Wednesday, 15 April 2015

जनता परिवार का कब कब हुआ विलय एक नज़र में

जनता परिवार का अतीत हमेशा से ही मतभेदों भरा रहा है. एकता और एकजुटता की बजाए कलह-कटुता और बिखराव ही जनता दल की कुंडली का लिखा अमिट लेख. आइए जरा नजर डालते हैं जनता दल की बुनियाद से जुड़े नेताओं के बिखराव भरे अतीत पर.
संघर्ष के सिपाही आज मिलने के लिए निकल पड़ें, फिर से उस उजड़े चमन को सजाने जिसकी रौनक अपने ही हाथों से अक्सर मटियामेट करते रहे हैं. इमरजेंसी के बाद देश में जनता सरकार बनीं तो उसी वक्त से जनता परिवार में झगड़े की आग ऐसी सुलगी की लोकनायक जयप्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति का सपना उन्हीं की आंखों के सामने चकनाचूर हो गया. सत्ता का नशा क्रांति पर काबिज हो गया जिसकी वजह से समाजवादी कुनबा धीरे-धीरे जातीय गोलबंदी की सियासत और वंशवादी गुटों में तब्दील होता चला गया.



जनता सरकार में मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह के बीच बंटवारा हो गया. मोरारजी की सरकार से अलग होकर चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार गठित कर ली. जनता सरकार के पतन के बाद जनता पार्टी का समाजवादी कुनबा भी बिखर गया. जिसे जहां राजनीति का रास्ता मिला वो उसी पार्टी के जरिए राजनीति करने लगा और आखिर में राजीव गांधी सरकार के वक्त बोफोर्स की तोप से निकले घोटाले के कथित जिन्न ने नए सिरे से जनता परिवार को एकजुट होने का मौका दिया. राजीव सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस से बगावत कर दी तो सारे युवा तुर्क उनकी छतरी के नीचे आकर खड़े हो गए. जनता दल की बुनियाद पड़ गई.

11 अक्टूबर 1988 को वीपी सिंह की अगुवाई में जनता दल की बुनियाद पड़ी. जनता पार्टी, जनमोर्चा और लोकदल का जनता दल में विलय हो गया. लेकिन वीपी सिंह सरकार बनने के बाद जनता दल में पहली टूट चंद्रशेखर की अगुवाई में हुई. चंद्रशेखर ने अलग होकर जनता दल समाजवादी का गठन किया. कांग्रेस के समर्थन से वो प्रधानमंत्री बने. हालांकि चंद्रशेखर सरकार चार महीने में ही गिर गई. जनता दल समाजवादी का नाम बदलकर समाजवादी जनता पार्टी हो गया.

फिर तो विभाजन का सिलसिला ही चल पड़ा. अहम की लड़ाई में दिल टूटने के साथ ही दल भी टुकड़े टुकड़े होता चला गया. कोई नेता इधर गया तो कोई उधर. वीपी सिंह, लालू यादव, नीतीश कुमार और शरद यादव के साथ देवेगौड़ा जनता दल को बचाने में जुटे लेकिन कोई तरकीब काम नहीं आई.

जनता दल से अलग हुए चंद्रशेखर और मुलायम सिंह यादव में भी फूट पड़ गई. 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी जनता पार्टी से अलग होकर समाजवादी पार्टी का गठन कर लिया. 1992 में चौधरी अजीत सिंह ने भी जनता दल से अलग होकर आरएलडी नामकी नई पार्टी बना ली. ये जनता दल में दूसरी टूट थी.

1994 में जनता दल से अलग होकर जॉर्ज फर्नांडीज और नीतीश कुमार ने समता पार्टी की बुनियाद रखी. ये जनता दल की तीसरी टूट थी.

1996 में कर्नाटक के नेता रामकृष्ण हेगड़े भी जनता दल से अलग हो गए, उन्होंने लोकशक्ति नामक नई पार्टी का गठन कर लिया. ये जनता दल की चौथी टूट थी.

1997 में लालू यादव ने जनता दल से अलग होकर आरजेडी का गठन किया. ये जनता दल में पांचवी बड़ी टूट थी.

1998 में नवीन पटनायक जनता दल से अलग हो गए. ओडिशा में बीजेडी का गठन हुआ. ये जनता दल की छठी बड़ी टूट थी.

1999 में बचे-खुचे जनता दल के भी दो हिस्से बन गए. देवेगौड़ा की अगुवाई में जनता दल सेक्युलर और शरद यादव की अगुवाई में जनता दल यूनाइटेड. ये बिखराव का सातवां अध्याय था जिसमें जनता दल का अस्तित्व हमेशा के लिए खत्म हो गया.

तो ये थी जनता दल की यात्रा के आखिरी पड़ाव तक पहुंचने की छोटी सी कहानी. बंटवारे का सिलसिला आगे भी चलता रहा और जनता दल से निकलकर बनी पार्टियों में भी बिखराव एक सिरे से दूसरे सिरे तक बढ़ता ही गया. मसलन रामविलास पासवान ने जेडीयू से अलग निकलकर लोकजनशक्ति पार्टी का गठन कर लिया और जनता परिवार के नेताओं ने एक एककर सत्ता के लिए ना-ना करते हुए भी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए का दामन भी थाम लिया.

सत्ता के लिए विचार को पीछे छोड़ने के इस सफर में एकजुटता की जरूरत भी वक्त वक्त पर चंद नेताओं ने महसूस की. जॉर्ज फर्नांडीज और नीतीश कुमार की अगुवाई वाले समता पार्टी का विलय शरद यादव की अगुवाई वाली जेडीयू में हो गया. यानी बिखरे जनता परिवार में मिलन की प्रक्रिया भी शुरू हुई जो अब फिर से परवान चढ़ रही है.
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भारत की छह राजनीतिक पार्टियों ने मिलकर एक नया दल बनाने का फ़ैसला कर लिया है.
जनता परिवार के इस विलय का ऐलान दिल्ली में जवता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष शरद यादव ने किया.
उन्होंने ये घोषणा भी की कि इस नए दल के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव होंगे.
जिन छह पार्टियों का विलय होगा वो हैं: जनता दल (यू), समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, भारतीय राष्ट्रीय लोकदल, जनता दल (सेक्यूलर), समाजवादी जनता पार्टी.
य़े सभी एक ज़माने में उस जनता दल का हिस्सा थे जो 1988 में वजूद में आया था. इसीलिए इसे जनता परिवारका विलय भी कहा जा रहा है.
1988 में जनता दल कांग्रेस के खिलाफ वजूद में आया था जिसे तब भाजपा का साथ मिला था. लेकिन आज जो गोलबंदी हो रही है वह भाजपा के खिलाफ हुई है जिसे कांग्रेस का साथ मिलता दिखाई दे रहा है. इस तरह समकालीन भारतीय राजनीति का एक चक्र भी पूरा हुआ है.
क्या है इतिहास
बोफोर्स
बोफोर्स विवाद से शुरू हुई काग्रेस में फूट और जनता दल के शुरू होने की दास्तां
1987 में राजीव गांधी सरकार में वरीय मंत्री रहे कांग्रेस के नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स तौप सौदे में हुए कथित भ्रष्टाचार के सवाल पर बगावत कर दी थी.
भ्रष्टाचार के खिलाफ विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लोकमोर्चा बनाकर पूरे देश में अभियान चलाया जिसको अच्छा जनसमर्थन मिला.
बना जनता दल
शरद यादव
शरद यादव ने बनाई जनता दल युनाइटेड
बैंगलौर (अब बैंगलुरु) में पुरानी जनता पार्टी के धड़ों, लोकदल और कांग्रेस (एस) ने लोकमोर्चा के साथ मिलकर 1988 में जनता दल का गठन किया. जयप्रकाश नारायण की जयंती के दिन यह दल वजूद में आया था.
1989 के आम चुनाव में कांग्रेस के बाद जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनी. कांग्रेस के सरकार बनाने से इंकार करने पर भाजपा, वामपंथी और क्षेत्रीय दलों के समर्थन से 1989 के दिसंबर में विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने.
दो साल में ही हुई पहली टूट
जनता दल ने सत्ता के दरवाज़े पर दस्तक दी और पार्टी में खींच-तान भी शुरु हो गई .
1989 के आम चुनाव के बाद जब जनता दल का नेता चुनने की बारी आई तो पार्टी के तत्कालीन कद्दावर नेता चंद्रशेखर ने देवीलाल का नाम प्रस्तावित किया और देवीलाल ने विश्वनाथ प्रताप सिंह का.
इसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह मान-मनौव्वल के बाद जनता दल के नेता और फिर भारत के प्रधानमंत्री बने.
इस खींच-तान के एक साल के अंदर ही जनता दल टूट भी गया. 1990 के अक्तूबर में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई.
इस बीच 1990 के नवंबर में चंद्रशेखर ने जनता दल के लगभग 60 सांसदों को साथ लेकर समाजवादी जनता पार्टी बनाई और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री भी बने.
बिखर गया चक्र
जनता दल का चुनाव चिह्न चक्र था. चंद्रशेखर की अगुवाई में हुई टूट से जनता दल में जो बिखराव शुरु हुआ वो लगभग अगले एक दशक के दौरान कई बार सामने आया. चक्र के सारे हिस्से धीरे-धीरे अलग होते गए.
मुलायम यादव
1992 के अक्तूबर में चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली समाजवादी जनता पार्टी से टूट कर मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी बनी.
1994 में नीतीश कुमार और दूसरे नेताओं ने लालू प्रसाद यादव का विरोध करते हुए समता पार्टी का गठन किया.
विश्वनाथ प्रताप सिंह
1997 में लालू प्रसाद यादव तत्कालीन जनता दल के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री थे. तब तक वे बहुचर्चित चारा घोटाले में आरोपित हो चुके थे.
उन पर जनता दल के एक धड़े से दबाव था कि वे पार्टी के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दें.
इस पृष्ठभूमि में उन्होंने 5 जुलाई, 1997 को राष्ट्रीय जनता दल का गठन कर लिया.
वहीं एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व में जनता दल (सेक्यूलर) 1999 में वजूद में आया. तब जनता दल से टूट कर यह नई पार्टी बनी थी. उस वक्त शरद यादव जनता दल के अध्यक्ष थे.
बाद में शरद यादव के नेतृत्व में ही जनता दल यूनाइटेड यानी जदयू बनी.
जदयू आज जिस स्वरुप में सामने है वह 2003 में तत्कालीन समता पार्टी और जदयू के विलय के बाद अस्तित्व में आया था.
तब समता पार्टी के अध्यक्ष ज़ॉर्ज फर्नांडीस और जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव थे. विलय के बाद से शरद यादव जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं

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