Wednesday, 19 March 2014

मेरी बात

हर वक्त कई चीज़ें करने का मन करता है। शौक-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर। स्कूल की मिट चुकी तमाम स्मृतियों में से एक यही लाइन बची रह गई। बाकी आज तक नहीं समझ पाया कि दस बारह सालों तक स्कूल क्यों गया? इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिला। ज़ाहिर है जब मैं लिखूंगा तो वो मेरे ही व्यक्तिगत विचार कहलायेंगे किसी संस्थान के नहीं। विचारों की मॉनिटरिंग करने वाले संस्थानों से मुझे कोई सहानुभूति भी नहीं। मेरी कोई भी रचना कालजयी नहीं मानी जाए। न ही पत्रकारिता या साहित्य में योगदान के रूप में देखी जाए। मैं हिन्दी पट्टी में इन दोनों भूमिकाओं के निभाने के दायित्व से खुद को मुक्त कर चुका हूं। भारत के संविधान के तहत। कस्बा ने कई रिश्तेदारियां दी हैं। कमेंटबाज़ मेरे घर के सदस्य लगते हैं। ब्लॉग हम सब का एक मेंटल ब्लॉक है जिसके प्रखंड विकास पदाधिकारी भी हमी हैं। आमीन।

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