Wednesday, 14 May 2014

मोदी विरोध का विकल्प मोदी

सोलह मई को मतगणना होने वाली है । अभी से सरकार को लेकर क़यास लगा रहे होंगे । यह एक सामान्य और स्वाभाविक लोकतांत्रिक उत्सुकता है । सब अपने अपने अंदाज़ीटक्कर को लेकर भाँजेंगे । मैंने कहा था न कि तीन सौ आएगी मैंने कहा था न कि मोदी वोदी की कोई लहर नहीं है । गठबंधन की सरकार बनेगी या मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे । 


किसी की बात सही होगी तो किसी की ग़लत । लेकिन ज़रा मुड़कर चुनाव को देखिये तो समझ आयेगा कि क्यों बीजेपी की सरकार बन रही है । मोदी का विरोध तो हुआ मगर मोदी का कोई विकल्प नहीं दिया गया । तथाकथित सेकुलर ताक़तें आपस में लड़ रही थीं न कि मिलकर बीजेपी से । खुद को एक मतदाता की जगह रखकर सोचिये । वो इस चुनाव में मोदी विरोध के नाम पर भाग लेता भी है तो वोट किसे दे । यह चुनाव बीजेपी को हराने के लिए नहीं था । यह चुनाव था हर हाल में कांग्रेस को हराने के लिए । मोदी ने शुरू से ही कांग्रेस पर इतना हमला किया कि कांग्रेसियों को यक़ीन हो गया कि जनता इस बार ख़िलाफ़ है ।  इसका मनोवैज्ञानिक असर यह हुआ कि सहयोगी कांग्रेस के साथ खुलकर आने से रह गए । आम मतदाता एक साथ दो राष्ट्रीय दलों का विरोध करते हुए अलग अलग  कई क्षेत्रिय दलों के साथ क्यों जायेगा । वोटर भी सरकार के स्थायीत्व को समझता है । उसका काम भी मोदी विरोधी दलों ने ही आसान कर दिया । कोई साफ़ विकल्प न देकर । 

दूसरी बात यह है कि इस चुनाव में कई क्षेत्रिय दल सोते रहे । शायद जानबूझकर ही ऐसा किया । हर मैदान को बीजेपी के लिए छोड़ दिया । जनता उनके मोदी विरोध की गंभीरता को समझ रही थी । सपा ने बनारस में अपने ही काम का प्रचार नहीं किया और नीतीश ने बिहार में । दूसरी तरफ़ मोदी ने न सिर्फ टीवी रेडियो और होर्डिंग को छाप लिया बल्कि हर बूथ पर संघ की मदद से कई स्तर पर प्रचार किया । बनारस में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ साथ गुजरात मुंबई और यूपी से व्यापारियों कारोबारियों को भी भेजा । जाति भाषा के हिसाब से मतदाताओं को टारगेट किया । इससे अगर तुलना करें तो मोदी विरोधी दल दिन में सपने देख रहे थे कि उनकी तरह मतदाता भी मोदी का विरोधी है । 

मोदी विरोधियों ने व्यापक स्तर पर सांप्रदायिकता का मुद्दा उठाने के बजाए गुजरात दंगों से जोड़े रखा । मोदी का विरोध करते तो मुलायम का भी करना पड़ जाता । किसी ने कहा कि व्यक्तिवादी राजनीति हो रही है जैसे मोदी न होते तो सामूहिक नेतृत्व वाली बीजेपी  बहुत अच्छी थी ! इनकी लड़ाई मोदी तक ही सीमित रह गई । मोदी ने अच्छी बुरी सरकार का सपना तो बेच ही दिया लेकिन उनके विरोधी क्या बेच रहे थे । कौन सा सपना बेच रहे थे । इस चुनाव में कांग्रेस को क्यों जीतना चाहिए यह बात तो कांग्रेसी भी दावे से नहीं कह पा रहे थे । तो किसके भरोसे मोदी विरोधी यह कहने का नैतिक साहस करते । सपा बसपा को क्यों जीतना चाहिए क्या ये कहने का नैतिक साहस कर सकते थे । मोदी के सामने उनके विरोधी निहत्थे और सुस्त पड़े रहे । 

राजनीतिक हमलों में भी तमाम दलों ने मोदी को वाकओवर दिया । जबकि मोदी ने एक एक बात का जवाब दिया और संदेश दिया कि वे सबको सुन रहे हैं । मोदी विरोधी हल्का विरोध कर चुप रहे । कोई लहर नहीं है टाइप । विकल्प के अभाव में मतदाता के एक बड़े वर्ग ने उनकी कमज़ोरियों और खराब बयानों, इंटरव्यू के दौरान प्रेस पर हावी होने की आदतों को नज़रअंदाज़ कर दिया । नतीजा यह हुआ कि हर चौक चौराहे और गाँव गलियों में आम मतदाता भी मोदी की तरफ़ से बहस करने लगा । तथाकथित सेकुलर दल मोदी के ख़िलाफ़ 'काउंटर नैरेटेवि' नहीं रच सके । इन बहसों में जो मतदाता मोदी का विरोध भी करना चाहता था उसके पास तर्कों की कमी थी । हर तबके का नाराज़ मतदाता बीजेपी की तरफ़ गया । हर दल से निकल कर बीजेपी की तरफ़ गया । यूपी विधानसभा की तरह नहीं हुआ कि सपा को हराने के लिए बसपा को जीताया और बसपा को हराने के लिए सपा को । इसलिए विरोधी मतों के बँटवारे के कारण भी बीजेपी के पक्ष में संख्या समीकरण ज़्यादा बना । बीजेपी ही एकजुट और भयंकर डिटेलिंग के साथ चुनाव लड़ रही थी । 

ऊपर से मीडिया ने अपना स्पेस लुटा कर मोदी के ख़िलाफ़ हर काउंटर नैरेटिव की धार को कुंद कर दिया । आम मोदी विरोधी मतदाता  निहत्था हो गया । अकेला पड़ गया । हर समय मोदी । ख़बर और विज्ञापन दोनों जगह । बहस के सवाल मोदी की तरफ़ से रखे और पूछे गए । मतदाता के मन में ऊपर से लेकर नीचे कर मोदी की परत जम गई । कई दलों ने अच्छी दलीलें दीं मगर नहीं दिखाया । मोदी के ब्लाग को ख़बर बनाया लेकिन नीतीश के फ़ेसबुक अपडेट को छोड़ दिया । कांग्रेस लचर तरीके से बहस में आई तो बीजेपी का हर बड़ा प्रवक्ता कम टीआरपी वाले चैनलों में भी तैयारी के साथ गया । कांग्रेस के बड़े नेता अंग्रेज़ी चैनलों में गए तो बीजेपी के हिन्दी चैनलों में । सपा बसपा के तो प्रवक्ता ही नहीं आए । 

इसलिए मोदी विरोध का विकल्प भी मोदी ही बन गए । अब अगर बीजेपी के ख़िलाफ़ मतदाताओं में ग़ुस्सा था और वो किसी को नहीं दिखा सिर्फ मोदी विरोधियों को दिखा तो सचमुच सोलह को ज़लज़ला आ जायेगा । बीजेपी हार जाएगी । और अगर हार गई तो अगली बार बीजेपी के उम्मीदवार को उनके ही घर वाले चंदा नहीं देंगे । प्रचार तंत्र का सारा तामझाम फ़ेल हो जाएगा और साबित हो जाएगा कि यह चुनाव मोदी नहीं बल्कि जनता लड़ रही थी । यह बताने के लिए कि वो व्यक्तिवादी राजनीति के ख़िलाफ़ है । वो राजनीति में पैसे के इस हद तक इस्तमाल के ख़िलाफ़ है । ऐसा है तो भारतीय राजनीति में नए सूर्योदय के स्वागत के लिए तैयार रहिए । जहाँ सब फ़ेल हो जायेंगे ।  अगर ऐसा नहीं है तो कभी लालू कभी मायावती कभी आप के बहाने मोदी विरोधी खुद को दिलासा न दें । खुद से यह सवाल करें कि क्या कोई मतदाता विकल्पहीन स्थिति के लिए वोट करेगा ? वो मोदी को हराने के लिए क्यों वोट देता और किसे देता । जब कोई लड़ेगा नहीं तो वो जीतेगा कैसे । जीतता वही है जो लड़ता है । 

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