दक्षिण बेंगलुरू में स्थित शिव
का यह मंदिर है जहां साल में एक बार शिवलिंग का तिलक सूर्य की रौशनी से खुद होता
है। वह भी तब जब सूर्य उत्तरायण दिशा की ओर हो। वह दिन होता है मकरसंक्रांति का
दिन। यह मंदिर शहर का एक प्रमुख आकर्षण है। इसे गवीपुरम गुफा मंदिर के नाम से भी
जाना जाता है। यह अपने वास्तुशिल्पीय बनावट के लिए विख्यात है।
इसे कुछ इस तरह बनाया गया है कि
हर साल एक खास खास समय पर सूर्य की रौशनी मंदिर के गर्व गृह में रखी प्रतिमा पर
पड़ती है।
भगवान शिव और गवी गंगाधरेश्वरा
को समर्पित यह मंदिर इंडियन रॉक-कट आर्किटेक्चर का बेहतरीन नमूना है। इस मंदिर को 9वीं शताब्दी में एक मोनोलिथिक
रॉक से बनाया गया था।
मकर संक्रांति के दिन गवी गंगाधरेश्वरा मंदिर में हजारों की
संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यही वह दिन है जब सूर्य की रोशनी मंदिर में रखे
शिवलिंग पर करीब एक घंटे तक पड़ती है। सूर्य की रोशनी मंदिर के सामने रखी नंदी के
सिंघ के बीच से होकर गुजरती है। इससे यह पता चलता है कि हमारे प्रचीन मूर्तिकार
खगोल विद्या और वास्तुशिल्प के कितने अच्छे जानकार थे।
भगवान शिव का तीर्थस्थल होने के अलावा मंदिर में अग्नि के
भगवान की एक दुर्लभ प्रतिमा रखी गई है। आज गवी गंगाधरेश्वरा गुफा मंदिर एक स्मारक
है, जो पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम 1961 और कर्नाटक प्रचीन व
ऐतिहासिक स्मारक के अंतर्गत संरक्षित है।
यहां हर साल मकर संक्रांति के दिन इस विशेष नजारे को देखने
के लिए देश-विदेश के अनेक शिवभक्त यहां आते हैं।
कहा जाता है कि यहां सूर्यदेव की किरणें भगवान शिव को तिलक करती हैं।
वास्तव में जब सूर्यदेव मकर संक्रांति के दिन उत्तरायण में
आते हैं तो अपनी पवित्र और तेजयुक्त किरणों से भगवान शिव का अभिनंदन करते
हैं। यह नजारा प्रतिवर्ष दिखाई देता है और
जब मकर संक्रांति के दिन शाम को सूर्य रश्मियां इस तरह गिरती हैं मानो वे शिवलिंग
का तिलक कर रही हों।
इस अनूठे दृश्य में उल्लेखनीय यह है कि सूर्य रश्मियां मंडप
और गुफा की दो खिड़कियों से आती हैं और नंदी के सींगों के मध्य से गुजरते हुए
शिवलिंग का तिलक करती हैं। यह दुर्लभ
नजारा वर्ष में एक बार यानी मकर संक्रांति के दिन ही दिखाई देता है। इस अनूठे
नजारे के दर्शन के लिए मकर संक्रांति के दिन शिवभक्तों की अपार भीड़ जुटती है।






