अंतरराष्ट्रीय संस्था 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने दुनिया भर की मीडिया की निष्पक्षता पर एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें अंतरराष्ट्रीय मीडिया रैंकिंग में भारत को 140 वां स्थान हासिल हुआ है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का मानना है कि भारत में मीडिया की आजादी सिर्फ कहने भर के लिए है। सच्चाई तो यह है कि भारत की मीडिया स्वतंत्रता और निष्पक्षता के मामले में अफ्रीकी और अरब के देशों से भी नीचे है। यहां तक कि लगातार आतंकवाद और युद्ध की विभीषिका झेलने वाले अफगानिस्तान में भी मीडिया भारत से अधिक सशक्त है। तो क्या भारतीय मीडिया के दुर्गति की कहानी शुरु हो चुकी है।
मुद्दों से भटकने में इलेक्ट्रोनिक मीडिया को महारत हासिल
महंगाई और भ्रष्टाचार से कराहती जनता के लिए आज मुख्य धारा की इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में शायद ही कहीं कोई जगह बची है। जितने भी घोटाले सामने आए हैं वो मुख्य नियंत्रक महालेखा परीक्षक (सीएजी) जैसी संवैधानिक संस्था की वजह से आए हैं। हमारी मुख्यधारा की मीडिया या तो उन घोटालों में शामिल रही है या फिर मुद्दों को भटकाने में 'कलम' 'गन माइक' और 'चैट शो' के जरिए जुटी हुई दिखी है।
पत्रकारों पर है विश्वास का संकट
खुद को मूर्धन्य और वरिष्ठ मानने वाले पत्रकारों के समक्ष आज विश्वास का संकट पैदा हो चुका है। लोग पहले जब किसी पत्रकार से मिलते थे तो आदर के साथ मिलते थे, लेकिन आज तो मिलते ही पत्रकारों व मीडिया संस्थानों पर सवालों की बौछार कर उन्हें कटघरे में खड़ा करने लगे हैं।
कुछ समय पूर्व वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने एक साक्षात्कार में स्पष्ट शब्दों में और बड़ी ही साफगोई से यह कहा था कि यूपीए सरकार के मंत्रियों का समूह संपादकों की बैठक लेता है और उन्हें बताता है कि कौन-सी खबर को कितनी तवज्जो देनी है। पुण्य आज के समय अपनी जन सरोकार आधारित पत्रकारिता के लिए हिंदी समाचार चैनलों में शायद एक मात्र विश्वसनीय नाम रह गए हैं। इस दौर में जब बड़े-बड़े पत्रकारों व मीडिया हाउसों का नाम प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोल-गेट घोटाले में आ चुका है तो ऐसे में हिंदी की टीवी पत्रकारिता में पुण्य प्रसून, अंग्रेजी के टीवी जर्नलिज्म में टाइम्स नाउ के अर्णव गोस्वामी और प्रिंट मीडिया में दैनिक जागरण के अंशुमन तिवारी जैसे कुछ पत्रकार ही बचे हैं जो आज भी बस केवल पत्रकारिता ही कर रहे हैं।
यूपीए2 की रणनीति: मीडिया मैनेज करो या उसे दबाओ
वास्तव में 'मीडिया को मैनेज करो या फिर उसे दबाओ' की रणनीति पर चल रही वर्तमान यूपीए सरकार अघोषित अपातकाल की ओर बढ़ रही है। हाल के वर्षों में अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त माध्यम के रूप में उभरे सोशल साइटों पर प्रतिबंध लगाकर सरकार ने यह दर्शा दिया है कि उसके लिए लोकतंत्र का मतलब जनता से सिर्फ वोट हासिल करना है, न कि जनता को अपनी बात कहने का मौका देना।
रोष को व्यक्त करने का माध्यम बना सोशल मीडिया
सरकार की असंवेदनशीलता और मुख्यधारा की मीडिया की 'सरकारी रिपोर्ट' से उपजे आक्रोश के लिए सोशल मीडिया एक नया प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है।
दिल्ली गैंग रेप की शिकार 'दामिनी' के लिए सड़कों पर उतरने की घटना हो, हैदराबाद के विधायक ओवैसी की संप्रदायिक भाषण के खिलाफ हल्ला बोलना हो या उससे पहले अन्ना हजारे का आंदोलन, सोशल मीडिया ने आम जनता को ऐसी ताकत दी कि वो अपनी बात खुलकर कहने और लोगों को जोड़कर सड़क पर उतरने लगे। सरकार को इसकी उम्मीद ही नहीं थी। वो तो माने बैठी थी कि 'मैनेज्ड मीडिया' जो दिखाएगा, जनता उसे ही सच मानेगी। लेकिन सोशल मीडिया ने पूरा परिदृश्य ही बदल दिया। सोशल मीडिया पर कांग्रेस पार्टी, कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी, युवराज राहुल गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रति बढते आक्रोश का ही नतीजा था कि हाल ही में जयपुर में संपन्न हुए कांग्रेस चिंतन शिविर में सोशल मीडिया भी एक मुददा बना। सोनिया गांधी ने साफ शब्दों में कहा कि सोशल मीडिया को समझने में हमसे देर हो गई।
सोशल मीडिया को बैन करने में सरकार को दिखा रास्ता
सभी ने देखा कि करीब छह लाख करोड़ के घोटाले को अंजाम देने का आरोप झेल रही यूपीए2 सरकार ने अपनी अलोचना से चिढ़ कर पिछले साल सोशल मीडिया पर और वेबसाइटों पर पाबंदी लगाने की कोशिश की थी। यही नहीं, गूगल सहित फेसबुक, ट्वीटर सभी से धमकी भरे अंदाज में सरकार के मंत्री बात कर रहे थे। गूगल ने तो कहा भी कि दुनिया भर में सबसे अधिक शब्दों को बैन करने की अर्जी भारत सरकार की ओर से प्राप्त हुई है।
भारत में पिछले साल सोशल मीडिया पर नकेल कसने की यूपीए सरकार की कोशिशों का भारी विरोध हुआ था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की सरकार पर गंभीर सवाल उठाए गए थे। मुंबई की उस घटना पर भारत की काफी फजीहत हुई थी, जिसमें बाल ठाकरे की मौत के एक बाद एक लड़की द्वारा फेसबुक पर किए गए कमेंट के कारण उसे गिरफ्तार कर लिया गया था। पिछले ही साल कार्टुनिस्ट असीम त्रिवेदी के एक कार्टून की वजह से उन पर राष्ट्रदोह का मुकदमा दर्ज किया गया था, जिसे काफी हंगामे के बाद हटाया गया। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि कांग्रेस संचालित यूपीए सरकार की पूरी मंशा सोशल मीडिया को कुचलने की है।
सोशल मीडिया का आभासी चरित्र आंदोलन में हो रहा है तब्दील
मिश्र की क्रांति को लोगों ने फेसबुक क्रांति कहा था, लेकिन देख़ते ही देख़ते पूरी दुनिया इस सोशल नेटवर्क से उत्पन्न हुई क्रांति की चपेट में आ गई। रूस में पुतिन के खिलाफ तो एक ब्लॉगर ने ही आंदोलन की शुरुआत की थी। भारत में अण्णा हज़ारे के आंदोलन को facebook, twitter और SMS के जरिए जिस तरह से युवाओं का समर्थन मिला, उससे कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पूरी तरह से बौखला गई।
निवर्तमान केंद्रीय सूचना एवं प्रद्यौगिकी मंत्री कपिल सिब्बल को इस सभी पर प्रतिबंध लगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। माननीय मंत्री ने पहले बल्क एसएमएस पर रोक लगाकर इसकी शुरुआत की और बाद में फेसबुक, गूगल, यू टयूब जैसे साइटों के प्रबंधकों को बुलाकर इस पर सेंसरशिप लागू करने का दबाव डाला। आम जनता को उसी वक्त पता चल गया कि यूपीए सरकार की मंशा आखिर क्या है? वह लोकतंत्र का दंभ तो भरती है, लेकिन लोकतंत्र में विरोध को दबाने की मंशा भी रख़ती है।
सोशल मीडिया को दबाने के लिए मुकदमों की बारिश
सोशल साइट संचालकों द्वारा सेंसरशिप से हाथ खडे करने के तुरंत बाद इन नेटवर्किंग साइटों के खिलाफ दिल्ली की अदालतों में मुकदमों की बारिश हो गई। शायद ही किसी को इसमें शक हो कि अदालत में मुकदमा दर्ज कराने वाले लोगों को सरकारी तंत्र से बढ़ावा दिया गया था। जल्दबाजी में हो रहे अदालती निर्णय से भी लोगों का यह शक पुख्ता हुआ कि सरकार और अदालत मिलकर सेंसरशिप की ओर बढ रहे हैं।
13 जनवरी 2011 को फेसबुक, गूगल सहित 21 वेबसाइटों के खिलाफ जिस तरह से केंद्र सरकार ने मुकदमा दर्ज़ करने की अनुमति दी, उससे साबित हो गया कि केंद्र सरकार की मंशा देश में अघोषित रूप से अपातकाल लगाने की है। मुख्यधारा की मीडिया तो बहुत हद तक सरकारी प्रवक्ता की तरह व्यवहार कर रही है, जिससे लोगों की उम्मीद पूरी तरह से टूट चुकी है। देश की आम जनता, खासकर युवा पीढी ने मुख्यधारा की मीडिया की विश्वसनीयता समाप्त होने के बाद ही सोशल साइटों की ओर रुख किया है, जिसे सरकार नहीं पचा पा रही है।
सोशल साइट के निशाने पर कांग्रेस व गांधी परिवार
सरकार की पहली प्राथमिकता उन लोगों के आईडी को ब्लॉक करने की थी, जो यूपीए सरकार, कांग्रेस और सोनिया-राहुल गांधी को लेकर मुख्यधारा की मीडिया द्वारा छुपाई गई जानकारी को शेयर कर रहे थे। सरकार ऐसे जुट गई जैसे सोनिया-राहुल को गोद में छुपाना चाहती हो।
उदाहरण के लिए रामेश्वर आर्या न केवल खुद फेसबुक पर मौजूद हैं, बल्कि फेसबुक पर वह 18 पेजों को संचालित कर रहे हैं। उनका हमला, कांग्रेस व यूपीए सरकार पर तो है ही, उन्होंने बकायदा एक पेज बना रखा था, जिसका नाम ` रियलिटी ऑफ कांग्रेस, गांधी-नेहरू परिवार' है। इस पेज के साथ उनके सभी 18 पेज बंद कर दिए गए। रामेश्वर आर्य बताते हैं कि उनके friend लिस्ट में 5000 व्यक्ति हैं। 3000 लोगों ने उन्हें सब्सक्राइव कर रखा है। इसके अलावा उनके 18 पेजों पर 10 हज़ार से अधिक समर्थक हैं। मेरे आईडी को ब्लॉक कर दिया गया है। बिना आईडी के इन पेजों का संचालन भी नहीं किया जा सकता है।
ऐसे ही एक व्यक्ति हैं भगत सिंह क्रांति सेना के तजिंदर पाल सिंह बग्गा। तजिंदर पाल सिंह बग्गा वही हैं, जिन्होंने टीम अण्णा के सदस्य प्रशांत भूषण को कश्मीर पर देश विरोधी बयान के मद्देनजर चेंबर में घुसकर मारा था और उसके बाद वह तीन दिन जेल में रहकर भी आए हैं। तेजेंद्र का आईडी भी ब्लॉक कर दिया गया है। तेजेंद्र का कहना है कि सरकार लोगों के समर्थकों की कडि़यों को तोडने की मंशा से काम कर रही है। मेरे पांच हज़ार समर्थक थे, लेकिन अब कोई और आइडी से फेसबुक एकाउंट खोलूंगा तो फिर से फ्रेंड बनाने में बहुत समय लगेगा। इस देश में या तो आपातकाल लगाने की तैयारी है या फिर इस देश में विद्रोह की आग भड़केगी। सरकार यह सब कांग्रेस और गांधी परिवार की सच्चाई को छुपाने की नीयत से कर रही है।
अभी भी मुगालते में है सरकार
इस सबके बावजूद इसी सरकार में कपिल सिब्बल जैसे मंत्रियों को अभी भी यह लग रहा है कि सोशल मीडिया को कुचल दो और मुख्यधारा की मीडिया को साध लो तो काम बन जाएगा। यूपीए सरकार के ऐसे मंत्रियों की कुबुद्धि का ही परिणाम है कि सरकार व मीडिया दोनों की साख पर सोशल मीडिया के जरिए देश की जनता ने धावा बोल दिया है।
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