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आम
आदमी पार्टी की रैली के दौरान एक किसान गजेंद्र सिंह ने हजारों लोगों के सामने
आत्महत्या कर ली। गजेंद्र ने दिल्ली के सीएम, डिप्टी
सीएम, कैबिनेट मंत्रियों समेत हजारों लोगों के
सामने अपनी जान दे दी, और
मीडिया समेत (उसमें मैं खुद भी शामिल था) सभी लोग तमाशा देखते रहे।
गजेंद्र
के लटकने के समय और बाद भी भाषणबाजी चलती रही, भीड़
के चलते कोई हिल भी नहीं पा रहा था, लेकिन
गजेंद्र संभवत: उसी समय अपनी आखिरी यात्रा पर निकल चुके थे। जब एक किसान की, घर के मुखिया की मौत होती है, तो सिर्फ वही नहीं मरता। गजेंद्र के साथ ही
मर गई, वो उम्मीद। जिसके सहारे उसका परिवार जी रहा
था। गजेंद्र के साथ ही मर गए वो सपने, जो
उसके परिवार ने पाल रखे थे।
राजनीतिक
बयानबाजी हुई और प्वाइंट स्कोर करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई। दिल्ली
पुलिस को ललकारते रहे, शिक्षकों
को ललकारते रहे, केंद्र
सरकार को ललकारते रहे। रैली के बाद उसकी मौत पर रोने से भला क्या फायदा होता
सरकार का? अब
तमाम नेता आंसू बहा रहे हैं। छाती पीट रहे हैं। हाय हाय कर रहे हैं। किसान की
लाश को देखने वीआईपी, वीवीआईपी
नेताओं का तांता लगा है। राहुल गांधी से लेकर अजय माकन तक, केंद्रीय मंत्रियों से लेकर दिल्ली सरकार
के मंत्री तक।
आम
आदमी पार्टी सवाल उठा रही है कि किसान खुदकुशी के लिए कैसे मजबूर हुआ? बीजेपी का सवाल है कि किसान की खुदकुशी के
बावजूद आप की रैली कैसे चलती रही? और
कांग्रेस एक साथ इन दोनों सवालों को उछाल रही है। कुल मिलाकर तीनों ही बड़ी
पार्टियों को किसान की इस खुदकुशी में राजनीतिक रोटियां सेंकने का पूरा स्कोप
दिख रहा है। आगे क्या होगा ये देश का बच्चा-बच्चा जानता है। अब मुआवजे का ऐलान
होगा। परिवार के सदस्य को नौकरी की बात होगी।
किसान
के घर में रियल लाइफ की ‘पीपली
लाइव’ फिल्माई जाएगी। लेकिन ये सवाल बाकी रह
जाएगा कि क्या किसान की जिंदगी की यही कीमत है? कमी
राजस्थान के स्थानीय प्रशासन की रही हो या केंद्र सरकार की हो। लेकिन जो
संवेदनहीनता आज जंतर मंतर पर हम सबने बरती, वो
कभी फिर न बरती जाए। बस यही उम्मीद है। जिस तरह घंटे भर से पेड़ पर चढ़े किसान
की धमकी को लोगों ने हल्के में ले लिया था, वैसे
ही किसी परेशान की आवाज को हल्के में न लिया जाए। वर्ना लोग मरते रहेंगे और
मुआवजे की नौटंकी होती रहेगी। इन मौतों के साथ ही मरता रहेगा, एक परिवार का सपना और दागदार होती रहेगी
जिंदगी।
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मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि भ्रम रुपी संसार में ये रेतीले रेगिस्तान भी आते हैं और शायद उनका आना लाजमी और तय हैं,
Wednesday, 22 April 2015
जंतर-मंतर पर हुई किसान के मौत पर आखिर कब तक होगी राजनीति,...गजेंद्र... ये देश शर्मिंदा है...किसानों के मौत पर भी होती हैं राजनीति
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