Thursday, 28 May 2015

मोदी सरकार का एक साल कितना पास कितना फेल

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश-विदेश के अपने हर भाषण में एक बात ज़रूर कह रहे हैं कि पिछले बारह महीनों में भारत ने अपना ‘खोया हुआ’ स्वाभिमान वापस पाया है। भारत की सकारात्मक छवि पूरे विश्व में फिर से स्थापित हुई है। क्या ऐसा सच में हुआ है? ऐसा क्या हुआ है इन 12 महीनों में कि नरेन्द्र मोदी ने कहा कि पहले लोग भारत में जन्म लेने के कारण शर्मिंदा महसूस करते थे और अब अपने भारतीय होने पर गर्व महसूस करने लगे हैं? वैसे यह कहना तो अतिशयोक्ति होगी की इन चंद महीनों में स्थिति ‘शर्म’ से ‘गर्व’ तक पहुच गयी है पर निश्चित रूप से भारत की छवि बेहतर तो हुई है। पर बदलाव जितना ज़मीनी स्तर पर दिखना चाहिए था उससे कहीं ज्यादा अभी सिर्फ़ मनोवैज्ञानिक है। 



मनमोहन सिंह की युपीए 2 के अंतिम महीनों तक अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी नहीं थी और सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिरी हुई थी। दुनिया भर में यह माना जा रहा था कि भारत की बढ़ती ताकत स्थिर होती जा रही है। पर जब से नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, वे इस नकारात्मक छवि को तोड़ने में लगे हैं। मोदी सरकार ने पूरी चमक-दमक के साथ ऐसी योजनाओं की शुरुआत की जिनसे दुनिया भर यह माहौल बने कि भारत में सर्वंगीण विकास हो रहा है। निसंदेह स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया, बेटी बचाओ और जनधन जैसी योजनायें काफ़ी प्रभावशाली दिखती हैं। इसके अलावे कोयला और टेलिकॉम की नीलामी के तरीके को बेहतर करने की कोशिश की गयी। अर्थव्यवस्था में सुधार के प्रति अपनी गंभीरता दिखाने के लिए सरकार ने अध्यादेश का रास्ता अपनाया और विपक्ष की काफ़ी आलोचना भी झेली। राज्यों के विकास के लिए अधिक फण्ड की व्यवस्था की गयी। प्रधानमंत्री की विदेश यात्रायों से भी देश को फ़ायदा होगा। उम्मीद है जापान और चीन से भारत में निवेश आने की अच्छी सम्भावना बनी है। मगर फिर भी यह स्वीकार करना होगा की साल भर में कोई बहुत बड़ा निवेश देश में नहीं हुआ है। नरेन्द्र मोदी ने अपनी विदेश यात्रायों से ना सिर्फ़ भारत के साथ अन्य देशों के सम्बन्ध मजबूत करने की कोशिश की बल्कि आगे से नेतृत्व करते हुए भारत की छवि चमकाने का भी पूरा प्रयास किया। लगभग सभी देशों में एनआरआई जनता को संबोधित करके यही करने की कोशिश की जा रही थी।

इन सब के बावजूद, मोदी सरकार के पहले साल के ख़त्म होते-होते सरकार के कामकाज के ढंग को देखते हुए ऐसे भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह सरकार अपने ताम-झाम वाली योजनायों को सफलतापूर्वक अंजाम तक पंहुचा पायेगी! फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता की सरकार इस सन्दर्भ में दूरदर्शिता दिखाते हुए किसी दीर्घकालिक योजना पर काम कर रही हो। सरकार के पास कोई असरदार रोडमैप नहीं दिखता। निवेश के रूप में अगर काफ़ी सारे छोटे-छोटे प्रोजेक्ट शुरू भी होते हैं तो अर्थव्यवस्था को तो दूरगामी लाभ नहीं होने जा रहा। सरकार अपनी प्राथमिकताओं को ले कर भी हमेशा भ्रम में दिखती है। जैसे कि भूमि अधिग्रहण बिल को पास करने में अपनी सारी ताक़त झोकने से बेहतर यह होता की सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए प्रतिबद्धता दिखाती और किसानों का विश्वास जीतती। अगर आर्थिक सुधार की नज़र से देखें तो अर्थव्यवस्था को गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स बिल की ज़रूरत भूमि अधिग्रहण बिल से अधिक है। 

अब आगे के लिए सरकार को शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने, अल्पसंख्यकों को विश्वास में लेने, अधिक से अधिक रोजगार के अवसर पैदा करने और किसानों के हित में अविलम्ब काम करने की ज़रुरत है। साथ ही राज्यसभा में बहुमत के आभाव से जूझती सरकार को अधिक से अधिक विपक्ष को साथ ले कर चलना भी सीखना होगा। विकास और स्वाभिमान का मनोवैज्ञानिक प्रभाव अधिक दिनों तक नहीं चलने वाला यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जितना जल्दी को समझ लेना पड़ेगा। अच्छे दिनों का तिलिस्म टूटते देर नहीं लगेगी।

Monday, 18 May 2015

घूमने फिरने की वो जगह ज़हां दिल खुश हो जाए

छुटि्टयों का मतलब सिर्फ मौज-मस्ती ही नहीं है। और जब गर्मी की छुटि्टयों की बात हो तो बच्चे ही नहीं बड़े भी इसमें शामिल होकर शहरी जीवन की भागमभाग से दूर जाकर जीवन का आनंद लेना चाहते हैं। यकीनन छुटि्टयां हमें तरोताजा कर देती हैं। लेकिन ये छुटि्टयां सिर्फ बोरियत दूर करने के लिए नहीं रहीं। इन दिनों लोग कुछ रोमांचक करना चाहते हैं। साहसिक कार्य और खेल-कूद जैसा कुछ हो जाए तो इन छुटि्टयों में मानों बचपन लौट आता है। भारत में ऐसी कई जगह हैं जहां आप इन छुटि्टयों में साहसिक यात्रा पर निकल सकते हैं। इन जगहों पर आप डोंगी चलाइए, तीरंदाजी करिए, पहाड़ों पर चढि़ए या ऊंट की सवारी करिए। वो सब कुछ कीजिए जो आपने बचपन में नहीं किया।
damdama-lakeदमदमा झील: दिल्ली से 40 किलोमीटर दूर यह झील बेहतरीन साहसिक पर्यटक स्थल है। झील के ऊपर बने यहां के द्वीप पर नाव से पहुंचा जा सकता है। यह झील तीन तरफ से पानी से घिरी है। इस झील के पीछे अरावली की पहाडि़यां हैं। यहां ठहरने की भी व्यवस्था है। दिल्ली में ज्यादा ऐसी जगहें नहीं हैं, तो दमदमा झील बेहतरीन है। हॉट एयर बैलूनिंग, डोंगी, व कश्ती, रॉक क्लाइबिंग, साइकलिंग और कैम्पिग यहां के मुख्य आकर्षण हैं। मार्च से अक्टूबर तक यहां जा सकते हैं।
adventure_plus_resort_puneएडवेंचर प्लस रिजार्ट: यह रिजार्ट पुणे की बेहतरीन रोमांचक जगहों में से एक है। पर्यटक यहां की सुंदरता और शांत वातावरण में मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। महाराष्ट्र की सबसे बेहतरीन जगहों में से एक रिजार्ट में साल भर पर्यटकों की भीड़ लगी रहती हैं। मुख्य आकर्षण के रूप में पानी से संबंधित गतिविधियां होती हैं- जैसे नाव चलाना या बारिश में नृत्य इत्यादि। अन्य गतिविधि में तीरंदाजी, राइफल शूटिंग, रॉक क्लांइबिंग, स्केटिंग, मकड़ी की जाली पर चढ़ना वगैरह शामिल है। इसके अलावा कई क्रियाकलाप यहां होते हैं। सितम्बर से मार्च तक यहां जाया जा सकता है।
baga-beach-goaगोवा का बागा बीच: उत्तरी गोवा का यह सबसे व्यस्त समुद्री किनारा हैं। भारत के विभिन्न स्थानों से यहां मस्ती करने और साहसिक खेलों का आनंद लेने आते हैं। यहां का खाना और पेय पदार्थ पूरे भारत में लोकप्रिय हैं। समुद्र में यहां नाव दौड़ाने का मजा कुछ और है। इसके अलावा `जेट-स्कींग`, `वाटर-स्कींग`, विंड सर्फिंग भी आकर्षित करते हैं। साहसिक खेलों के लिए यह समुद्री किनारा पर्यटकों का पसंदीदा स्थान है। वहां जाने का बेहतरीन समय दिसम्बर से फरवरी तक है।
Lehलेह: मंदिरों और मठों के अलावा साहसिक खेलों के लिए लेह पूरी दुनिया में जाना जाता है। देश-विदेश के हर कोने से पर्यटक यहां खेल का आनंद उठाने आते हैं। ट्रैंकिंग यहां का मुख्य साहसिक खेल है। इसके अलावा `वाइट वाटर राफ्टिंग`, कैमल सफारी, तीरंदाजी, याक सफारी, पहाड़ों पर चढ़ना, पैराग्लाइडिंग, जांपिंग और हॉट एयर बैलूनिंग का मजा लिया जा सकता हैं। यहां जाने का बेहतरीन समय जून से नवम्बर तक है।
rishikeshऋषिकेश: भारत के सबसे मुख्य साहसिक जगहों में से एक है ऋषिकेश। कई स्कूली बच्चों की साहसिक यात्रा के लिए इस जगह पर चुनाव करते हैं। यहां साल भर देश-विदेश से पर्यटकों का तांता लगा रहता है। लगभग पूरे साल यहां का मौसम सुहावना रहता है। हिमालय की पहाडि़यों में बसा ऋषिकेश बेहतरीन दृश्य प्रस्तुत करता है।
गंगा नदी में कश्ती चलाना काफी मुश्किलों भरा होता है। फिर भी पर्यटक अपनी डोंगी में बैठकर इसका मजा लेते हैं। औली की ढलानों पर स्कींग करने का मजा ही अलग है। यहां हर साल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्कींग प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। ट्रैकिंग का भी यहां मजा लिया जा सकता है। यहां घूमने का बेहतरीन समय मई से नवम्बर तक है।
इनके अलावा भारत में ऐसी कई बेहतरीन साहसिक जगहें हैं, जहां आप खेलों का मजा लेकर अपनी छुट्टी को और भी मजेदार बना सकते हैं। तो इन छुटि्टयों में परिवार और दोस्तों के साथ साहसिक खेल का आनंद लेना हो तो एक बार इन जगहों के चक्कर जरूर लगाइए।

Sunday, 10 May 2015

हैप्पी मदर्स डे, ममता का सागर मां ,

माँ जो कि दुनिया का सबसे छोटा शब्द है पर इसका ओहदा इतना बड़ा है कि माँ की तुलना भगवान से की जाती है। माँ जो हमें जन्म देती है और इतना काबिल बनाती है कि हम अपने पैरो पर खड़े हो सके। मुझे जब पहले मालूम नही था कि मदर्स डे भी मनाया जाता है तो मै हमेशा सोचती थी कि मम्मी लोगों के लिये कोई न कोई दिन होना चाहिये जिसे हम उनके नाम पर सेलिब्रेट कर सके पर जब पता चला तो मुझे बहुत खुशी हुई। मैनें अपनी मम्मी को गिफ्ट दिया और उनसे आशीर्वाद लिया। ये तो हुई पिछले साल की बात क्योंकि मुझे पिछले साल ही पता चला कि मदर्स डे मनाया जाता है इस साल भी मैं अपनी मम्मी को गिफ्ट दूंगी। आप भी अपनी मम्मी को सर्प्राइस गिफ्ट दीजियेगा और ये देखियेगा कि वो कितनी खुश हो जाती है। रिश्ता चाहे माँ-बेटे का हो या माँ-बेटी का होता तो एक ही है माँ सभी के लिये एक होती है।

जो दिल में बसे, परछाई बन जो रहे सदा ही इस दिल के पास ?
शायद भगवान नहीं है हर जगह इसलिए उसने माँ बनाई
ममता का सागर , परिवार की उम्मीद, जो दे सबको खुशिया..
सपने होते है हमारी आखो में, पर पूरा करती हैसपनोको माँ की दुआ.
जुनून , ज़ज़्बा है जिसके लिए तपस्या” .लेना नहीं देना ही है उसकी पहचान……
कोमल हथेली को पकड़ जो दिखाए सही रास्ता, रातो को जो वार दे लोरियोंमें……
शायद ऐसी ही होती है, माँ की छवि???
जो आती है मन को रास, राहों में जो बिखेर दे मोती ही मोती.
है भगवान की बनाई इस कृतिको सलाम .

Friday, 8 May 2015

जिंदगियों पर भारी हादसे का सफर.. आखिर कब तक सड़क दुर्घटना, कब सोचेगी सरकार

भारतीय हिन्दी भाषा में सबक शब्द का उपयोग तब किया जाता है, जब किसी को कुछ सिखाया, पढ़ाया या उसे किसी कार्य के लिए तैयार कर दिया जाता है। किंतु लगता है कि देश और यहां के राज्यों की सरकारें हैं कि कई मामलों में पाठ पढ़ने के बाद भी कोई सबक लेना नहीं चाहतीं। देश और प्रदशों में आज अनेक समस्याएं हैं, जिनके समाधान की बातें तो की जाती हैं, लेकिन प्राय: देखा यही गया है कि सरकारें अनेक वायदों के साथ सत्ता में आती और चली जाती हैं, पर समस्याएं यथावत बनी रहती हैं। जिस लोक के लिए जनता का जनता द्वारा जनता के लिए शासन है, लगता है कि वह सिर्फ भारतीय संविधान में ही कैद होकर रह गया है। बनती तो सरकार जनता के लिए है, प्रशासन भी जनता के प्रति जवाबदेह है, किंतु सत्य क्या है? यही कि एक बार प्रशासन में आने के बाद अपने कर्तव्यों के प्रति कुछ प्रतिशत को छोड़ दिया जाए तो कोई उत्तरदायी नहीं।

जनतंत्र के मंदिर संसद और विधानसभाओं में जब मंत्री से किसी विषय पर जवाब मांगा जाता है, तब या तो जानकारी एकत्र की जा रही होती है या फिर कई बार असत्य जानकारी उपलब्ध करा दी जाती है। इस पर जब प्रतिपक्ष हंगामा करें, तो यह कहकर बातों को आगे बढ़ा दिया जाता है कि जल्द सही जानकारी एकत्रित कर सदन के पटल पर रख दी जाएगी, जब तक प्राय: होता यह है कि संसद और विधानसभाओं का सत्र समाप्त हो जाता है। इसमें जानकारी है कि पता नहीं कहां गुम हो जाती है। वास्तव में यह है वर्तमान लोकतंत्र की हकीकत। जिस लोक के लिए इस व्यवस्था का निर्माण हुआ, क्या इसे व्यवहार में लाया जा रहा है? सही मायनों में लगता है कि वह जन-जन कहीं है ही नहीं। यदि यह बातें सच नहीं होतीं, तो कोई कारण नहीं है कि देश और राज्यों में जनता से सीधी जुड़ी समस्याएँ आजादी के 68 वर्ष बीत जाने के बाद भी यथावत नहीं बनी रहतीं।
केंद्र में भाजपा की मोदी सरकार के बनने के बाद एक माह भी नहीं बीता था कि देश के एक कद्दावर और सीधे जनता से संवाद रखने वाले नेता केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे की एक सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई। तब यहां सभी का सोचना वाजिब लगता है कि जिस देश में एक केंद्रीय मंत्री सडक़ पर चलते वक्त महफूज नहीं, वहां आम जनता की सड़क पर जाते समय क्या स्थिति होती होगी? जो सुबह काम पर अपनी पत्नी से गरम टिफिन लेकर शाम को घर वापस आने का भरोसा दिलाकर और यह कह कर कि लौटने के बाद बच्चों के साथ मार्केट चलेंगे या ऐसे ही कितने मॉं-बाप के प्रिय बेटा-बेटी या प्रिय दोस्त जल्द मिलने का आश्वासन देकर जाते हों और अचानक खबर आती है कि अब वह हमारे बीच से हमेशा के लिए अलविदा हो चुके हैं, तब क्या स्थिति होती होगी, एक पत्नी, एक मां, एक पिता या मित्र की?
वस्तुत: कल्पना में यह सोचने भर से भय उत्पन्न हो जाता है, जबकि सच यही है कि इस देश में हर रोज न जाने कितने ऐसे लोग हैं, जो आने का वायदा करके तो घर से निकलते हैं, किंतु वे अनायास सड़क हादसों का शिकार होने से कभी वापस अपने घर नहीं पहुंच पाते हैं। निश्चित तौर पर देश में घटित होने वाली रोजमर्रा की दुर्घटनाएं भारत की वह तस्वीर पेश करती हैं, जिससे कि यहां सड़क परिवहन की खौफनाक हालत पता चलती है।
हाल ही में मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में हुई बस पलटने की घटना ने भले ही देश में सड़क यात्रा में बढ़ते खतरों की तरफ ध्यान खींचा हो, लेकिन सच यही है कि ऐसे संपूर्ण देश में कम ज्यादा हादसे हर रोज होते हैं। फिर भी ना केंद्र सरकार और ना ही प्रदेशों की सरकारें इससे कोई सबक सीखना चाहती हैं। मृतकों के परिजनों और घायलों को थोड़ा-बहुत मुआवजा देने की घोषणा करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है।
जब मोदी कैबिनेट के सदस्य गोपीनाथ मुंडे दिवंगत हुए, तब देशभर में सडक़ सुरक्षा को लेकर जोर-शोर से चर्चा शुरू हो गई थी, सरकार ने अपने कानूनों में सुधार भी किया, पहले से कड़े कानून लाए गए, यह सोचकर की अब हादसों को कम किया जा सकेगा या इनका समाप्त किया जाना संभव होगा, लेकिन हुआ क्या? दुर्घटनाएं कम हाने की बजाए पहले से और ज्यादा बढ़ गईं। अब इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? सरकार तो कहेगी कि हमने अपना काम ईमानदारी से कानूनों में संशोधन कर किया है। परन्तु सच यही है कि यह पूरा सत्य नहीं है। इस दिशा में कड़े कानून बनाने के बाद भी कोई केंद्र या राज्य की सरकार अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकती हैं। यदि कानून हर मर्ज का इलाज होता, तो देश में फिर अपराध नहीं होते? महिलाओं की आबरू बीच सड़क नहीं बेची जाती और ना ही इस देश में कोई ऐसा कृत्य होता, जिससे देश को शर्मिदगी महसूस होती।
हां, इतना अवश्य है कि कानूनों के जरिए सरकारें अपराध को कम जरूर कर सकती हैं। लेकिन हकीकत यही है कि किसी भी समस्या की पूर्ण समाप्ति के लिए सरकारों को कानून बनाने के अलावा अन्य उपायों पर ही विचार करना होगा। वस्तुत: यही बात आज देश में सड़क हादसों को कम करने के लिए लागू होती है, जिसे भारत सरकार और प्रदेशों की सरकारों को अच्छे से समझने की जरूरत है।
वस्तुत: केंद्र सरकार और यहां के राज्यों की सरकारें लगता है, दुनिया से कुछ सीखना नहीं चाहती हैं? यूरोपीय देशों में हर भारतीय बहुत चाव से घूमना चाहता है। मौका मिलने पर वहां स्थायी और अस्थायी रूप से बसना भी चाहता है, लेकिन कोई इस बात पर गौर करने की जहमत उठाना नहीं चाहता कि वहां के देश वर्तमान की प्लानिंग ही नहीं, बल्कि आने वाले 100 से 200 वर्ष आगे की सोचकर अक्सर सार्वजनिक हित की योजनाएं बनाते हैं। भारत के संदर्भ में कहें तो सड़क पर चलने वाली साईकल और बैलगाड़ी से लेकर चार-आठ पहिया वाहनों तक व इससे आगे हवा तथा जल में चलने वाले आज इतने अधिक वाहन मौजूद हैं कि देश की सवा सौ करोड़ की जनसंख्या भी उसके सामने कम है। देश में वाहन तो रोज बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन उनके मुताबिक जरूरी सड़कों का विस्तार नदारद है, फिर अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर के बारे में कहना ही क्या? तब फिर देश में हादसों का सिलसिला कैसे रुके?
पिछले साल अप्रैल में सर्वोच्च न्यायालय ने देश की सड़कों को दानवी हत्यारे तक कह दिया था। तब संपूर्ण भारत का ध्यान इस दुखद हकीकत की तरफ खिंचा जरूर था, किंतु वक्त बीतने के साथ सभी इसे भूल गए। जिन्हें नहीं भूलना था, वह केंद्र और राज्य की सरकारें भी इस बात को भूल गईं कि हमें अपने यहां सड़क निर्माण और अन्य दुरुस्ती के आमूलचूक कार्य करना है।
अब सड़क हादसों से जुड़े जरूरी आंकड़ें भी देख लें। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में मौतों का छठा सबसे बड़ा कारण सड़क दुर्घटनाएं हैं। प्रत्येक 3.7 मिनट पर भारत में एक व्यक्ति की जान इनकी वजह से जाती है तथा यह दर दुनिया में सबसे ज्यादा है। इतना ही नहीं तो इससे कई गुना अधिक लोग सडक दुर्घटनाओं में विकलांग और जख्मी होते हैं, जिनका की कोई आंकड़ा ही नहीं रखा जा सकता है। इस बीच अन्य अध्ययनों से यह सामने आया है कि हादसों में ड्राइवर की गलती और सडकों की दुर्दशा सबसे बड़े कारण है। दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में भले ही सड़कें बेहतर हैं, लेकिन ट्रैफिक नियमों का सख्ती से पालन न होना, असावधानी और ड्राइवरों की लापरवाही दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण हैं। ज्यादा आबादी और मोटर वाहनों की बढ़ती संख्या भी इसकी वजहें हैं। फिर यातायात नियमों की अनदेखी और लापरवाह ड्राइविंग आम समस्या हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉड्र्स ब्यूरो (एनसीआरबी) का दो साल पूर्व पिछले दस वर्षों का आंकड़ा साफ बताता है कि देश में 2003 से 2012 के बीच भले ही जनसंख्या वृद्धि दर 13.6 फीसदी रही हो, लेकिन इस दौरान सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या में 34.2 फीसदी वृद्धि देखी गई थी।
हमारे पड़ोसी मुल्क जिसकी हम हर बात में बराबरी करना चाहते हैं, उस चीन ने भले ही सडक़ हादसों से सबक लेकर अपने यहां सिस्टम में सुधार आरंभ कर दिया हो और फिर आबादी एवं वाहनों की संख्या में लगभग समान बढ़ोतरी के बावजूद वहां दुर्घटनाओं में लगातार कमी आ रही है, पर भारत है कि इस मामले में चीन से कुछ सीखना ही नहीं चाहता है। न सड़क सुधार में और ना ही रेलवे की होने वाली अनायास दुर्घटनाओं से वह कोई सबक ले रहा है। वस्तुत: सरकारों को यह समझना होगा कि मानव जिंदगी से बढकर कुछ अन्य नहीं है। लोकतंत्र में जिस जन के विश्वास को हासिल कर सरकारें बनती हैं, उनका पहला दायित्व होना चाहिए कि वह अपने जन की रक्षा पहली प्राथमिक सूची में सबसे आगे रखे। फिर इसके लिए उसे जितने भी लोक महत्व और कल्याणकारी कदम उठाने पड़े, वह उठाए। यानी सावधानी, सही व्यवस्था और नियमों का सख्ती से पालन हो, तो अपने देश में दिखाई दी जाने वाली असमर्थता टूट सकती है।
यह सही है कि सड़क हादसों के कारणों और समाधान पर भारत में भी पर्याप्त चर्चा हुई और अब भी हो रही है। इससे कुछ ठोस सुझाव भी सामने आए एवं निरंतर आ रहे हैं। अच्छी सड़कों का निर्माण और उनका ठीक रख-रखाव, ट्रैफिक लाइटों को दुरुस्त रखना, ट्रैफिक नियमों का सख्ती से पालन और ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की दुरुस्त प्रक्रिया जैसे सुझाव इनमें शामिल हैं। किंतु इन सुझावों पर अमल कैसे हो? यह अब तक सरकारों की कार्यसूची में नहीं है। छोटे हादसों को सरकारें गिनती नहीं, किंतु जब बड़ी दुर्घटना घट जाती है, तब सरकारें अपनी और से मृतकों के परिजनों को मुआवजा राशि तथा मजिस्ट्रेट जांच बैठा कर अपने उत्तरदायित्वों की पूर्ति मान बैठती हैं,पर फिर भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि सड़क यात्रा को सुरक्षित कैसे बनाया जाए?
इससे जुड़े दो प्रमुख पहलू हैं। एक तो सड़कों की खराब हालत है। दूसरा परिवहन नियमों के पालन और ड्राइवरों की ट्रेनिंग से संबंधित पहलू है। विकसित देशों के बारे में कहा जाता है कि वहां ड्राइविंग लाइसेंस लेना डिग्री हासिल करने जैसा काम होता है, जबकि अपने यहां के भ्रष्ट सिस्टम में यह संभव है कि बुनियादी शर्तों को पूरा किए बिना भी लाइसेंस मिल जाते हैं। वस्तुत: देश की यह जो तस्वीर बन गई है, उसे राजनैतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक स्तर पर सख्ती बरतने तथा मूलभूत ढ़ांचागत सुधार कर बदलना वर्तमान की जरूरत है, अन्यथा देश और यहां के राज्यों में बड़े से बड़ा सड़क हादसा हो जाने के बाद कुछ वक्त का स्यापा होता रहेगा और सड़क दुर्घटनाओं से आमजन की मौतें कभी कम नहीं होंगी।

Thursday, 7 May 2015

आख़िर सलमान पर फैसला कब

सलमान खान को मिली अंतरिम जमानत ने उन लोगों को सोचने पर विवश कर दिया जो सजा के ऐलान के बाद सीधे अदालत से न्यायिक हिरासत में यानी सलाखों के पीछे भेज दिए जाते हैं।
यहां यह प्रश्न स्वत: उठ खड़ा हुआ है कि बिना फास्ट ट्रैक अदालत के त्वरित न्याय सबके लिए या सिर्फ कुछ के लिए?
साफ है, यदि सलमान के मामले में पहले से जमानत की तैयारियां नहीं हुई होती तो सजा का ऐलान होने के 3 घंटे के अंदर मुंबई सत्र अदालत की सजा पर बंबई उच्च न्यायालय अंतरिम जमानत नहीं देता। इसका मतलब यह हुआ कि न्याय पाने के लिए भी अग्रिम तैयारियां जरूरी है यानी तेज तैयारी, तेज नतीजा।
लोगों के जेहन में बस यही कौंध रहा है कि ऐसा भी होता है? निश्चित रूप से अंतरिम जमानत तकनीकी आधारों पर मिली है, जिसमें सलमान की ओर से उनके वकीलों ने जो तर्क प्रस्तुत किए, उसमें मुख्य आधार यह था कि उन्हें दोष सिद्धि के आदेश के सिर्फ दो पन्ने उपलब्ध कराए गए हैं। आदेश की पूरी प्रति नहीं।
Salman convictedइस पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अभय थिप्से ने कहा, “यदि प्रति तैयार नहीं थी तो आदेश नहीं सुनाया जाना था, न्याय हित में यही होगा कि आदेश की प्रति सलमान को उपलब्ध कराई जाने तक उन्हें न्यायिक संरक्षण मिले। इस केस में जल्दबाजी यह है कि उसे हिरासत में लिए जाने की संभावना है।”
अब आगे ऐसी ही परिस्थितियों में दूसरे मामलों में यह नजीर कितनी उपयोगी होगी, यह तो वक्त ही बताएगा।
यकीनन, कानूनी तौर पर सलमान की ओर से उसी दिन उच्च न्यायालय में उठाया गया यह सवाल तकनीकी रूप से पूरी तरह से उचित था। इससे उन लाखों लोगों को अचरज जरूर हुआ होगा जो जमानत के लिए हर रोज अदालतों का चक्कर लगाते हैं और सुनवाई तक नहीं होती।
यहां यह न कहना बेमानी होगा कि न्याय की आस के लिए विश्वास के साथ और बहुत कुछ भी जरूरी है, जो सबके पास नहीं होता। सलमान इस मामले में जरूर खुशनसीब हैं। बस इसी वजह से अब यह चर्चा भारत में हर ओर है कि सहज और त्वरित न्याय पाना आम के लिए आसान या केवल खास के लिए।
कानून की मंशा पर सवाल उठाना गलत होगा। हां, कानून की पेचीदगी को समझना जरूरी होगा। सलमान के मामले में यही हुआ और सलमान की पैरवी के लिए खड़े लोगों की काबिलियत ही है जो उसके खुशनसीब बनने की वजह बनी।
न्याय सबके लिए बराबर होता है, न्याय प्रणाली केवल दलीलों, गवाहों और सबूतों के आधार पर ही काम करती है। निश्चित रूप से हर फरयादी या आरोपी अपनी ओर से ऐसा ही करता होगा। लेकिन सफलता और असफलता उसकी तैयारी तर्को, आधारों और कानूनी जानकारी पर निर्भर है।
Salman Khan leaves from his homeबात न्याय प्रणाली की हो रही है तो यह भी सबको पता है कि देशभर की अदालतों में लाखों मामले जजों की कमी के चलते पेंडिंग हैं। सर्वोच्च न्यायल में लगभग 60 हजार, उच्च न्यायालयों में लगभग 44 लाख और निचली अदालतों में लगभग 2 करोड़ 75 लाख मामले लंबित हैं।
ऐसे में हर किसी के लिए त्वरित न्याय की बात सोचना कितना वाजिब है। जमानत के लिए तक हर रोज लाखों लोग न्याय की देहरी पर दस्तक देते हैं और बिना सुनवाई बैरंग लौट जाते हैं।
एक कड़वा सच भी यह है कि ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ अर्थात विलंबित न्याय, न्याय का हनन है। इसे दूर करना ही होगा। इसके लिए कई बार कई सुझाव भी आए जिन पर कुछ भी काम नहीं हुआ।
न्याय में देरी से भटकते-भटकते न जाने कितने लोग मानसिक संतुलन खो बैठे, कितने दुनिया से रुखसत हो गए, कितने जवान से बूढ़े गए। लेकिन न्याय नहीं मिला। इस बारे में मंथन होता है कमेटियां बनती हैं पर नतीजा कुछ भी नहीं निकलता।
बात फिर वही कि सलमान का क्या होगा? अंतरिम जमानत के बाद वह नियमित जमानत के लिए जरूर दस्तक देंगे और सत्र अदालत में दोष सिद्ध आरोपों को चुनौती देने के लिए ऊपरी अदालत जाएंगे। ऊपरी अदालत के फैसले के लिए फिर कितना इंतजार करना होगा, कोई नहीं कह सकता।
सवाल फिर वही और जस का तस है कि अंतिम फैसले का इंतजार आखिर कब तक?

Wednesday, 22 April 2015

जंतर-मंतर पर हुई किसान के मौत पर आखिर कब तक होगी राजनीति,...गजेंद्र... ये देश शर्मिंदा है...किसानों के मौत पर भी होती हैं राजनीति

आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान एक किसान गजेंद्र सिंह ने हजारों लोगों के सामने आत्महत्या कर ली। गजेंद्र ने दिल्ली के सीएम, डिप्टी सीएम, कैबिनेट मंत्रियों समेत हजारों लोगों के सामने अपनी जान दे दी, और मीडिया समेत (उसमें मैं खुद भी शामिल था) सभी लोग तमाशा देखते रहे।
गजेंद्र के लटकने के समय और बाद भी भाषणबाजी चलती रही, भीड़ के चलते कोई हिल भी नहीं पा रहा था, लेकिन गजेंद्र संभवत: उसी समय अपनी आखिरी यात्रा पर निकल चुके थे। जब एक किसान की, घर के मुखिया की मौत होती है, तो सिर्फ वही नहीं मरता। गजेंद्र के साथ ही मर गई, वो उम्मीद। जिसके सहारे उसका परिवार जी रहा था। गजेंद्र के साथ ही मर गए वो सपने, जो उसके परिवार ने पाल रखे थे।


गजेंद्र के साथ ही मर गया वो संघर्ष, जो गजेंद्र जीते जी अपने परिवार को पालने के लिए करता। इसके साथ ही गजेंद्र के साथ मर गई, उन सभी की इंसानियत, तो उसकी मौत का तमाशा देखते रहे। किसान के साथ जो हुआ वो दुखद है लेकिन उसकी मौत के बाद जंतर मंतर पर जो होता रहा वो भी हैरानी और गुस्से से भर देने वाला रहा। इस दौरान आम आदमी पार्टी की रैली होती रही। कुमार विश्वास बोलते रहे, मनीष सिसोदिया बोलते रहे, यहां तक कि अरविंद केजरीवाल भी बोले। भाषणों में मौत पर दुख से ज्यादा केंद्र सरकार पर हमलावर रुख दिखाई दिया।
राजनीतिक बयानबाजी हुई और प्वाइंट स्कोर करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई। दिल्ली पुलिस को ललकारते रहे, शिक्षकों को ललकारते रहे, केंद्र सरकार को ललकारते रहे। रैली के बाद उसकी मौत पर रोने से भला क्या फायदा होता सरकार का? अब तमाम नेता आंसू बहा रहे हैं। छाती पीट रहे हैं। हाय हाय कर रहे हैं। किसान की लाश को देखने वीआईपी, वीवीआईपी नेताओं का तांता लगा है। राहुल गांधी से लेकर अजय माकन तक, केंद्रीय मंत्रियों से लेकर दिल्ली सरकार के मंत्री तक।
आम आदमी पार्टी सवाल उठा रही है कि किसान खुदकुशी के लिए कैसे मजबूर हुआ? बीजेपी का सवाल है कि किसान की खुदकुशी के बावजूद आप की रैली कैसे चलती रही? और कांग्रेस एक साथ इन दोनों सवालों को उछाल रही है। कुल मिलाकर तीनों ही बड़ी पार्टियों को किसान की इस खुदकुशी में राजनीतिक रोटियां सेंकने का पूरा स्कोप दिख रहा है। आगे क्या होगा ये देश का बच्चा-बच्चा जानता है। अब मुआवजे का ऐलान होगा। परिवार के सदस्य को नौकरी की बात होगी।
किसान के घर में रियल लाइफ की पीपली लाइवफिल्माई जाएगी। लेकिन ये सवाल बाकी रह जाएगा कि क्या किसान की जिंदगी की यही कीमत है? कमी राजस्थान के स्थानीय प्रशासन की रही हो या केंद्र सरकार की हो। लेकिन जो संवेदनहीनता आज जंतर मंतर पर हम सबने बरती, वो कभी फिर न बरती जाए। बस यही उम्मीद है। जिस तरह घंटे भर से पेड़ पर चढ़े किसान की धमकी को लोगों ने हल्के में ले लिया था, वैसे ही किसी परेशान की आवाज को हल्के में न लिया जाए। वर्ना लोग मरते रहेंगे और मुआवजे की नौटंकी होती रहेगी। इन मौतों के साथ ही मरता रहेगा, एक परिवार का सपना और दागदार होती रहेगी जिंदगी।


Thursday, 16 April 2015

नेहरु गांधी परिवार का एकलौते राजनीतिक वारिश भारत लौटा

कांग्रेस महासचिव अपने अज्ञातवास से लौटे चुके हैं। 56 दिन बाद उनकी स्वदेश वापसी हुई है। राहुल का गायब होना भारतीय राजनीति के लिए यक्ष प्रश्न था। भारतीय मीडिया उनकी राजनीतिक कुशलता और नेतृत्व क्षमताओं पर तीखा प्रहार किया। राजनीतिक विश्लेषक और प्रतिपक्ष ने उन्हें रणछोड़ जैसे शाब्दिक सम्मानों से सम्मानित किया। उनकी वापसी को लेकर कांग्रेस में कोई खास हचलच नहीं दिखी। लेकिन मां सोनिया गांधी और बहन प्रियंका उनके वापसी के पहले उनके आवास पर पहुंची। राहुल गांधी के अज्ञातवास के बाद अब उनकी वापसी भी उतनी अहम हो गयी है। कांग्रेस और देश उनकी ओर देख रहा है। वापसी में राहुल गांधी क्या लाए हैं। वह कौन सी जड़ी-बूटी है जो दमतोड़ती कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित होगी।
अभी तक यह सवाल उठते रहे कि आखिर राहुल गांधी कहां है। सोशलमीडिया में कुछ तस्वीरें उत्तराखंड की वायरल हुई थी। लेकिन बाद में इस पर यह कहकर विराम लगा दिया गया कि यह उनकी पुरानी तस्वीरें हैं। राहुल गांधी को कोई मामूली शख्सियत नहीं हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव होना भर भी उनकी उपलब्धि नही हैं। बल्कि वे देश की सबसे बड़ी सियासी पार्टी रही कांग्रेस के उत्तराधिकारी हैं। इसके साथ ही नेहरु गांधी परिवार के एकलौते राजनीतिक वारिश भी हैं। कांग्रेस के लिए राहुल गांधी की अहमियत क्या हैं। यह सवाल समय-समय पर उठता रहा है। लेकिन देश के विकास में कांग्रेस के साथ नेहरु और गांधी परिवार का बलिदान और योगदान नहीं भूलाया जा सकता है। राहुल युवा हैं उनकी सोच नयी है। देश की राजनीति में उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। राहुल कांग्रेस और उसके भविष्य की राजनीति के चेहरा हैं। राहुल के अज्ञातवास को लेकर भारतीय मीडिया में काफी बाते हुईं। उन पर पलायनवादी होने का भी आरोप लगा।
अब उनकी वापसी भी उतने ही सवाल उठा रही है। पूरा विमर्श ही इस पर टिका है कि आखिर 56 दिन वाद दिल्ली लौट रहे राहुल गांधी की चिंतन झोली में नया क्या हैं। वापसी से क्या फायदा होने वाला है। उनका नया शोध और चिंतन का नया सिद्धांत क्या है। उससे देश, कांग्रेस और स्वंय राहुल गांधी को क्या फायदा होने वाला है। राहुल गांधी और उनकी राजनीतिक कुशलता का यह अज्ञातवास अग्नि परीक्षा होगी। हलांकि इस पर बहुत अधिक बखेड़़ा भी नहीं उठना चाहिए। क्योंकि सभी का अपना व्यक्तिगत जीवन होता है। हो सकता है उनका अज्ञातवास स्वयं की शांति और चिंतन के लिए हो, जिस कांग्रेस और राजनीति से जोड़़ा जा रहा है। यह बात तभी सामने आएगी। जब वे खुद मंच पर आएंगे। इस चिंतन की पहली अग्नि परीक्षा 19 अप्रैल को होने वाली किसान रैली है। कहा जा रहा है राहुल गांधी इस रैली को संबोधित करेंगे। अज्ञातवासवास के दौरान उन्हें व्यक्तिगत हमले भी झेलने पड़े। उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी में पोस्टर लापता होने का पोस्टर भी चस्पा हुआ। संसद सत्र के ऐन मौके पर गायब होने पर भी सवाल उठाए गए।
राजनीति विरोधियों से और खुद कांग्रेस के अंदर घिरे राहुल गांधी नयी विचारधारा कितनी धारधार होगी इसका लोगों को बेसब्री से इंतजार है। कांग्रेस में राहुल की नेतृत्व की क्षमता को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं। पार्टी का युवा धड़ा राहुल और प्रियंका को सामने लना चाहता था। जबकि चाटुकार राजनीति के रणनीतिकार और सोनिया गांधी की परिक्रमा में लगा खेमा राहुल को बर्दाश्त नहीं करना चाहता है। क्योंकि पार्टी की कमान राहुल के हाथ में जाने से बुजुर्ग पीढ़ी के नेताओं का पत्ता साफ हो सकता हैं। युवा सोच का होने से कांग्रेस से मठाधीशों का सफाया करना चाहते हैं जबकि मां सोनिया गांधी ऐसा करने से उन्हें रोकती हैं। सोनिया ऐसे लोगों और अपने विश्वस्तों का हटाना नहीं चाहती हैं। जिन्होंने बुरे दिनों में उनका साथ दिया। जबकि यही बात बुजुर्गों को खलती है। यही कारण है कि पुरानी पीढ़ी के लोग उनकी राजनीतिक क्षमता पर सवाल उठाते हैं। उन्हें डर है कि अगर कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथ गयी तो कांगे्रस सेे बूढ़ों का पत्ता साफ हो जाएगा। राहुल गांधी सैद्धांतिक राजनीति करते हैं। जबकि सोनिया गांधी व्यवहारिक राजनीति करती हैं। सोनिया वफादारों को खाद-पानी देना चाहती हैं। जबकि राहुल गांधी का फैसला पार्टी के हित में अधिक स्वहित के लिए कम हैं। इसीलिए राहुल गांधी कांग्रेस को नए विचारों वाला दल बनाना चाहते हैं। संगठन में पुराने लोगों का पत्ता साफ करना चाहते हैं।
पार्टी में उच्चपदों पर जो लोग लंबे समय से आसीन हैं। उन्हें डर है कि राहुल गांधी के हाथ पार्टी की सत्ता गयी तो उनका बोरिया विस्तर सड़क पर होगा। दस जनपथ उनके लिए बेगाना होगा। अंदर की बात यह है कि मां-बेटे की आड़ में कांग्रेस में नेतृत्व क्षमता को लेकर जो बहस की जा रही है। वह तथ्यहीन है। पार्टी की सेहत सुधारने के बजाए लोगों को अपनी ंिचंता अधिक है। उन्हें लगता है कि भाजपा की तरह अगर कांग्रेस में भी यह प्रयोग दुहराया गया तो यहां भी बुजुर्ग पीढ़ी के नेता इतिहास में दफन हो जाएंगे। पार्टी में उनकी अहमियत नहीं रहेगी। यही कारण है कि राहुल गांधी पार्टी के कई आतंरिक निर्णयों से नाराज होकर अज्ञातवास को चले गए थे। राहुल का अज्ञातवास कई सवाल खड़े करता है। सवाल उठता है कि राहुल गांधी देश छोड़कर कहा गए थे। उन्हें अज्ञातवास जाने की क्या जरुरत थी। वह चिंतन क्यों और किसके लिए था। राहुल गांधी खुद मां सोनिया के निर्णयों से खफा होकर वनवास का रास्ता अख्तियार किया था। या इस प्लानिंग में मां सोनिया, बहन प्रियंका और उनकी खुद सहमति थी। सोनिया गांधी क्या बेटे को विदेश भेजकर पार्टी में राहुल समर्थकों और विरोधियों का रुख भांपना चाहती थीं। सोनिया गांधी की सेहत पर कोई खास असर नहीं दिखा था। देश की मीडिया में इस विषय पर भले बड़े सवाल दागे गए थे। लेकिन मां सोनिया गांधी की तरफ से कोई बयान नहीं आया था।
भारतीय जनता पार्टी ने राहुल के गायब होने पर खूब हमला बोला। उन पर यह भी सवाल उठाए गए कि जिस समय संसद का अहम सत्र चल रहा हो उस दौरान उनका देश से बाहर जाना कई सवाल खड़े करता है। उस स्थिति में जब भूमि अधिग्रहण जैसे खास बिल पर संसद में चर्चा होनी थी और भाजपा नया संशोधित बिल ला रही थी। कांग्रेस राज में भूमि अधिग्रहण बिल लाने में राहुल गांधी की खास भूमिका थी। उन्हें किसानों के मसीहा के रुप देखा जाता है। वहीं दागियों को बचाने के लिए लाए जा रहे बिल पर भी उनकी भूमिका पर कई सवाल उठे थे। उन्हें आक्रामक राजनीति शैली का नेता बताया गया। लेकिन हमले चाहे जो किए गए। राजनीति में अपराधी करण को रोकने के लिए बिल फाड़कर उन्होंने जो कदम उठाया था। उनका वह कदम सौ फीसदी खरा था। लेकिन उनकी गैर मौजूदगी में सोनिया गांधी की नेतृत्व क्षमता कांग्रेस और देश के सामने सकारात्मक सोच लेकर आयी है।
भूमि बिल पर विपक्ष को एक एकजुट करने में उन्होंने खास भूमिका निभायी। इसके बाद कोयला घोटाले में सीबीआई की तरफ से नोटिस दिए जाने पर भी सोनिया गांधी यह जताने में कामयाब रही कि हम पूरी कांग्रेस आपके साथ खड़ी है। राहुल गांधी को अक्षम नहीं ठहराया जा सकता है। कांग्रेस की पराजय के लिए सिर्फ राहुल गांधी को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। देश भर में कांग्रेस के पास कोई कैडर नहीं रह गया है। कांग्रेस के नेताओं का संपर्क जनता से टूट गया है। कांग्रेस की छबि केवल मीडिया मैन की रह गयी है। कांग्रेस का कैडर भाजपा, और दूसरे दलों में परिवर्तित हो चला है। राज्यों में स्थानीय मुद्दों पर आम आदमी के साथ आने वाला कोई नहीं दिखता है। दिल्ली और दस जनपथ से कांग्रेस आगे नहीं निकल पा रही है। कांग्रेस सिर्फ बस सिर्फ नेतृत्व मे ंउलझी है। कांग्रेस के रणनीतिकार अपनी सारी उर्जा पार्टी को संघर्षशील बनाने के बजाय कांग्रेस का नेतृत्व किसने के हाथ में हो इस सवाल पर उलझा है। जबकि असलीयत यह है कि कांग्रेस जब तक अपना जनाधारा नहीं बढ़ाती है कुछ होने वाला नहीं है। उसकी कमान राहुल गांधी संभाले या मां सोनिया कोई फायदा होने वाला नहीं है।
निश्चित तौर पर राहुल गांधी की वापसी सुखद है। राहुल भारतीय राजनीति के भविष्य हैं। उनके अंदर युवा सोच और नीति है। पार्टी की जय-पराजय मात्र से ही किसी को अक्षम नहीं ठहराया जा सकता है। लोकतंत्र मंे जनमत और संख्या बल महत्वपूर्ण होता है। कभी-कभी संख्या बल के बूते अहम फैसले और जमीनी हकीकत भी लहरों और अफवाहों के बीच दब जाती है। वैसा ही कुछ कांग्रेस के साथ हुआ। उसके लिए सिर्फ राहुल गांधी को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। राहुल अब स्वेदश लौट आएं हैं। कांग्रेस और देश के लिए अपने नये विजन और चिंतन का इस्तेमाल वे किस रुप में करते हैं। इसकी अपेक्षा पूरे देश को हैं। अब वक्त आ गया जब कांग्रेस और उसके संगठन को राहुल गांधी को गंभीरता से लेना चाहिए।