बीते शुक्रवार को जब दोपहर ढल रही थी तक मैंने अपना टेलीविजन ऑन किया और एक राष्ट्रीय समाचार चैनल लगाया। उम्मीद कर रहा था कि रात का खाना खाने से पहले कम से कम देश के हालात से जुड़ी कुछ खबरें देखने-सुनने को मिल जाएंगी। मुझे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने पाया कि करीब-करीब सभी अंग्रेजी समाचार चैनल दिल्ली में टैफिक जाम से जुड़ी खबरें दिखा रहे थे। कुछ चैनलों के न्यूज एंकर पूरी तन्मयता से दर्शकों को बता रहे थे कि 25 हजार शादियों और श्रीश्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित सांस्कृतिक समारोह के कारण आज दिल्ली में ट्रैफिक जाम की भीषण समस्या पैदा हो गई है। उनका लहजा भय पैदा करने वाला था। जैसे कि वे सलाह दे रहे हों कि दिल्ली की जनता को यदि समस्या से पार पाना है तो अपने घरों में बंद रहना चाहिए। इसके बाद उनका ध्यान आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यक्रम पर केंद्रित हो गया जहां प्रधानमंत्री अपना भाषण दे रहे थे। खबरों से यहां ऐसे संकेत मिल रहे थे कि पहले से ही नाजुक हो चुके दिल्ली के वातावरण को जीवनशैली से जुड़े एक गुरु का सांस्कृतिक जमावड़ा तहस-नहस कर देगा। इन लाइनों में छिपा संदेश साफ-साफ नजर आ रहा था कि हिंदूओं की भीड़ ने अपने पर्यावरण विरोधी कृत्यों और महंगी शादियों के कारण राजधानी को बंधक बना लिया है। 1सबसे अधिक विचित्र मुङो यह लगा कि समाचार चैनलों ने अपनी खबरों में दिल्ली में ट्रैफिक जाम को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी। दरअसल देश में हर कोई यह अच्छी तरह जानता है कि उसे अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? मैं यह विश्वास नहीं कर सकता कि आर्ट ऑफ लिविंग संस्था भारत को प्रकृति से विरासत से मिली नदियों के विनाश की मंशा रखती है। इससे भी बढ़कर मेरे लिए यह भी कौतुहल की बात थी कि हमारे समाचार चैनलों में बैठे प्रोड्यूसर विश्वास करते हैं कि दिल्ली की किसी छोटी घटना में भारत के दूसरे शहरों में बैठे अंग्रेजी भाषी दर्शकों की गहरी दिलचस्पी होगी। जैसी कि आदत है या यह कहें कि मेरे लिए नियम बन गया है, मैं किसी भी शहर में होता हूं तो वहां की स्थानीय हलचल से रूबरू होने के लिए सुबह-सुबह अखबार देखना पसंद करता हूं। जब मैं हाल ही में कोलकाता के दौरे पर था तो मैं यह देखकर चकित रह गया कि शहर के प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र ने अपने पूरे प्रथम पृष्ठ पर (विज्ञापनों के कारण अब उसे पहला पन्ना कहना भी मुश्किल है) दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में घटी थोड़ी विवादास्पद घटनाओं को स्थान दिया था। यह सच है कि कोलकाता में जेएनयू के पूर्व छात्रों का पूरा एक निकाय रहता है जो अपनी मातृ संस्था में क्या चल रहा है, यह जानने में दिलचस्पी रखता है, लेकिन क्या उस दिन धरती को झकझोर देने वाला ऐसा कुछ घटित हो गया था कि पूरा पहला पन्ना जेएनयू को समर्पित कर दिया जाता? 1समाचार चैनलों में उभरी इस विकृति के लिए आर्थिक कारण भी जिम्मेदार हैं। आर्थिक तंगी का सामना कर रहे समाचार चैनल अपना फोकस दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र पर इसलिए केंद्रित रखते हैं, क्योंकि इसमें कम लागत आती है। देश के दूरदराज क्षेत्रों में रोचक खबरें जुटाने के लिए आउटसाइड ब्रॉडकास्ट वैन यानी ओबी वैन और संवाददाताओं को भेजना उनके लिए खर्चीला होता है। उनके लिए यह कहीं बेहतर है कि अपने चौखट के सामने घटी घटनाओं को खबरों में प्रमुखता से जगह दें और उसे सच्चे अर्थो में राष्ट्रीय महत्व का बताएं। मीडिया प्रेमी आम आदमी पार्टी की दिल्ली में सरकार को भी इसी कारण लाभ मिल रहा है। मीडिया उसे राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी की सरकार के विकल्प के रूप में देखता है और उससे तुलना करता है। इस प्रकार लागत में कटौती और राजनीतिक वजहों ने खबरों की कसौटी को बदल कर रख दिया है। पूर्व में यह माना जाता था कि राजनीति तो स्थानीय स्तर पर होती है। अब इस सिद्धांत को फिर से लिखा जा रहा है-इस संदेश के साथ कि दिल्ली तो हमेशा राष्ट्रीय है। दिल्ली ही देश नहीं है, लेकिन मीडिया का एक हिस्सा दिल्ली को ही समूचा देश मान बैठा है।1खबरों की कसौटी बदलने से विचित्र परिणाम सामने आए हैं। इस महीने के आरंभ में जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को अदालत द्वारा जमानत दी गई थी। उसके बाद एक हीरो की तरह जेएनयू में उसकी वापसी हुई। उसके भड़कीले भाषण को चैनलों पर लाइव दिखाया गया। करीब-करीब सभी चैनलों ने उसका साक्षात्कार दिखाया। पूरे मामले को एक तमाशे की तरह प्रस्तुत किया गया। इससे भी बढ़कर हास्यास्पद यह रहा कि मीडिया द्वारा उसके विद्रोही भाषण के आधार पर ही उसमें प्लेटो और यहां तक कि लेनिन के बराबर का एक राजनीतिक दार्शनिक देखा जाने लगा। मुङो नहीं लगता कि जेएनयू के एक युवा का यह महिमामंडन मोदी की चमक को फीका कर देगा और अंतत: संसद में भाजपा को विपक्ष में बैठने को मजबूर कर देगा। बहरहाल इससे दुनिया को इतना अवश्य पता चल गया है कि देश में कैंपस और टीवी स्टूडियो को भी राजनीति का अखाड़ा बनाया जा सकता है।1राजनीतिक विमर्श के केंद्र में दिल्ली को लाने से कुछ हास्यास्पद और कम महत्व के विषय मुख्यधारा में जगह पाने में सफल रहे हैं। इससे मीडिया में यह धारणा भी बैठ रही है कि वह बदलाव का अगुआ बन गया है। सोशल मीडिया के एक अवलोकन से पता चलता है कि एंकर और संवाददाता 140 शब्दों में अपने विचार प्रस्तुत करना ज्यादा पसंद करते हैं और खबरों को कवर करने में कम रुचि लेते हैं। 1श्रीश्री रविशंकर के आयोजन के मीडिया की नजरों में चढ़ने की एक वजह यह भी रही। आर्ट ऑफ लिविंग संस्था के प्रमुख को एक कपटी बाबा की तरह प्रस्तुत किया गया और यह दिखाने की कोशिश की गई कि संघर्ष प्रधानमंत्री के हिमदू समर्थकों के खिलाफ है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि यदि यमुना के किनारे अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित किसी संगठन की ओर से इस तरह का सांस्कृतिक आयोजन किया गया होता तो मीडिया ने पर्यावरण की इतनी चिंता नहीं की होती। मीडिया ने उस समय कानून एवं व्यवस्था की भी चिंता नहीं की थी जब साल के आरंभ में मालदा जिले में धार्मिक ताकत का प्रदर्शन किया गया था। क्या मीडिया में मालदा की घटना को अपेक्षित जगह नहीं मिलने की वजह दिल्ली से उसकी दूरी थी? अथवा देश का वर्तमान राजनीतिक माहौल उसके लिए जिम्मेदार था जहां सभी विपक्षी पार्टियां चुनी हुई सरकार को नीचा दिखाने पर तुली हुई हैं? मुङो लगता है कि इस तरह के कठिन सवाल पूछने भर से काम नहीं चलेगा। कुछ ऐसा किया जाना चाहिए जिससे कुछ लोगों का भ्रम टूटे।
मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि भ्रम रुपी संसार में ये रेतीले रेगिस्तान भी आते हैं और शायद उनका आना लाजमी और तय हैं,
Monday, 14 March 2016
उलझन में पड़ी मीडिया
बीते शुक्रवार को जब दोपहर ढल रही थी तक मैंने अपना टेलीविजन ऑन किया और एक राष्ट्रीय समाचार चैनल लगाया। उम्मीद कर रहा था कि रात का खाना खाने से पहले कम से कम देश के हालात से जुड़ी कुछ खबरें देखने-सुनने को मिल जाएंगी। मुझे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने पाया कि करीब-करीब सभी अंग्रेजी समाचार चैनल दिल्ली में टैफिक जाम से जुड़ी खबरें दिखा रहे थे। कुछ चैनलों के न्यूज एंकर पूरी तन्मयता से दर्शकों को बता रहे थे कि 25 हजार शादियों और श्रीश्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित सांस्कृतिक समारोह के कारण आज दिल्ली में ट्रैफिक जाम की भीषण समस्या पैदा हो गई है। उनका लहजा भय पैदा करने वाला था। जैसे कि वे सलाह दे रहे हों कि दिल्ली की जनता को यदि समस्या से पार पाना है तो अपने घरों में बंद रहना चाहिए। इसके बाद उनका ध्यान आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यक्रम पर केंद्रित हो गया जहां प्रधानमंत्री अपना भाषण दे रहे थे। खबरों से यहां ऐसे संकेत मिल रहे थे कि पहले से ही नाजुक हो चुके दिल्ली के वातावरण को जीवनशैली से जुड़े एक गुरु का सांस्कृतिक जमावड़ा तहस-नहस कर देगा। इन लाइनों में छिपा संदेश साफ-साफ नजर आ रहा था कि हिंदूओं की भीड़ ने अपने पर्यावरण विरोधी कृत्यों और महंगी शादियों के कारण राजधानी को बंधक बना लिया है। 1सबसे अधिक विचित्र मुङो यह लगा कि समाचार चैनलों ने अपनी खबरों में दिल्ली में ट्रैफिक जाम को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी। दरअसल देश में हर कोई यह अच्छी तरह जानता है कि उसे अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? मैं यह विश्वास नहीं कर सकता कि आर्ट ऑफ लिविंग संस्था भारत को प्रकृति से विरासत से मिली नदियों के विनाश की मंशा रखती है। इससे भी बढ़कर मेरे लिए यह भी कौतुहल की बात थी कि हमारे समाचार चैनलों में बैठे प्रोड्यूसर विश्वास करते हैं कि दिल्ली की किसी छोटी घटना में भारत के दूसरे शहरों में बैठे अंग्रेजी भाषी दर्शकों की गहरी दिलचस्पी होगी। जैसी कि आदत है या यह कहें कि मेरे लिए नियम बन गया है, मैं किसी भी शहर में होता हूं तो वहां की स्थानीय हलचल से रूबरू होने के लिए सुबह-सुबह अखबार देखना पसंद करता हूं। जब मैं हाल ही में कोलकाता के दौरे पर था तो मैं यह देखकर चकित रह गया कि शहर के प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र ने अपने पूरे प्रथम पृष्ठ पर (विज्ञापनों के कारण अब उसे पहला पन्ना कहना भी मुश्किल है) दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में घटी थोड़ी विवादास्पद घटनाओं को स्थान दिया था। यह सच है कि कोलकाता में जेएनयू के पूर्व छात्रों का पूरा एक निकाय रहता है जो अपनी मातृ संस्था में क्या चल रहा है, यह जानने में दिलचस्पी रखता है, लेकिन क्या उस दिन धरती को झकझोर देने वाला ऐसा कुछ घटित हो गया था कि पूरा पहला पन्ना जेएनयू को समर्पित कर दिया जाता? 1समाचार चैनलों में उभरी इस विकृति के लिए आर्थिक कारण भी जिम्मेदार हैं। आर्थिक तंगी का सामना कर रहे समाचार चैनल अपना फोकस दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र पर इसलिए केंद्रित रखते हैं, क्योंकि इसमें कम लागत आती है। देश के दूरदराज क्षेत्रों में रोचक खबरें जुटाने के लिए आउटसाइड ब्रॉडकास्ट वैन यानी ओबी वैन और संवाददाताओं को भेजना उनके लिए खर्चीला होता है। उनके लिए यह कहीं बेहतर है कि अपने चौखट के सामने घटी घटनाओं को खबरों में प्रमुखता से जगह दें और उसे सच्चे अर्थो में राष्ट्रीय महत्व का बताएं। मीडिया प्रेमी आम आदमी पार्टी की दिल्ली में सरकार को भी इसी कारण लाभ मिल रहा है। मीडिया उसे राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी की सरकार के विकल्प के रूप में देखता है और उससे तुलना करता है। इस प्रकार लागत में कटौती और राजनीतिक वजहों ने खबरों की कसौटी को बदल कर रख दिया है। पूर्व में यह माना जाता था कि राजनीति तो स्थानीय स्तर पर होती है। अब इस सिद्धांत को फिर से लिखा जा रहा है-इस संदेश के साथ कि दिल्ली तो हमेशा राष्ट्रीय है। दिल्ली ही देश नहीं है, लेकिन मीडिया का एक हिस्सा दिल्ली को ही समूचा देश मान बैठा है।1खबरों की कसौटी बदलने से विचित्र परिणाम सामने आए हैं। इस महीने के आरंभ में जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को अदालत द्वारा जमानत दी गई थी। उसके बाद एक हीरो की तरह जेएनयू में उसकी वापसी हुई। उसके भड़कीले भाषण को चैनलों पर लाइव दिखाया गया। करीब-करीब सभी चैनलों ने उसका साक्षात्कार दिखाया। पूरे मामले को एक तमाशे की तरह प्रस्तुत किया गया। इससे भी बढ़कर हास्यास्पद यह रहा कि मीडिया द्वारा उसके विद्रोही भाषण के आधार पर ही उसमें प्लेटो और यहां तक कि लेनिन के बराबर का एक राजनीतिक दार्शनिक देखा जाने लगा। मुङो नहीं लगता कि जेएनयू के एक युवा का यह महिमामंडन मोदी की चमक को फीका कर देगा और अंतत: संसद में भाजपा को विपक्ष में बैठने को मजबूर कर देगा। बहरहाल इससे दुनिया को इतना अवश्य पता चल गया है कि देश में कैंपस और टीवी स्टूडियो को भी राजनीति का अखाड़ा बनाया जा सकता है।1राजनीतिक विमर्श के केंद्र में दिल्ली को लाने से कुछ हास्यास्पद और कम महत्व के विषय मुख्यधारा में जगह पाने में सफल रहे हैं। इससे मीडिया में यह धारणा भी बैठ रही है कि वह बदलाव का अगुआ बन गया है। सोशल मीडिया के एक अवलोकन से पता चलता है कि एंकर और संवाददाता 140 शब्दों में अपने विचार प्रस्तुत करना ज्यादा पसंद करते हैं और खबरों को कवर करने में कम रुचि लेते हैं। 1श्रीश्री रविशंकर के आयोजन के मीडिया की नजरों में चढ़ने की एक वजह यह भी रही। आर्ट ऑफ लिविंग संस्था के प्रमुख को एक कपटी बाबा की तरह प्रस्तुत किया गया और यह दिखाने की कोशिश की गई कि संघर्ष प्रधानमंत्री के हिमदू समर्थकों के खिलाफ है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि यदि यमुना के किनारे अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित किसी संगठन की ओर से इस तरह का सांस्कृतिक आयोजन किया गया होता तो मीडिया ने पर्यावरण की इतनी चिंता नहीं की होती। मीडिया ने उस समय कानून एवं व्यवस्था की भी चिंता नहीं की थी जब साल के आरंभ में मालदा जिले में धार्मिक ताकत का प्रदर्शन किया गया था। क्या मीडिया में मालदा की घटना को अपेक्षित जगह नहीं मिलने की वजह दिल्ली से उसकी दूरी थी? अथवा देश का वर्तमान राजनीतिक माहौल उसके लिए जिम्मेदार था जहां सभी विपक्षी पार्टियां चुनी हुई सरकार को नीचा दिखाने पर तुली हुई हैं? मुङो लगता है कि इस तरह के कठिन सवाल पूछने भर से काम नहीं चलेगा। कुछ ऐसा किया जाना चाहिए जिससे कुछ लोगों का भ्रम टूटे।
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