Monday, 7 March 2016

नारी के हक की लड़ाई


मनुष्य की हर सही परिभाषा मनुष्य का वह सहज स्वरूप है जिसे पाने की कोशिश और पाकर उससे तदाकार होने की इच्छा सब महसूस करते रहते हैं। इस दृष्टि से नारीवाद की सही परिभाषा के केंद्र में भी नारी का वह सहज स्वरूप पाने की इच्छा है जो उसे एक पुरुष के बराबर मानवीय गरिमा या हक पाने का सहज अधिकारी बना दे। केवल श्रद्धा या केवल सहनशीला मां की बजाय सबसे ऊपर उसकी सहज मनुष्यता समाज में स्वीकार की जाए, यह नारीवादी आग्रह विकृत या खतरनाक मानसिकता नहीं। यह तो एक समझदार इंसान की सहज इच्छा की ईमानदार अभिव्यक्ति है। यह सही है कि यह परिभाषा कोई स्थिर या बंधी-बंधाई तस्वीर नहीं, बल्कि निरंतर आगे बढ़ने वाली यात्र की ही झलक है, पर भारत की करोड़ों औरतों द्वारा गुजरे छह दशकों में एक अपूर्ण कामना को लगातार अपने समय के आईने में सारे राज समाज के आगे प्रतिबिंबित करते जाना और चरण दर चरण अपनी मुक्ति के पड़ाव हासिल करना कैसा सजीव, ऊर्जादायक और मर्मस्पर्शी प्रयास है, यह वही समझ सकता है जो मेरी तरह उसका चश्मदीद गवाह और कभी कभार भागीदार, दोनों रहा हो।11950 में संयुक्त राष्ट्र संगठन ने विश्व स्तर पर मानवाधिकारों की व्याख्या करते हुए विश्व युद्धों से घायल दुनिया को 10 दिसंबर के दिन सालाना मानवाधिकार दिवस मनाने का संदेश दिया था। उस व्याख्या का मसौदा बाइबिल के बाद दुनिया का सबसे अधिक अनूदित दस्तावेज बताया जाता है, लेकिन मानवाधिकार दिवसों की छह दशक से लंबी श्रृंखला और उस पर तमाम गहन चिंतन-मनन के बाद भी दुनिया में मानवाधिकारों की, खासकर महिला, बच्चों तथा हाशिये के समूहों के मानवाधिकारों की चिंदियां उड़ाया जाना जारी है। भारत भी इसका खास अपवाद नहीं दिखता। संयुक्त राष्ट्र की व्याख्या का कुल मिलाकर सार यह है कि दुनिया का हर मनुष्य स्त्री हो या पुरुष, कुछ सहज मानवाधिकारों का बुनियादी हकदार है और उसे जन्मना किसी तरह की हिंसक दमनकारिता से रहित वातावरण में अपनी मानवीय गरिमा बनाए रखने, समुचित शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाएं तथा कमाई की सुविधा पाने का अधिकार मिलने चाहिए। लेकिन सिर्फ मसौदा भारतीय भाषाओं में अनूदित कर देने से तो कारगर नीतियां नहीं बनतीं। हाशिये पर सिमटी महिलाओं, बच्चों और तमाम तरह के अल्पसंख्य समूहों के मानवाधिकारों को बहुसंख्य समाज के सवर्ण पुरुषों के हकों के समतुल्य मानते हुए उनकी बहाली पर गंभीर ईमानदार पहल, विज्ञापनी नारेबाजी से इतर बहुत कम हुई है। उलटे यह हमको कई बार दिखता है कि आज भी उपरोक्त समूहों की हक बहाली की संभावना से अब तक अपनी लाठी से हर भैंस को हांकते आए ताकतवर समूह तथा जातीय पंचायतें महिलाओं, बच्चों, दलितों, अल्पसंख्यकों को संसद से सड़क तक और घर से कार्यक्षेत्र तक में बराबरी के अधिकार देने की बातों पर भड़क पड़ते हैं। उपरोक्त बात का एक मजेदार उदाहरण मार्च महीने में एक लोकप्रिय मनोरंजन चैनल द्वारा जारी किया गया विज्ञापन है। यह बड़ी भव्य लच्छेदार अंग्रेजी शब्दावली में बताता है कि उनका चैनल आठ मार्च यानी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर कुछ अन्य कंपनियों के साथ मिलकर एक नौ सदस्यीय जूरी की मदद से मीडिया, मार्केटिंग तथा विज्ञापन के क्षेत्र में देश की 500 शीर्ष महिलाओं की फेहरिस्त जारी करेगा तथा उनको सम्मानित करेगा। जूरी मेंबरान में एक भी महिला को शुमार नहीं किया गया है। जाहिर है, इस अहम क्षेत्र में अभी भी पुरुषों की एकछत्रता में हम जिसे आदर्श नारी कहें वहीं आदर्श नारी हैकी मानसिकता कैसे मजे से पैर फैलाए पसरी हुई है। 1हर मनुष्य के पास एक जैसे मानवाधिकार हैं, यह दर्शन आज सामाजिक-राजनीतिक विषमता की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक वजहों को भी टटोल रहा है। इसीलिए देश को कई ऐसे मानव निर्मित नियमानुशासन दिखने लगे हैं जो विषमता कायम रखे हैं। वे जानबूझकर एक विशिष्ट वर्ग को लिंग, जाति, आयु तथा आयवर्ग के आधार पर दूसरों से कहीं अधिक रेवड़ियां बांटते आए हैं और उनके भेदभाव को भेदभाव पर टिका राज समाज चतुर प्रतीकात्मक तौर से ओट दे देता है। कभी नारी को शक्ति कह पूजनीय बनाकर वास्तविकता पर पर्दा डाला जाता है तो कभी जरूरत के हिसाब से उसी शक्ति स्वरूपा को मनु के हवाले से पुरुषों की खाप पंचायतों की आधीनता में रहने को कहा जा रहा है। जरूरत पड़ी तो ढोल, गंवार..की कोटि में रखकर स्थिति के अनुसार उसे ताड़न का अधिकारी कह हिंसा को नारी जाति का सहज दुर्भाग्य बता दिया जाता है। लोकतांत्रिक सत्ता में बराबरी की भागीदारी की मांग पर महिलाओं, दलितों, पिछड़ों को पंचायतों में कोटा दिला दिया गया, पर शिक्षा या स्वास्थ्य सेवा तक सहज पहुंच अब तक नहीं सुनिश्चित की गई। नतीजतन उनका प्रदर्शन उम्मीदों से कमतर रहा है। अब उसको ही उनकी कुदरती अक्षमता का प्रमाण मानकर उनको संसद में आरक्षण न देने का तर्क पुष्ट किया जाता है। 1एक लोकतंत्र में राजनीति ही ताकत और अधिकारों के संतुलन का सबसे बड़ा जरिया है। इस दृष्टि से हमारी विधायिका में ताकतवर जड़ें बना चुकी महिलाओं का होना बहुत वजन रखता है। 2016 तक राजनीति में पुरुष आधिपत्य के बावजूद तीन नारियों ने केंद्र ही नहीं, बल्कि तीन बड़े राज्यों पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में अपना निर्विवाद दबदबा मनवाया और मनवा रही हैं। उन पर कई तरह के लांछन लगे और वे लगातार अदालती विवादों में खींची गईं, लेकिन उनमें से कोई भी आरोप ऐसा नहीं जो राजनीति में सफल पुरुष नेताओं पर न लगता रहा हो। इसलिए वैचारिक मत भिन्नता के बावजूद हमको उनकी सहज जिजीविषा और क्षमता पर गर्व है। ममता बनर्जी, मायावती और जयललिता, इन तीनों ने बहुत कष्ट ङोलकर धारा के खिलाफ अकेले ही तैरा है। लंबे अर्से से राजनीति में उनको मिल रही सफलता और लोकप्रियता का रहस्य राजीव गांधी या कांशीराम या एमजीआर सरीखे पुरुष नेताओं के वरदहस्त से जोड़ने वालों को यह भी याद दिलाना जरूरी है कि इन तीनों की ताकत अपने राजनीतिक सरपरस्तों की मृत्यु के बाद भी घटी नहीं, बल्कि बढ़ी ही है और आज की तारीख में वे जिस मुकाम पर हैं वह उन्होंने अपनी हिम्मत, मेहनत और सूझबूझ से ही हासिल किया है उनका अटल वोट बैंक और चुनावी जीतों का निजी रिकॉर्ड बताता है कि अपनी मेहनत से अपने लिए कष्ट ङोलकर सहज अधिकार पाने वाली जुझारू महिला कितनी दूर जा सकती है।

Friday, 4 March 2016

लोक सभा में कांग्रेस को पीएम मोदी ने किया पानी-पानी



राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर खिंचाई की थी। ऐसा करके उन्होंने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा था, लेकिन जब प्रधानमंत्री के संबोधन की बारी आई तो उन्होंने कांग्रेस और राहुल गांधी को पानी-पानी कर दिया। उन्होंने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के भाषणों का उल्लेख कर कांग्रेस की बोलती बंद कर दी। इस वार-पलटवार की अपनी-अपनी तरह से व्याख्या होगी-न केवल राजनीतिक दलों के स्तर पर, बल्कि मीडिया और सोशल मीडिया के स्तर पर भी। यह स्वाभाविक है, लेकिन अगर सत्तापक्ष-विपक्ष के बीच संसद चलाने को लेकर कोई सहमति नहीं बनती और पहले की तरह हंगामा-हल्ला होता रहता है तो फिर सब व्यर्थ है। चूंकि सभी प्रमुख राजनीतिक दल कभी न कभी सत्ता में रह चुके हैं इसलिए उनके पास एक दूसरे की गलतियां गिनाने के तमाम अवसर और उदाहरण होते हैं। अब तो ऐसे उदाहरण भी अनुकरणीय बताए जाने लगे हैं जिनमें संसदीय गरिमा का निरादर होता है। आखिर यह एक तथ्य है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब वह भी संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए सत्तापक्ष का सहयोग नहीं करती थी। आज कांग्रेस जैसा व्यवहार कर रही है उसे देखते हुए आश्चर्य नहीं कि भविष्य में उसे अपने इस व्यवहार के लिए ताने सुनने पड़ें। इन स्थितियों में उचित यह होगा कि संसद को राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप से मुक्त करने के उपाय खोजे जाएं। 1यह इसलिए और भी आवश्यक है, क्योंकि विभिन्न मसलों पर सत्तापक्ष और विपक्ष तरह-तरह की दलीलों के साथ एक-दूसरे पर जो निशाना साधते हैं उससे इसका निर्णय बिल्कुल भी नहीं हो पाता कि आखिर किसकी बात सही है और कौन जीता और कौन हारा? आम जनता के पास इतना समय भी नहीं है कि वह दिन भर संसद की कार्यवाही देखती रहे। यदि वह ऐसा करे भी संसद में उसके मन मुताबिक कुछ होने वाला नहीं है। संसद में वही होगा जो राजनीतिक दल चाहेंगे और आज तो स्थिति यह है कि यदि किसी दल के चार सांसद ठान लें कि संसद नहीं चलने देनी है तो वे अपने मकसद में बहुत आसानी से सफल हो जाते हैं। इन स्थितियों में संसदीय कार्यवाही के नए तौर-तरीकों को अमल में लाए जाने की जरूरत है। सभी दल मिल-बैठकर विचार करें कि आरोप-प्रत्यारोप के दलदल से निकलकर संसद को सही तरह से कैसे चलाया जाए? ऐसा कोई उपाय अपनाया जा सकता है कि संसद के प्रत्येक सत्र के दो हिस्से हों। एक हिस्से में विभिन्न मसलों पर जमकर बहस हो और जिसको जो भी कहना हो उसकी पूरी छूट हो, लेकिन दूसरे हिस्से में केवल विधायी एजेंडे को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए। यदि ऐसा कोई उपाय नहीं सोचा जाता तो फिर संसद आम जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतने वाली नहीं है और यह स्पष्ट ही है कि जोरदार-धारदार भाषणों से उसे कुछ न पहले हासिल हुआ है और आगे होने वाला है। संसद आम जनता की अपेक्षाओं को तभी पूरा कर सकती है जब वह अपनी वास्तविक भूमिका निभाती नजर आएगी।

Thursday, 3 March 2016

इशरत जहां मामले में गहन जांच की जरूरत


इशरत जहां मामले में बतौर गृहमंत्री पी चिदंबरम की भूमिका को लेकर संदेह भरे सवाल लगातार सिर उठा रहे हैं। चूंकि ये सवाल बेहद गंभीर हैं और उन्हें एक समय खुद चिदंबरम के सहयोगी रहे अफसर ही उठा रहे हैं इसलिए उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती और इसके बावजूद नहीं की जा सकती कि आखिर इन अफसरों और खासकर तब के गृहसचिव जीके पिल्लई ने समय रहते अपनी आपत्ति क्यों नहीं जताई? चूंकि खुद को प्रताड़ित किए जाने की बात कह रहे गृहमंत्रलय के तत्कालीन अवर सचिव आरवीएस मणि ने पहले भी अपनी शिकायत सार्वजनिक की थी और तब उनकी किसी ने सुनी नहीं इसलिए यह सवाल भी उठता है कि क्या उनकी शिकायत इसीलिए नहीं सुनी गई, क्योंकि संप्रग सरकार मनमानी पर आमादा थी? जो भी हो, गंभीर-अति गंभीर आरोपों से घिरे चिदंबरम की यह सफाई स्वीकार नहीं हो सकती कि उन्होंने इशरत जहां मुठभेड़ के मामले में हलफनामा इसलिए बदला, क्योंकि उन्हें इंटेलिजेंस ब्यूरो की ओर से उपलब्ध कराए गए सुबूत बहुत पुख्ता नहीं जान पड़े। यदि एक क्षण के लिए यह सही भी मान लिया जाए तो भी आखिर हलफनामे को सिरे से बदलने की क्या जरूरत थी और वह भी गृह सचिव को अंधेरे में रखकर? उन्हें यह भी बताना होगा कि क्या गृहमंत्री रहते हुए अपने मंत्रलय की ओर से दायर होने वाले सभी हलफनामे वह खुद लिखाते थे और उनके संदर्भ में गृह सचिव को भी भरोसे में नहीं लेते थे? दरअसल चिदंबरम को ऐसे एक नहीं अनेक सवालों के जवाब देने होंगे, क्योंकि वह इस आरोप से बुरी तरह घिर गए हैं कि उन्होंने अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो का तो दुरुपयोग किया ही, इंटेलिजेंस ब्यूरो के मनोबल को भी तोड़ा और इस तरह आतंकवाद के खिलाफ सक्रिय आंतरिक सुरक्षा के तंत्र को गंभीर क्षति पहुंचाई। 1 यह पहली बार है जब किसी गृहमंत्री पर यह आरोप लग रहा है कि उसने अपने राजनीतिक विरोधियों को फंसाने के लिए आंतरिक सुरक्षा तंत्र से खिलवाड़ किया। यह स्वाभाविक है कि वह भाजपा के निशाने पर हैं, लेकिन आवश्यक केवल यह नहीं है कि इस मसले पर संसद में बहस हो, बल्कि यह भी है कि उन आरोपों की गहन जांच के आदेश दिए जाएं जिनसे पी चिदंबरम दो-चार हैं। यह जांच उच्चस्तरीय होनी चाहिए और साथ ही यथाशीघ्र होनी चाहिए। यह संभव है कि चिदंबरम की भूमिका का खुलासा होने के बाद भी इशरत जहां और तीन अन्य के साथ हुई मुठभेड़ संदिग्ध पाई जाए और इस मामले में चल रहे मुकदमे पर कोई खास असर न पड़े, लेकिन इस सवाल का जवाब सामने आना ही चाहिए कि क्या तत्कालीन गृहमंत्री के रूप में चिदंबरम ने इस सच को छिपाने के लिए छल किया कि इशरत जहां आतंकी संगठन लश्कर की सदस्य थी? क्या इससे सनसनीखेज और कुछ हो सकता है कि एक आतंकी को आम नागरिक साबित करने के लिए तथ्यों से छेड़छाड़ की जाए और वह भी खुद गृहमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति की ओर से? इस विचलित करने वाले सवाल का जवाब सामने आए, यह केंद्र सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए। केंद्र सरकार को यह अहसास होना चाहिए कि जितना जरूरी चिदंबरम के बेटे के संदिग्ध कारोबार की जांच कराना है उससे कहीं ज्यादा जरूरी इशरत मामले में खुद उनकी भूमिका की जांच कराना भी है।