राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने केंद्र सरकार और
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर खिंचाई की थी। ऐसा करके उन्होंने सबका ध्यान
अपनी ओर खींचा था, लेकिन जब प्रधानमंत्री के संबोधन की बारी आई तो उन्होंने
कांग्रेस और राहुल गांधी को पानी-पानी कर दिया। उन्होंने इंदिरा गांधी और राजीव
गांधी के भाषणों का उल्लेख कर कांग्रेस की बोलती बंद कर दी। इस वार-पलटवार की
अपनी-अपनी तरह से व्याख्या होगी-न केवल राजनीतिक दलों के स्तर पर, बल्कि
मीडिया और सोशल मीडिया के स्तर पर भी। यह स्वाभाविक है, लेकिन
अगर सत्तापक्ष-विपक्ष के बीच संसद चलाने को लेकर कोई सहमति नहीं बनती और पहले की
तरह हंगामा-हल्ला होता रहता है तो फिर सब व्यर्थ है। चूंकि सभी प्रमुख राजनीतिक दल
कभी न कभी सत्ता में रह चुके हैं इसलिए उनके पास एक दूसरे की गलतियां गिनाने के
तमाम अवसर और उदाहरण होते हैं। अब तो ऐसे उदाहरण भी अनुकरणीय बताए जाने लगे हैं
जिनमें संसदीय गरिमा का निरादर होता है। आखिर यह एक तथ्य है कि जब भाजपा विपक्ष
में थी तब वह भी संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए सत्तापक्ष का सहयोग
नहीं करती थी। आज कांग्रेस जैसा व्यवहार कर रही है उसे देखते हुए आश्चर्य नहीं कि
भविष्य में उसे अपने इस व्यवहार के लिए ताने सुनने पड़ें। इन स्थितियों में उचित
यह होगा कि संसद को राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप से मुक्त करने के उपाय खोजे
जाएं। 1यह इसलिए और भी आवश्यक है, क्योंकि विभिन्न मसलों पर
सत्तापक्ष और विपक्ष तरह-तरह की दलीलों के साथ एक-दूसरे पर जो निशाना साधते हैं
उससे इसका निर्णय बिल्कुल भी नहीं हो पाता कि आखिर किसकी बात सही है और कौन जीता
और कौन हारा? आम जनता के पास इतना समय भी नहीं है कि वह दिन भर संसद की
कार्यवाही देखती रहे। यदि वह ऐसा करे भी संसद में उसके मन मुताबिक कुछ होने वाला
नहीं है। संसद में वही होगा जो राजनीतिक दल चाहेंगे और आज तो स्थिति यह है कि यदि
किसी दल के चार सांसद ठान लें कि संसद नहीं चलने देनी है तो वे अपने मकसद में बहुत
आसानी से सफल हो जाते हैं। इन स्थितियों में संसदीय कार्यवाही के नए तौर-तरीकों को
अमल में लाए जाने की जरूरत है। सभी दल मिल-बैठकर विचार करें कि आरोप-प्रत्यारोप के
दलदल से निकलकर संसद को सही तरह से कैसे चलाया जाए? ऐसा कोई उपाय अपनाया जा सकता
है कि संसद के प्रत्येक सत्र के दो हिस्से हों। एक हिस्से में विभिन्न मसलों पर
जमकर बहस हो और जिसको जो भी कहना हो उसकी पूरी छूट हो, लेकिन
दूसरे हिस्से में केवल विधायी एजेंडे को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
यदि ऐसा कोई उपाय नहीं सोचा जाता तो फिर संसद आम जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतने
वाली नहीं है और यह स्पष्ट ही है कि जोरदार-धारदार भाषणों से उसे कुछ न पहले हासिल
हुआ है और आगे होने वाला है। संसद आम जनता की अपेक्षाओं को तभी पूरा कर सकती है जब
वह अपनी वास्तविक भूमिका निभाती नजर आएगी।
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