा के बाद एशिया की इस दूसरी सबसे पुरानी कार कंपनी की स्थापना..आजादी से पांच चाल पहले 1942 में हुई थी... तब से लगातार पांच दशक तक... कार बाजार में इन कारों का एकछत्र राज रहा... लेकिन 90 के दशक में मारूति के बाजार में उतरने से... एम्बेस्डर की स्थिति डांवाडोल होने लगी। 80 के दशक में देस में साला 24 हजार एम्बेसडर कारें बिकती थीं... लेकिन 90 के दशक में ये संख्या कुल 12 हजार रह गई। इसके बाद तो प्लांट को चलाना.. घाटे का सौदा हो गया था... घाटे से उबरने के लिए कंपनी ने फैक्ट्री परिसर की 314 एकड़ अतिर्क्त ज़मीन बेच दी... लेकिन हालात नहीं बदले...2012 में कंपनी को बीमार घोषित कर भारतीय औद्योगिक पुनर्गठन बोर्ड यानी बीआईएफआर के हवाले कर दिया गया...पिछले साल के आखिर तक... कंपनी का घाटा बढ़कर सौ करोड़ तक पहुंच गया था.. इस घाटे की भरपाई के लिए कंपनी ने चेन्नई स्थित प्लांट को भी बेच दिया... लोकिन घाटे पर अंकुश नहीं लगाया जा सका।
हिंदुस्तान मोटर्स के हालात बद से बदतर होते चले गए.... पिछले पांच सालों के दौरान एम्बेस्डर कारों की ज्यादातर बिक्री कोलकाता में टैक्सी को तौर पर इस्तेमाल होने लगी... लेकिन बाद में दूसरी कंपनी के इस क्षेत्र में घुसने की वजह से कंपनी को और झटका लगा। आखिरी कुछ में यहां रोजाना महज़ पांच कारें ही बन रही थीं... इसके मुकाबले दूसरे भारतीय आटोमोबाइल संयेत्रों में रोजाना औसतन 160 कारें बनती हैं। जबकि कंपनी के खर्चे जस के तस बने हुए थे।
लंबे समय से घाटे का दंश झेल रही हिस्दुसातन मोटर्स को आखिर कार एम्बेस्डर बंद करने का फैसला लेना पड़ा.. कंपनी में काम करने वाले 2400 कर्मचारियों के अलावा करोड़ों भारतीयों को उस वक्त धक्का लगा...जब हिंदुस्तान मोटर्स ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को इस बात की जानकारी दी..कि उन्होंने एम्बेस्डर कार के उत्पादन को रोक दिया है। कंपनी के प्रवक्ता राजीव सक्सेना ने बताया कि... 'कम उत्पादन, घटता अनुशासन, पैसों की कमी, मांग में कमी, ये सब बहुत भारी पड़ रहे थे और इन्हीं वजहों से एम्बेस्डर का उत्पादन रोक दिया गया है।'
कपंनी ने घाटे से उबरने के हर जतन किए..लेकिन हर कोशिश नाकाम साबित हुई...इस परिस्थिति में कार का उत्पादन कम करने के अलावा.. कंपनी के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था। हालांकि कि ये बात और है कि भारत की सबसे पुरानी कार होने के नाते करोड़ों लोगों की भावनाएं इससे जुड़ी हैं..लेकिन सच्चाई ये भी है कि कंपनी भावनाओं से नहीं चलती।
शायद आप नहीं जानते होंगे कि एम्बेस्डर गाड़ी सबसे पहले 1956 में इग्लैंड में बनाई गई थी... उस वक्त इसका नाम था मॉरिस ऑक्सफोर्ड.. लेकिन जैसे ही ये गाड़ी भारत में आई... ये भारत की पहचान बन गई... भारतीयों ने तो एम्बेस्डर को खूब प्यार दिया है... विदेश से आने वाले सौलानियों ने भी इसे खूब सराहा। लेकिन बदलते वक्त के साथ एम्बेस्डर का नशा लोगों के दिलों से उतरने लगा..और ये गाड़ियां सड़कों से लुप्त होने लगीं। आखिर क्या वजह रही कि कंपनी को एम्बेस्डर कार की रफ्तार रोकनी पड़ी।
पुरानी तकनीक बड़ी वजह - COMMON HEADER
ओटोमोबाइल विशेषज्ञों की मानें तो एम्बेस्डर कार क पछड़ने की सबसे बड़ी वजह उसका पुरानी डिजाइन और क्वालिटी है... क्योंकि 50 के दशक में जब इस गाड़ी की शुरुआत हुई थी.. तब से लेकर आज तक कंपनी ने इसके डिजाइन में कोई खास परिवर्तन नहीं किए.. वहीं गाड़ी की उपरी बनावट भी जस की तस बनी रही.. हालांकि कुछ नए मॉडल्स को लेकर कंपनी ने इसमें छोटे-मोटे सुधार भी किए..लेकिन खरीदारों कसौटी पर ये गाड़ी खरी नहीं उतर पाई।
विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि 'अगर कंपनी ने पिछले साठ साल के दौरान इसकी क्वालिटी में निरंतर सुधार किया होता तो ये गाड़ी भारतीय रॉल्स रॉयस बन सकती थी।' सत्ता, प्रतिष्ठान, अभिनेताओं, नौकरशाहों और बड़े अधिकारियों की पहली पसंद होने के बावजूद इस गाड़ी का बाजार से यूं रुखसत होना.. बेहद दुखदायी है। एम्बेस्डर के बंद होने से कंपनी में काम करने वाले करीब ढाई हजार कर्मचारी भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं... जिसके घरों में रोजी-रोटी के भी लाले पड़े हैं। कंपनी में पिछले छह महीनों से उन्हें कोई वेतन नहीं मिला... और ना ही काम बंद करते वक्त उन्हें किसी तरह का मुआवजा दिया गया । मतलब साफ है कि भले ही बंगाल सरकार कंपनी को दोबोरा शुरु करने की बात कह रही हो..लेकिन पहले से ही घाटे में चल रही..और करोड़ों के देनदारी से जूझ रही...हिंदुस्तान मोटर्स दोबारा चले.. ऐसा मुमकिन नज़र नहीं आता।





