मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि भ्रम रुपी संसार में ये रेतीले रेगिस्तान भी आते हैं और शायद उनका आना लाजमी और तय हैं,
Thursday, 11 December 2014
खामोश सफ़र!!!!!!: पाकिस्तान के रग-रग में ज़हर
खामोश सफ़र!!!!!!: पाकिस्तान के रग-रग में ज़हर: पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अपनी कड़वी जुबान से... कुछ ऐसे घिनौने राज़ उगले हैं जिनकी बानगी सुनकर आप भी सकते में पड़ ज...
पाकिस्तान के रग-रग में ज़हर
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अपनी कड़वी
जुबान से... कुछ ऐसे घिनौने राज़ उगले हैं जिनकी बानगी सुनकर आप भी सकते में पड़
जाएंगे। जी हां पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और सैन्य तानाशाह... परवेज मुशर्रफ
ने कहा कि आत्मसम्मान की बलि देकर भारत से दोस्ती नहीं की जा सकती।
पाकिस्तानी टीवी चैनल के साथ एक इंटरव्यू में परवेज मुशर्रफ ने कहा कि लोगों की ये गलत धारणा है कि वह भारत से दोस्ती नहीं चाहते। अपने कार्यकाल के संबंधों का जिक्र करते हुए मुशर्रफ ने कहा कि उनके कार्यकाल में दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध रहे हैं। उनके नेतृत्व में दोनों देश कश्मीर, सर क्रीक और पानी मसले से जुड़े अहम विवाद को खत्म करने के करीब पहुंच गए थे। लेकिन जब न्यूज़ एंकर ने उनसे कारगिल ऑपरेशन का मास्टरमाइंड होने के बारे में सवाल पूछा....तो उन्होंने इसपर सहमति जताते हुए कहा कि करगिल घुसपैठ का पूरा ताना-बाना भारत से बदला लेने के लिए बुना गया था।
परवेज मुशर्रफ ने कहा कि भारत ने पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप किया। जिसका दंड उसे करगिल में दिया गया। भारत ने भी बांग्लादेश के गठन में भूमिका निभाई इसीलिए करगिल युद्ध हुआ। मुशर्रफ ने कहा कि ऐसा करके पाकिस्तान ने कोई गलती नहीं की। मुशर्रफ की बेशर्मी तो देखिए कि अपनी करतूतों का ठीकरा भारत पर फोड़ते हुए उसने... सीमा पर फायरिंग के लिए भी भारत को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने कहा कि हम भारत से दोस्ती करना चाहते हैं, लेकिन पहले भारत को सीमा पर फायरिंग बंद करनी होगी और हमारे जवानों को मारना बंद करना होगा, तभी सीमा पर शांति स्थापित हो सकती है।
इससे पहले भी पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने... युद्धविराम के उल्लंघन का ठीकरा भारत के सिर ही फोड़ा... मुशर्रफ ने उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत को सही ठहराते हुए भारत को ये चेतावनी दी थी...कि भारत, पाकिस्तान के सब्र का इम्तिहान न ले।
दुनिया जानती है कि पाकिस्तान की सरज़मी पर आतंक की खेप तैयार की जाती है। पाकिस्तान खूंखार आतंकियों की फौज तैयार करता है... और फिर उसे इंसानियत का कत्ल करने के लिए भारत समेत दूसरे देशों में सप्लाई करता है। अमेरिका में हुआ 9/11 का आतंकी हमला हो...या फिर मुंबई में हुआ 26/11 का आतंकी हमला... हर बार हमलों के पीछे पाकिस्तान की शर्मनाक भूमिका सामने आई....हर बार दहशतगर्दों को पनाह देने के आरोप में....अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की किरकिरी हुई। फिर चाहे हो अमेरिका में दहशत फैलाने वाला ओसामा बुन लादेन हो...या मुंबई में सैकड़ों लोगों का खून बहाने वाला अजमल आमिर कसाब हो। चाहे भारत की संसद पर आतंकी हमले की साजिश रचने वाला अफज़ल गुरू हो..या फिर पिछले तीन दशकों से देश में खौफ का सबब बन चुका..दाउद इब्राहिम कास्कर हो। ये सभी दहशतगर्द पाकिस्तान की सरज़मी पर जन्में और पले-बढ़े वो सपोले हैं... जिनकी रग-रग में ज़हर भरा है। लेकिन परवेज मुशर्रफ उल्टे भारत पर ही आतंकवाद की फंडिंग का आरोप लगा रहे हैं। मुशर्रफ ने कहा कि मोदी की सरकार में भारत और पाकिस्तान की दोस्ती संभव है। लेकिन भारत सीजफायर का उल्लंघन करता रहे, हमारे सैनिकों की हत्या करे, ब्लुचिस्तान में आतंकवाद की फंडिंग करता रहे तो ऐसे में कैसे रिश्ते सुधर सकते हैं। हम भारत से रिश्ते सुधारना चाहते हैं लेकिन आत्मसम्मान की कीमत पर पाकिस्तान भारत के आगे झुकने वाला नहीं है।
मतलब साफ है कि या तो मुशर्रफ साहब की याददास्त कमजोर हो चुकी है...या फिर आज तक किसी ने उन्हें अपनी गिरेबां में झांकने की हिदायत नहीं दी। यही वजह है कि वो इस तरह के बेतुके बयान देकर... पाकिस्तान में अपना पोलिटिकल ग्राउंड मजबूत करने में लगे हैं। ताकि आवाम को भारत के खिलाफ भड़काकर वो अपने लिए सत्ता का रास्ता साफ कर सकें। लेकिन मुशर्रफ साहब मत भूलिए कि जिस लड़ाई का आप बहादुरी से सीना ठोंक कर जिक्र कर रहे हैं.,..उसी करगिल की लड़ाई में आपको मुंह की खानी पड़ी थी। करगिल की लड़ाई पर बेबाकी से बोलने बाले मुशर्रफ की इससे बड़ी बेशर्मी और भला क्या होगी।
पाकिस्तानी टीवी चैनल के साथ एक इंटरव्यू में परवेज मुशर्रफ ने कहा कि लोगों की ये गलत धारणा है कि वह भारत से दोस्ती नहीं चाहते। अपने कार्यकाल के संबंधों का जिक्र करते हुए मुशर्रफ ने कहा कि उनके कार्यकाल में दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध रहे हैं। उनके नेतृत्व में दोनों देश कश्मीर, सर क्रीक और पानी मसले से जुड़े अहम विवाद को खत्म करने के करीब पहुंच गए थे। लेकिन जब न्यूज़ एंकर ने उनसे कारगिल ऑपरेशन का मास्टरमाइंड होने के बारे में सवाल पूछा....तो उन्होंने इसपर सहमति जताते हुए कहा कि करगिल घुसपैठ का पूरा ताना-बाना भारत से बदला लेने के लिए बुना गया था।
परवेज मुशर्रफ ने कहा कि भारत ने पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप किया। जिसका दंड उसे करगिल में दिया गया। भारत ने भी बांग्लादेश के गठन में भूमिका निभाई इसीलिए करगिल युद्ध हुआ। मुशर्रफ ने कहा कि ऐसा करके पाकिस्तान ने कोई गलती नहीं की। मुशर्रफ की बेशर्मी तो देखिए कि अपनी करतूतों का ठीकरा भारत पर फोड़ते हुए उसने... सीमा पर फायरिंग के लिए भी भारत को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने कहा कि हम भारत से दोस्ती करना चाहते हैं, लेकिन पहले भारत को सीमा पर फायरिंग बंद करनी होगी और हमारे जवानों को मारना बंद करना होगा, तभी सीमा पर शांति स्थापित हो सकती है।
इससे पहले भी पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने... युद्धविराम के उल्लंघन का ठीकरा भारत के सिर ही फोड़ा... मुशर्रफ ने उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत को सही ठहराते हुए भारत को ये चेतावनी दी थी...कि भारत, पाकिस्तान के सब्र का इम्तिहान न ले।
दुनिया जानती है कि पाकिस्तान की सरज़मी पर आतंक की खेप तैयार की जाती है। पाकिस्तान खूंखार आतंकियों की फौज तैयार करता है... और फिर उसे इंसानियत का कत्ल करने के लिए भारत समेत दूसरे देशों में सप्लाई करता है। अमेरिका में हुआ 9/11 का आतंकी हमला हो...या फिर मुंबई में हुआ 26/11 का आतंकी हमला... हर बार हमलों के पीछे पाकिस्तान की शर्मनाक भूमिका सामने आई....हर बार दहशतगर्दों को पनाह देने के आरोप में....अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की किरकिरी हुई। फिर चाहे हो अमेरिका में दहशत फैलाने वाला ओसामा बुन लादेन हो...या मुंबई में सैकड़ों लोगों का खून बहाने वाला अजमल आमिर कसाब हो। चाहे भारत की संसद पर आतंकी हमले की साजिश रचने वाला अफज़ल गुरू हो..या फिर पिछले तीन दशकों से देश में खौफ का सबब बन चुका..दाउद इब्राहिम कास्कर हो। ये सभी दहशतगर्द पाकिस्तान की सरज़मी पर जन्में और पले-बढ़े वो सपोले हैं... जिनकी रग-रग में ज़हर भरा है। लेकिन परवेज मुशर्रफ उल्टे भारत पर ही आतंकवाद की फंडिंग का आरोप लगा रहे हैं। मुशर्रफ ने कहा कि मोदी की सरकार में भारत और पाकिस्तान की दोस्ती संभव है। लेकिन भारत सीजफायर का उल्लंघन करता रहे, हमारे सैनिकों की हत्या करे, ब्लुचिस्तान में आतंकवाद की फंडिंग करता रहे तो ऐसे में कैसे रिश्ते सुधर सकते हैं। हम भारत से रिश्ते सुधारना चाहते हैं लेकिन आत्मसम्मान की कीमत पर पाकिस्तान भारत के आगे झुकने वाला नहीं है।
मतलब साफ है कि या तो मुशर्रफ साहब की याददास्त कमजोर हो चुकी है...या फिर आज तक किसी ने उन्हें अपनी गिरेबां में झांकने की हिदायत नहीं दी। यही वजह है कि वो इस तरह के बेतुके बयान देकर... पाकिस्तान में अपना पोलिटिकल ग्राउंड मजबूत करने में लगे हैं। ताकि आवाम को भारत के खिलाफ भड़काकर वो अपने लिए सत्ता का रास्ता साफ कर सकें। लेकिन मुशर्रफ साहब मत भूलिए कि जिस लड़ाई का आप बहादुरी से सीना ठोंक कर जिक्र कर रहे हैं.,..उसी करगिल की लड़ाई में आपको मुंह की खानी पड़ी थी। करगिल की लड़ाई पर बेबाकी से बोलने बाले मुशर्रफ की इससे बड़ी बेशर्मी और भला क्या होगी।
Wednesday, 10 December 2014
शांति दूत से पुरसकृत किए गए अमन के सिपाही
दो देशों की दो नामी हस्तियों के सम्मान की कहानी...जिन्होंने ज़मीन से
उठकर...आसमान की ऊंचाइयों को छुआ... जिन्होंने जान की बाजी लगाई और दुनिया के लिए
एक बाजीगर बनकर सामने आए...जिनका लोहा पूरे देश माना...यही वजह है कि इन सूरमाओं
को..विश्व के सबसे बड़े सम्मान से नवाजा गया..जी हां हम पात कर रहे हैं...भारत के
सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी की...और पाकिस्तान की रहने वाली मलाला युसुफज़ई
की। इन दोनों ही हस्तियों को... विश्व के सबसे बड़े सम्मान यानी नोबेल पुरस्कार से
नवाजा गया है।
अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भारत और पाकिस्तान के बीच तल्खी बढ़ी है.... लेकिन दोनों मुल्कों से अमन के दो चेहरों को बुधवार को दुनिया के सर्वोच्च सम्मान... नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया.... भारत के कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को ये पुरस्कार नार्वे की राजधानी ओस्लो में दिया गया। नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा करीब दो महीने पहले हो गई थी, लेकिन अब बारी आई इन दोनों हस्तियों को साझा सम्मान देने की....तो नोबेल पुरस्कारों के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत और पाकिस्तान के दो शांति दूत.. एक साथ जब सम्मान लेने पहुंचे...तो समारोह में मौजूद हर खास-ओ-आम की नज़र उनपर टिक गईं...हर कोई ये देखकर हैरान था कि..दोनों देशों के बीच भले ही बॉर्डर पर तनावपूर्ण माहौल हो..लेकिन लोगों के दिलों में एक दूसरे के लिए कितनी प्यार और सम्मान भरा है।
पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई भारत के कैलाश सत्यार्थी को पिता के समान बताती है, वहीं सत्यार्थी भी मलाला को अपनी बेटी मानते हैं. भारत और पाकिस्तान के इन दो चेहरों को नोबेल का साझा सम्मान....ऐसे समय में मिला है, जब दोनों देशों के बीच सत्ता से लेकर सरहद तक रिश्ते तल्ख हैं।
मलाला की ख्वाहिश थी कि पुरस्कार के वक्त भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी समारोह में मौजूद रहें....इस ख्वाहिश के पीछे यकीनन मलाला की चाहत...दोनों देशों के बीच अमन का नया रास्ता खोजने की थी, लेकिन ऐसा हो न सका।
बचपन बचाओ आंदोलन के अगुवा.. कैलाश सत्यार्थी भारत में जन्मे पहले शख्स हैं, जिन्हें शांति का नोबल पुरस्कार मिला है। 1979 में मदर टेरेसा के बाद सत्यार्थी दूसरे भारतीय हैं, जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया है। वहीं, तालिबानी हमले के बाद से सुर्खियों में रही मलाला पाकिस्तान से शांति का नोबेल पाने वाली पहली शख्सियत हैं.... यही नहीं, मलाला का नाम सबसे कम उम्र की नोबेल विजेता के रूप में भी दर्ज हो गया है।
बहरहाल, कैलाश और मलाला दोनों के लिए ये मौका बेहद अहम है.... इसलिए नहीं कि इन्हें बड़ा सम्मान मिला है... बल्कि इसलिए कि अब इसके साथ नई चुनौतियां भी जुड़ गई हैं.... हालांकि साझे सम्मान के साथ साझी मुहिम के हौसले भी बुलंद हैं, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती... दोनों देशों के बीच स्थाई रूप से अमन का रास्ता ढूंढ़ने की है।
मध्य प्रदेश के विदिशा में 11 जनवरी 1954 को पैदा हुए कैलाश सत्यार्थी.... 'बचपन बचाओ आंदोलन' चलाते हैं...उन्हें बच्चों के शोषण के ख़िलाफ़ और सभी को शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए... शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया है...पेशे से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर रहे कैलाश सत्यार्थी ने 26 साल की उम्र में ही करियर छोड़कर बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था....उन्हें बाल श्रम के ख़िलाफ़ अभियान चलाकर... हज़ारों बच्चों की ज़िंदग़ियां बचाने का श्रेय दिया जाता है....सत्यार्थी इस वक्त 'ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर' यानी बाल श्रम के ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान के अध्यक्ष भी हैं।
कैलाश सत्यार्थी के संघर्षों की कहानी किसी से छिपी नहीं है..उनकी वेबसाइट के मुताबिक़ बाल मजदूरों को छुड़ाने के दौरान.... उन पर कई बार जानलेवा हमले भी हुए हैं... 17 मार्च 2011 में दिल्ली की एक कपड़ा फ़ैक्ट्री पर छापे के दौरान...उन पर हमला किया गया.... इससे पहले 2004 में ग्रेट रोमन सर्कस से... बाल कलाकारों को छुड़ाने के दौरान उन पर हमला हुआ। ये सत्यार्थी की जिंदादिली ही थी.. कि बार-बार हमलों के बाद भी उनके इरादों पर विराम नहीं लगा। जिस हौसलों के साथ उन्होंने इस सफर की शुरुआत की थी...वो सफर आज भी बदस्तूर जारी है। बच्चों के लिए अपनी जान जोखिम में डालने वाले...कैलाश सत्यार्थी.... ना सिर्फ भारत में...बल्कि विदेशों में भी एक मिसाल के तौर पर जाने जाते हैं। उनकी तम्मना है कि वो बच्चों के शोषण के सिलसिले को जड़ से खत्म कर दें।
बाइट - कैलाश सत्यार्थी, नोबेल विजेता
नोबेल पुरस्कार से पहले उन्हें देश और दुनिया के कई बड़े सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। 1994 में जर्मनी का 'द एयकनर इंटरनेशनल पीस अवॉर्ड', 1995 में अमरीका का 'रॉबर्ट एफ़ कैनेडी ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड', 2007 में 'मेडल ऑफ़ इटेलियन सीनेट' और 2009 में अमरीका के 'डिफ़ेंडर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी अवॉर्ड' समेत कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड मिल चुके हैं।
सत्यार्थी के सम्मान - COMMON HEADER
1994
जर्मनी का 'द एयकनर इंटरनेशनल पीस अवॉर्ड'
1995
अमरीका का 'रॉबर्ट एफ़ कैनेडी ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड'
2007
'मेडल ऑफ़ इटेलियन सीनेट'
2009
अमरीका के 'डिफ़ेंडर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी अवॉर्ड'
सत्यार्थी को सम्मान देने वाली नोबेल समिति का कहना है कि, "ये पुरस्कार सभी बच्चों के लिए शिक्षा और बच्चों और युवाओं के दमन के खिलाफ किए गए उनके संघर्ष के लिए दिया जा रहा है। ये जरूरी है कि बच्चों का आर्थिक शोषण न हो और हर बच्चा स्कूल जरूर जाए। दुनिया भर में जितने भी गरीब देश हैं, उनकी 60 फीसदी आबादी की उम्र 25 साल से कम है। विशेष रूप से संघर्ष ग्रस्त देशों में, बच्चों की अनदेखी के कारण उनके साथ हो रही हिंसा की समस्या पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जा रही है।"
नोबेल समिति भी सत्यार्थी का लोहा मान चुकी है...जिस्म पर खादी का कुर्ता और चेहरे पर दाढ़ी लिए...बेहद सादगी से ज़िंदगी बसर करने वाला एक आम शख्स... कैसे इतने बड़े अभियान का रहनुमा बन गया।
महिलाओं के लिए अनिवार्य शिक्षा की मांग करते हुए तालिबानी गोली का शिकार हुईं... पाकिस्तान की सामाजिक कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई को शांति के लिए.. नोबेल पुरस्कार दिया गया... मलाला को पाकिस्तान में महिलाओं के लिए शिक्षा को अनिवार्य बनाए जाने की मांग के बाद... तालिबान की गोली का शिकार होना पड़ा था।
कौन हैं मलाला यूसुफजई ?
मलाला का जन्म 1997 में पाकिस्तान के स्वात जिले में हुआ.....तालिबान ने 2007 से मई 2009 तक स्वात घाटी पर कब्जा कर रखा था... इसी बीच तालिबान के खौफ से लड़कियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया था.... मलाल तब आठवीं में पढ़ती थीं और इस नन्ही उम्र में ही उनके संघर्ष शुरू हो गए। 2008 में स्वात घाटी पर कब्जे के बाद...तालिबान ने डीवीडी, डांस और ब्यूटी पार्लर पर बैन लगा दिया... इस दौरान एक ही साल में....घाटी के करीब 400 स्कूल बंद हो गए.... इसके बाद मलाल के पिता उसे पेशावर ले गए... जहां उन्होंने नेशनल प्रेस के सामने एक जोरदार भाषण दिया। उस वक्त मलाला केवल 11 साल की थीं।
मलाला पर तालिबानी हमला
2012 को तालिबानी आतंकी उस बस पर सवार हो गए जिसमें मलाला अपने साथियों के साथ स्कूल जाती थीं... आतंकियों ने मलाला पर एक गोली चलाई... जो उसके सिर में जा लगी। हमले के बाद.. गंभीर रूप से घायल मलाला को इलाज के लिए ब्रिटेन ले जाया गया. यहां उन्हें क्वीन एलिजाबेथ अस्पताल में भर्ती कराया गया... देश-विदेश में मलाला के स्वस्थ्य होने की प्रार्थना की गई और आखिरकार मलाला वहां से ठीक होकर लौटीं।
मलाला की बहादुरी पर उन्हें कई सम्मान भी मिल चुके हैं...अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार, पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार और कई बड़े सम्मान मलाला के नाम दर्ज होने लगे। 2012 में सबसे ज्यादा प्रचलित शख्सियतों में पाकिस्तान की बहादुर लड़की मलाला युसूफजई के नाम रहा। लड़कियों की शिक्षा के अधिकार की लड़ाई लड़ने वाली मलाला की बहादुरी के लिए... संयुक्त राष्ट्र ने मलाला के 16वें जन्मदिन पर..... 12 जुलाई को मलाला दिवस घोषित किया गया। 2013 में ही मलाला को यूरोपीय यूनियन का प्रतिष्ठित शैखरोव मानवाधिकार पुरस्कार भी मिला।
तालिबानी हमले में बुरी तरह ज़ख्मी होने के बाद... जब मलाला ठीक होकर लौटीं..तो उन्होंने एक ऐसी जंग की शुरूआत की...जहां उनके हर रास्ते पर खतरा ही खतरा था... उन्होंने पाकिस्तान में बच्चों की शिक्षा के लिए मजबूत कदम उठाए। पाकिस्तान में बच्चियों की शिक्षा के लिए आवाज़ उठाने की वजह से ही... मलाला पर तालिबान ने हमला किया था....लंदन में रहकर भी मलाला पाकिस्तान और दुनिया भर में बच्चों की शिक्षा के लिए आवाज़ बुलंद करती रही हैं। मलाला का सपना... दुनिया के हर बच्चे को शिक्षिक करने का है.,..वो कहती हैं कि
ये एक बहुत लंबे सफर की शुरुआत है। करीब पांच करोड़ 70 लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं, हम हर एक बच्चे को स्कूल भेजना चाहते हैं। मैं वो दिन देखना चाहती हूं जब कोई भी बच्चा स्कूल से बाहर न हो, ये एक बहुत बड़ा अभियान है। इसके लिए सबको मिलकर काम करना होगा, इस लक्ष्य को पाने के लिए ये ज़रूरी है कि दुनिया के नेता इसे पाने के लिए एक हो जाएं और इसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाएं।
मलाला ना सिर्फ एक हिम्मत वाली लड़की है...बल्कि वो खुद...आतंकवाद के लिए एक मुंहतोड़ जवाब है। जिसपर हमले होते रहे..और इन हमलों के साथ उसके इरादे और ज्यादा मजबूत होते रहे।
शांति के नोबेल विजेता सत्यार्थी और 17 साल की मलाला को नोबेल मेडल के साथ डिप्लोम...और 11 लाख डॉलर यानी करीब सात करोड़ रुपये की इनामी राशि भी दी गई...इन दोनों विजेताओं का कहना है कि ये इस इनामी राशि को साझा करेंगे। दुनिया के सबसे बड़े सम्मान को हासिल करने वाले सत्यार्थी का कहना है कि
'मैं यह पुरस्कार भारत के बच्चों को समर्पित करना चाहता हूं। मुझे उम्मीद है कि सरकार बाल श्रम खत्म करने के लिए सक्रिय होकर पहल करेगी।' -कैलाश सत्यार्थी
'मेरा इस्लाम में पूरा विश्वास है। इस्लाम शांति का संदेश देता है, लेकिन दुर्भाग्य से यहां ऐसे लोग हैं, जो इस धर्म के बारे में कुछ नहीं जानते।' - मलाला यूसुफजई
सत्यार्थी और मलाला को शांति का नोबेल पुरस्कार नार्वे की राजधानी ओस्लो में दिया गया... जबकि दूसरे क्षेत्रों से जुड़े नोबेल... स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में दिए जा रहे हैं।
अन्य विजेताओं की सूची -
पैट्रिक मोदियानो - साहित्य
शुजी नाकामूरा - भौतिकी
हिरोशी अमानो - भौतिकी
इसामु आकासाकी - भौतिकी
एडवर्ड मोजर - शरीर विज्ञान व औषधि
मे-ब्रिट मोजर - शरीर विज्ञान व औषधि
जॉन ओकीफ - शरीर विज्ञान व औषधि
विलियम एस्को मोइरनर - रसायन शास्त्र
एरिक बेत्जिग - रसायन शास्त्र
स्टीफ हेल - रसायन शास्त्र
ज्यां तिरोल - अर्थशास्त्र
अब तक कुल दस भारतीयों को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है.... जिनमें से 1902 और 1907 में... रोनाल्ड रॉस और रुडयार्ड किपलिंग को मेडिसिन और साहित्य के क्षेत्र में नोबेल मिला, जिनका जन्म भारत में हुआ था, लेकिन मूलत: वे ब्रिटिश नागरिक थे.... नॉबेल पुरस्कार जीतने वाले सबसे पहले भारतीय रवींद्र नाथ टैगोर थे, टैगौर को 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1930 में भौतिकी के क्षेत्र में सीवी रमण को, 1968 में मेडिसिन के लिए हरगोविंद खुराना को, 1979 में शांति के लिए मदर टेरेसा को, भौतिकी के क्षेत्र में 1983 में सुब्रह्मणयम चंद्रशेखर को, 1998 में आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में अमर्त्य सेन को, 2007 में शांति के लिए राजेंद्र के पचौरी को और 2009 में रसायनशास्त्र के लिए वेंकटरामन रामकृष्णन को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
नोबेल सम्मान से नवाज़े गए भारतीय -
रवींद्र नाथ टैगोर 1913 साहित्य
सीवी रमन 1930 भौतिकी
हरगोविंद खुराना 1968 मेडिसिन
मदर टेरेसा 1979 शांति
सुब्रह्मणयम चंद्रशेखर 1983 भौतिकी
अमर्त्य सेन 1998 आर्थिक विज्ञान
राजेंद्र के पचौरी 2007 शांति
वेंकटरामन रामकृष्णन 2009 रसायनशास्त्र
दुनिया के इस सबसे बड़े सम्मान को अब तक 889 लोग हासिल कर चुके हैं। जिनमें से भौतिकी के क्षेत्र में 107, रसायन के क्षेत्र में 105, मेडिसिन के क्षेत्र में 107, साहित्य के क्षेत्र में 106, शांति के लिए 94 और आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में 45 लोगों को अभी तक ये पुरस्कृत दिया जा चुका है.।
अब तक कितने नोबेल - COMMON HEADER
भौतिकी 107
रसायन 105
मेडिसिन 107
साहित्य 106
शांति 94
नोबेल पुरस्कार दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है....यह पुरस्कार स्वीडन के वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल की याद में हर साल दिया जाता है... 1901 से हर साल....अल्फ्रेड नोबेल के जन्मदिन पर... 10 दिसंबर के दिन...ये पुरस्कार दिया जाता है। पुरस्कार के तौर पर.. 18 कैरेट ग्रीन गोल्ड से बना नोबेल मेडल, नोबेल डिप्लोमा और पुरस्कार शाशि दी जाती है। उम्मीद करते हैं कि सम्मान का ये सिलसिला हमेशा जारी रहे।
अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भारत और पाकिस्तान के बीच तल्खी बढ़ी है.... लेकिन दोनों मुल्कों से अमन के दो चेहरों को बुधवार को दुनिया के सर्वोच्च सम्मान... नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया.... भारत के कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को ये पुरस्कार नार्वे की राजधानी ओस्लो में दिया गया। नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा करीब दो महीने पहले हो गई थी, लेकिन अब बारी आई इन दोनों हस्तियों को साझा सम्मान देने की....तो नोबेल पुरस्कारों के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत और पाकिस्तान के दो शांति दूत.. एक साथ जब सम्मान लेने पहुंचे...तो समारोह में मौजूद हर खास-ओ-आम की नज़र उनपर टिक गईं...हर कोई ये देखकर हैरान था कि..दोनों देशों के बीच भले ही बॉर्डर पर तनावपूर्ण माहौल हो..लेकिन लोगों के दिलों में एक दूसरे के लिए कितनी प्यार और सम्मान भरा है।
पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई भारत के कैलाश सत्यार्थी को पिता के समान बताती है, वहीं सत्यार्थी भी मलाला को अपनी बेटी मानते हैं. भारत और पाकिस्तान के इन दो चेहरों को नोबेल का साझा सम्मान....ऐसे समय में मिला है, जब दोनों देशों के बीच सत्ता से लेकर सरहद तक रिश्ते तल्ख हैं।
मलाला की ख्वाहिश थी कि पुरस्कार के वक्त भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी समारोह में मौजूद रहें....इस ख्वाहिश के पीछे यकीनन मलाला की चाहत...दोनों देशों के बीच अमन का नया रास्ता खोजने की थी, लेकिन ऐसा हो न सका।
बचपन बचाओ आंदोलन के अगुवा.. कैलाश सत्यार्थी भारत में जन्मे पहले शख्स हैं, जिन्हें शांति का नोबल पुरस्कार मिला है। 1979 में मदर टेरेसा के बाद सत्यार्थी दूसरे भारतीय हैं, जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया है। वहीं, तालिबानी हमले के बाद से सुर्खियों में रही मलाला पाकिस्तान से शांति का नोबेल पाने वाली पहली शख्सियत हैं.... यही नहीं, मलाला का नाम सबसे कम उम्र की नोबेल विजेता के रूप में भी दर्ज हो गया है।
बहरहाल, कैलाश और मलाला दोनों के लिए ये मौका बेहद अहम है.... इसलिए नहीं कि इन्हें बड़ा सम्मान मिला है... बल्कि इसलिए कि अब इसके साथ नई चुनौतियां भी जुड़ गई हैं.... हालांकि साझे सम्मान के साथ साझी मुहिम के हौसले भी बुलंद हैं, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती... दोनों देशों के बीच स्थाई रूप से अमन का रास्ता ढूंढ़ने की है।
मध्य प्रदेश के विदिशा में 11 जनवरी 1954 को पैदा हुए कैलाश सत्यार्थी.... 'बचपन बचाओ आंदोलन' चलाते हैं...उन्हें बच्चों के शोषण के ख़िलाफ़ और सभी को शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए... शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया है...पेशे से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर रहे कैलाश सत्यार्थी ने 26 साल की उम्र में ही करियर छोड़कर बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था....उन्हें बाल श्रम के ख़िलाफ़ अभियान चलाकर... हज़ारों बच्चों की ज़िंदग़ियां बचाने का श्रेय दिया जाता है....सत्यार्थी इस वक्त 'ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर' यानी बाल श्रम के ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान के अध्यक्ष भी हैं।
कैलाश सत्यार्थी के संघर्षों की कहानी किसी से छिपी नहीं है..उनकी वेबसाइट के मुताबिक़ बाल मजदूरों को छुड़ाने के दौरान.... उन पर कई बार जानलेवा हमले भी हुए हैं... 17 मार्च 2011 में दिल्ली की एक कपड़ा फ़ैक्ट्री पर छापे के दौरान...उन पर हमला किया गया.... इससे पहले 2004 में ग्रेट रोमन सर्कस से... बाल कलाकारों को छुड़ाने के दौरान उन पर हमला हुआ। ये सत्यार्थी की जिंदादिली ही थी.. कि बार-बार हमलों के बाद भी उनके इरादों पर विराम नहीं लगा। जिस हौसलों के साथ उन्होंने इस सफर की शुरुआत की थी...वो सफर आज भी बदस्तूर जारी है। बच्चों के लिए अपनी जान जोखिम में डालने वाले...कैलाश सत्यार्थी.... ना सिर्फ भारत में...बल्कि विदेशों में भी एक मिसाल के तौर पर जाने जाते हैं। उनकी तम्मना है कि वो बच्चों के शोषण के सिलसिले को जड़ से खत्म कर दें।
बाइट - कैलाश सत्यार्थी, नोबेल विजेता
नोबेल पुरस्कार से पहले उन्हें देश और दुनिया के कई बड़े सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। 1994 में जर्मनी का 'द एयकनर इंटरनेशनल पीस अवॉर्ड', 1995 में अमरीका का 'रॉबर्ट एफ़ कैनेडी ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड', 2007 में 'मेडल ऑफ़ इटेलियन सीनेट' और 2009 में अमरीका के 'डिफ़ेंडर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी अवॉर्ड' समेत कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड मिल चुके हैं।
सत्यार्थी के सम्मान - COMMON HEADER
1994
जर्मनी का 'द एयकनर इंटरनेशनल पीस अवॉर्ड'
1995
अमरीका का 'रॉबर्ट एफ़ कैनेडी ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड'
2007
'मेडल ऑफ़ इटेलियन सीनेट'
2009
अमरीका के 'डिफ़ेंडर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी अवॉर्ड'
सत्यार्थी को सम्मान देने वाली नोबेल समिति का कहना है कि, "ये पुरस्कार सभी बच्चों के लिए शिक्षा और बच्चों और युवाओं के दमन के खिलाफ किए गए उनके संघर्ष के लिए दिया जा रहा है। ये जरूरी है कि बच्चों का आर्थिक शोषण न हो और हर बच्चा स्कूल जरूर जाए। दुनिया भर में जितने भी गरीब देश हैं, उनकी 60 फीसदी आबादी की उम्र 25 साल से कम है। विशेष रूप से संघर्ष ग्रस्त देशों में, बच्चों की अनदेखी के कारण उनके साथ हो रही हिंसा की समस्या पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जा रही है।"
नोबेल समिति भी सत्यार्थी का लोहा मान चुकी है...जिस्म पर खादी का कुर्ता और चेहरे पर दाढ़ी लिए...बेहद सादगी से ज़िंदगी बसर करने वाला एक आम शख्स... कैसे इतने बड़े अभियान का रहनुमा बन गया।
महिलाओं के लिए अनिवार्य शिक्षा की मांग करते हुए तालिबानी गोली का शिकार हुईं... पाकिस्तान की सामाजिक कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई को शांति के लिए.. नोबेल पुरस्कार दिया गया... मलाला को पाकिस्तान में महिलाओं के लिए शिक्षा को अनिवार्य बनाए जाने की मांग के बाद... तालिबान की गोली का शिकार होना पड़ा था।
कौन हैं मलाला यूसुफजई ?
मलाला का जन्म 1997 में पाकिस्तान के स्वात जिले में हुआ.....तालिबान ने 2007 से मई 2009 तक स्वात घाटी पर कब्जा कर रखा था... इसी बीच तालिबान के खौफ से लड़कियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया था.... मलाल तब आठवीं में पढ़ती थीं और इस नन्ही उम्र में ही उनके संघर्ष शुरू हो गए। 2008 में स्वात घाटी पर कब्जे के बाद...तालिबान ने डीवीडी, डांस और ब्यूटी पार्लर पर बैन लगा दिया... इस दौरान एक ही साल में....घाटी के करीब 400 स्कूल बंद हो गए.... इसके बाद मलाल के पिता उसे पेशावर ले गए... जहां उन्होंने नेशनल प्रेस के सामने एक जोरदार भाषण दिया। उस वक्त मलाला केवल 11 साल की थीं।
मलाला पर तालिबानी हमला
2012 को तालिबानी आतंकी उस बस पर सवार हो गए जिसमें मलाला अपने साथियों के साथ स्कूल जाती थीं... आतंकियों ने मलाला पर एक गोली चलाई... जो उसके सिर में जा लगी। हमले के बाद.. गंभीर रूप से घायल मलाला को इलाज के लिए ब्रिटेन ले जाया गया. यहां उन्हें क्वीन एलिजाबेथ अस्पताल में भर्ती कराया गया... देश-विदेश में मलाला के स्वस्थ्य होने की प्रार्थना की गई और आखिरकार मलाला वहां से ठीक होकर लौटीं।
मलाला की बहादुरी पर उन्हें कई सम्मान भी मिल चुके हैं...अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार, पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार और कई बड़े सम्मान मलाला के नाम दर्ज होने लगे। 2012 में सबसे ज्यादा प्रचलित शख्सियतों में पाकिस्तान की बहादुर लड़की मलाला युसूफजई के नाम रहा। लड़कियों की शिक्षा के अधिकार की लड़ाई लड़ने वाली मलाला की बहादुरी के लिए... संयुक्त राष्ट्र ने मलाला के 16वें जन्मदिन पर..... 12 जुलाई को मलाला दिवस घोषित किया गया। 2013 में ही मलाला को यूरोपीय यूनियन का प्रतिष्ठित शैखरोव मानवाधिकार पुरस्कार भी मिला।
तालिबानी हमले में बुरी तरह ज़ख्मी होने के बाद... जब मलाला ठीक होकर लौटीं..तो उन्होंने एक ऐसी जंग की शुरूआत की...जहां उनके हर रास्ते पर खतरा ही खतरा था... उन्होंने पाकिस्तान में बच्चों की शिक्षा के लिए मजबूत कदम उठाए। पाकिस्तान में बच्चियों की शिक्षा के लिए आवाज़ उठाने की वजह से ही... मलाला पर तालिबान ने हमला किया था....लंदन में रहकर भी मलाला पाकिस्तान और दुनिया भर में बच्चों की शिक्षा के लिए आवाज़ बुलंद करती रही हैं। मलाला का सपना... दुनिया के हर बच्चे को शिक्षिक करने का है.,..वो कहती हैं कि
ये एक बहुत लंबे सफर की शुरुआत है। करीब पांच करोड़ 70 लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं, हम हर एक बच्चे को स्कूल भेजना चाहते हैं। मैं वो दिन देखना चाहती हूं जब कोई भी बच्चा स्कूल से बाहर न हो, ये एक बहुत बड़ा अभियान है। इसके लिए सबको मिलकर काम करना होगा, इस लक्ष्य को पाने के लिए ये ज़रूरी है कि दुनिया के नेता इसे पाने के लिए एक हो जाएं और इसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाएं।
मलाला ना सिर्फ एक हिम्मत वाली लड़की है...बल्कि वो खुद...आतंकवाद के लिए एक मुंहतोड़ जवाब है। जिसपर हमले होते रहे..और इन हमलों के साथ उसके इरादे और ज्यादा मजबूत होते रहे।
शांति के नोबेल विजेता सत्यार्थी और 17 साल की मलाला को नोबेल मेडल के साथ डिप्लोम...और 11 लाख डॉलर यानी करीब सात करोड़ रुपये की इनामी राशि भी दी गई...इन दोनों विजेताओं का कहना है कि ये इस इनामी राशि को साझा करेंगे। दुनिया के सबसे बड़े सम्मान को हासिल करने वाले सत्यार्थी का कहना है कि
'मैं यह पुरस्कार भारत के बच्चों को समर्पित करना चाहता हूं। मुझे उम्मीद है कि सरकार बाल श्रम खत्म करने के लिए सक्रिय होकर पहल करेगी।' -कैलाश सत्यार्थी
'मेरा इस्लाम में पूरा विश्वास है। इस्लाम शांति का संदेश देता है, लेकिन दुर्भाग्य से यहां ऐसे लोग हैं, जो इस धर्म के बारे में कुछ नहीं जानते।' - मलाला यूसुफजई
सत्यार्थी और मलाला को शांति का नोबेल पुरस्कार नार्वे की राजधानी ओस्लो में दिया गया... जबकि दूसरे क्षेत्रों से जुड़े नोबेल... स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में दिए जा रहे हैं।
अन्य विजेताओं की सूची -
पैट्रिक मोदियानो - साहित्य
शुजी नाकामूरा - भौतिकी
हिरोशी अमानो - भौतिकी
इसामु आकासाकी - भौतिकी
एडवर्ड मोजर - शरीर विज्ञान व औषधि
मे-ब्रिट मोजर - शरीर विज्ञान व औषधि
जॉन ओकीफ - शरीर विज्ञान व औषधि
विलियम एस्को मोइरनर - रसायन शास्त्र
एरिक बेत्जिग - रसायन शास्त्र
स्टीफ हेल - रसायन शास्त्र
ज्यां तिरोल - अर्थशास्त्र
अब तक कुल दस भारतीयों को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है.... जिनमें से 1902 और 1907 में... रोनाल्ड रॉस और रुडयार्ड किपलिंग को मेडिसिन और साहित्य के क्षेत्र में नोबेल मिला, जिनका जन्म भारत में हुआ था, लेकिन मूलत: वे ब्रिटिश नागरिक थे.... नॉबेल पुरस्कार जीतने वाले सबसे पहले भारतीय रवींद्र नाथ टैगोर थे, टैगौर को 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1930 में भौतिकी के क्षेत्र में सीवी रमण को, 1968 में मेडिसिन के लिए हरगोविंद खुराना को, 1979 में शांति के लिए मदर टेरेसा को, भौतिकी के क्षेत्र में 1983 में सुब्रह्मणयम चंद्रशेखर को, 1998 में आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में अमर्त्य सेन को, 2007 में शांति के लिए राजेंद्र के पचौरी को और 2009 में रसायनशास्त्र के लिए वेंकटरामन रामकृष्णन को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
नोबेल सम्मान से नवाज़े गए भारतीय -
रवींद्र नाथ टैगोर 1913 साहित्य
सीवी रमन 1930 भौतिकी
हरगोविंद खुराना 1968 मेडिसिन
मदर टेरेसा 1979 शांति
सुब्रह्मणयम चंद्रशेखर 1983 भौतिकी
अमर्त्य सेन 1998 आर्थिक विज्ञान
राजेंद्र के पचौरी 2007 शांति
वेंकटरामन रामकृष्णन 2009 रसायनशास्त्र
दुनिया के इस सबसे बड़े सम्मान को अब तक 889 लोग हासिल कर चुके हैं। जिनमें से भौतिकी के क्षेत्र में 107, रसायन के क्षेत्र में 105, मेडिसिन के क्षेत्र में 107, साहित्य के क्षेत्र में 106, शांति के लिए 94 और आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में 45 लोगों को अभी तक ये पुरस्कृत दिया जा चुका है.।
अब तक कितने नोबेल - COMMON HEADER
भौतिकी 107
रसायन 105
मेडिसिन 107
साहित्य 106
शांति 94
आर्थिक विज्ञान 45
नोबेल पुरस्कार दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है....यह पुरस्कार स्वीडन के वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल की याद में हर साल दिया जाता है... 1901 से हर साल....अल्फ्रेड नोबेल के जन्मदिन पर... 10 दिसंबर के दिन...ये पुरस्कार दिया जाता है। पुरस्कार के तौर पर.. 18 कैरेट ग्रीन गोल्ड से बना नोबेल मेडल, नोबेल डिप्लोमा और पुरस्कार शाशि दी जाती है। उम्मीद करते हैं कि सम्मान का ये सिलसिला हमेशा जारी रहे।
Thursday, 4 September 2014
शिक्षक दिवस क्यों हैं खास
एक और दिन की तरह है आज का दिन। आज भी वो ही सब कुछ हो रहा है जो रोज होता है। लेकिन शिक्षण संस्थाओं जिनके पास देश के भविष्य को तैयार करने का एक प्रकार से ठेका है। वहाँ का माहौल कुछ बदला हुआ दिखाई पडा। केन्द्र और राज्य सरकारों के अलावा छोटे मोटे समारोह और आयोजित किये गये । प्रत्येक विधालय में भी एक औपचारिक आयोजन किया गया। आयोजन है देश के प्रथम उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति के जन्म दिन को मनाने की । डां सर्वपल्ली राधाकृष्णन जो मूलत शिक्षक के पेशे से थे और वो देश के सर्वोच्च पद तक पहुँच गये। जब उनके जन्म दिन को मनाने की बात आई तो उन्होंने खुद ही आगे बढकर कहा कि यदि मनाना ही चाहते हो तो इसे‘‘शिक्षक दिवस’’ के रूप में मनाया जा सकता है। तब से इस दिन 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है।
चारों और उपरी तौर पर शिक्षकों में भी इस दिन खुशी का माहौल दिखाई पडता है। इस दिन बच्चे डां राधाकृष्णन के जीवन चरित्र,कृतित्व और व्यक्तित्व की चर्चा अपने शिक्षकों के समक्ष करते है। बदले में शिक्षक भी बच्चों से कहते है कि उस समय किस प्रकार छात्र अध्यापकों का सम्मान किया करते थे जो अब के बच्चों में दिखाई नहीं देता है। ऐसे उदवोधनों से भरे उवाउ आयोजनों में कोई किसी को कितना सुन पाता हे इसे किसी आयोजन में बैठकर ही महसूस किया जा सकता है। बच्चों की जल्दी छुटटी कर दी जाती है जिसकी खुशी उनके चमकते दमकते चेहरों पर बिखरी हॅसी को देखकर महसूस की जा सकती है। शिक्षक भी जल्दी मुक्त होने का फायदा उठाकर अपने दूसरे कामों में लग जाते है। किसी को अपनी एलआईसी के टारगेट को पूरा करना है तो किसी को ऐमवे कम्पनी के माल को बेचने जाना होता है।
ऐसे में अगर परेशान होना है तो उस आत्मा को जिसने ऐसे आयोजन करने की परम्परा विकसित की थी। क्या सोच कर की होगी ये तो नही कहा जा सकता है लेकिन इतना जरूर अनुमान लगा सकते है कि उस सोच में कहीं न कहीं शिक्षक और उसके पेशे की भलाई जरूर ही निहित रही होगी। लेकिन माहौल को देखकर ऐसा लगता है कि अब वो सोच पुरानी पड गई है आधुनिक जमाने की नई उभरी सोच के अनुसार दिवसों का आयोजन फालतू की औपचारिकता बन के रह गया है। आश्चर्य तो तब होता है जब आजादी के दिन को मनाने को लेकर भी कुछ ऐसा ही माहौल दिखाई देता है। मनाकर याद करने से अच्छा है इन दिनों छुटटी कर दी जाये जिससे आदमी अपने कामों को तो करले।
शिक्षक दिवस के दिन सामान्य दिनों से कही अधिक शिक्षकों की आलोचनों और उनके कार्यो की समीक्षा होती हैं। हर आयोजन का वक्ता उसे कुछ न कुछ करने की सलाह देता है। यदि कोई है जो न तो जबाब देता है न प्रतिकार करता है और न ही कभी अकेले और समूह में बैठकर चिंतन करता है तो वो भी शिक्षक ही है। जो मानता है कि अब वो सरकारी आदमी है चाहे जैसा भी है कोई नही है जो उससे उसकी नौकरी छीन सकता है । उसे पता है अधिक से अधिक बच्चों के अभिभावक स्कूल की तालाबंदी करके अधिकारियों के उपर उसके स्थानांतरण का दबाब बनायेगे। तब भी वो वहाँ भी शिक्षक के रूप में ही जाना जायेगा। नारेबाजी से उसके उपर कोई फर्क नहीं पडता,क्योंकि जिन नेताओं को जनता काले झण्डे दिखाती है उन्हें उतनी ही मीडिया कवरेज अधिक मिलती है। इसलिए ऐसे कामों से क्या तो डरना और क्या इनसे भागना ये उसने सोच रखा है।
चलो वो नहीं सोचता तो क्या हुआ हम ही सोच लेते है उसके लिए। आखिर क्या कारण है कि समाज की उभरती व्यवथाओं में अकेले शिक्षक का ही नहीं शिक्षा का भी सम्मान कम हुआ है और दिनों दिन होता जा रहा रहा है। ‘‘ शिक्षा की इस कार्य योजना की विफलता में कहीं न कहीं वो वर्ग जिम्मेदार है जिसके शिक्षा और समाज की यथास्थिति में अपने निहित स्वार्थ है। इस शक्तिशाली वर्ग को हमेशा ये भय सताता रहता है कि शिक्षा और समाज में किसी बडे परिवर्तन से उसके अनुचित विशेषाधिकार उससे दूर हो जायेगें, शिक्षित होने वालों के द्वारा उससे छीन लिये जायेगें। समाज भी अपने पुरानपंथी स्वार्थो और परम्पराओं से चिपके रहने के कारण किन्ही भी बडे परिवर्तनों के प्रति उदासीन बना रहा है। जो एक बहुत बडे कारण के रूप में सामने आता है।
एक बहुत बडा सच ये माना जा सकता है कि हमारी मौजूदा सामाजिक संरचना से कोई भी शिक्षक अप्रभावित नही रह सकता है। छात्रों के साथ कक्षा में अंतक्रिया करते समय वह हर समय ये परखता रहता है कि उसे समाज के द्वारा किस रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में निरपेक्ष दृष्टि से देखा जाये जो तो एक सच सामने आता है कि विधार्थी अधिकतर शिक्षकों को एक असफलता के प्रतीक के रूप में देखतें हैं। इसका कारण समाज का उन्हें ये बताना है कि मास्टर जी एक ऐसे काम में लगे है जिससे न ‘‘पैसा मिलता है और न शक्ति’’। कोई भी स्वेच्छा से इस काम को नहीं चुनता । वह मजबूर इस काम करता है। क्योंकि इससे बेहतर काम पाने में वह असफल रहता है। वह अपनी कक्षा में एक भी विधार्थी ऐसा नहीं पाता जो शिक्षक बनना चाहता हो। छात्रों की यह अनिच्छा उसे यह अहसास कराती रहती है कि वे शिक्षण व्यवसाय को उचित सम्मान नहीं देते हैं।
यही समाज से मिली मनोवृति अधिकतर शिक्षकों के आत्मविश्वास को क्षति पहुँचाती है। शिक्षक की अधिकतर क्रियाओं का केन्द्र छात्रों की दुनिया ही रहती है। उन्ही को वह प्राय संवोधित करता रहता है और जब वह उनकी आँखों में समाज प्रेरित अपने पेशे के प्रति घोर अपेक्षा का भाव देखता है तो उसका सारा का सारा उत्साह मर जाता है। दूसरे शब्दों में इस बात को ऐसे भी कहा जा सकता है कि समाज प्रतिदिन लोगों के सामने तरह तरह से यह बात रखता रहता है कि उसे जितनी अपने विकास के लिए इंजीनियर,प्रवंधकों, वैज्ञानिको या अर्थशास्त्रियों की जरूरत है उतनी संस्कृतकर्मी,साहित्यकार और शिक्षकों की नहीं है।
ऐसे में ये सोचना जरूरी हो जाता है कि शिक्षक की आलोचना करने वाला समाज क्या वास्तव में आलोचना का अधिकारी है। या फिर उसे लगता है कि उसके बिगडते बच्चों के लिए कहीं का कहीं शिक्षक दोषी है। इसलिए वह अपना दोष शिक्षक के सिर मढकर अपनी भडास निकालता रहता है। समाज को समग्रता के साथ शिक्षा और शिक्षक के बारे में सकारात्मक चिंतन करना ही होगा। अन्यथा आप आलोचना करते रहेगें और शिक्षक उदासीन बनते चले जायेगें। गलियों के चैराहों और सभी तरह की महफिलों में किये जाने वाले शिक्षकों के छिद्रांवेषण से बाहर निकल कर एक सही माहौल बनाने की जरूरत है जिसमें शिक्षकों को भी लगे कि उनके काम का समाज में सम्मान ही नहीं लोग अपनाने को उत्सुक है तो वह कहीं और अधिक अपनी क्षमताओं के साथ काम करना आरम्भ कर देगा।
Monday, 1 September 2014
सौ दिन का मोदी पंचायत
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मोदी सरकार ने शपथ ग्रहण के बाद सबसे पहले विदेशों में भारतीयों के जमा कालेधन को वापस लाने के लिए एसआईटी का गठन किया। लेकिन कालाधन कब देश में वापस आएगा यह स्पष्ट नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश के सभी गांवों को 24 घंटे बिजली की सप्लाई का वादा किया है। सरकार बिजली संकट को खत्म करने के लिए ज्योति ग्राम योजना पर काम कर रही है।
सरकार ने 2022 तक सबको मकान मुहैया कराने का सपना दिखाया है। सरकार टाउन प्लानिंग में तकनीक का भरपूर इस्तेमाल करना चाहती है ताकि शहरों को भविष्य की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया जा सके। लेकिन इस मामले में अब तक शहरी विकास मंत्रालय की कुछ बैठकें हुई हैं।
भाजपा ने गांवों में सड़क, पीने का पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, ब्रॉडबैंड, नौकरी, बाजार से गांव को जोड़ने और सुरक्षा मुहैया कराने जैसे वादे किए थे। केंद्र की एनडीए सरकार ने अब तक के कार्यकाल में ग्रामीण इलाकों को ब्रॉडबैंड से जोड़ने और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे साफ-सफाई पर कुछ ध्यान दिया है। ज्यादातर अन्य मुद्दों पर अब तक न तो कोई ठोस नीति बनी है और न ही कोई बड़ा कदम उठाया गया है। देश के कई गांवों में अब भी बिजली नहीं पहुंची है। आबादी के लिए लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 10000 से ज्यादा गांवों में आज भी बिजली नहीं है।
सरकार 2 अक्टूबर से 'स्वच्छ भारत अभियान' शुरू करने जा रही है। इसके तहत अगले एक साल में देश के सभी स्कूलों में शौचालय बनवाने और साफ-सफाई का लक्ष्य रखा गया है। इस मामले में कुछ प्राइवेट कंपनियां केंद्र की मदद के लिए आगे आई हैं। हालांकि, मोदी सरकार के पहले तीन महीनों में इस ओर कोई ठोस काम जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है।
मोदी सरकार चाहती है कि ऐसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम का विकास किया जाए, जो निजी गाड़ियों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित न करे। इस दिशा में देश के कुछ शहरों में मेट्रो का निर्माण किया जा रहा है। सरकार मेट्रो के विकास के लिए कुछ शहरों को फंड भी मुहैया करा रही है। दिल्ली में दो इंटीग्रेटेड पब्लिक ट्रांसपोर्ट हब का भी निर्माण किए जाने की घोषणा की गई है। हालांकि, इस मामले में नतीजे देखने के लिए कुछ इंतजार करना पड़ेगा।
मोदी ने डिजिटल इंडिया कैंपेन को जोरशोर से शुरू किया है। इसके तहत सरकार भारत को विनिर्माण हब बनाना चाहती है। सरकार ने देश में तकनीक समानों का आयात कम करने के लिए देश में उत्पादन बढ़ाने का सपना दिखाया है। आईटी के जरिए देश के सभी ग्राम पंचायतों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश हो रही है। सरकार का यह भी मानना है कि डिजिटल इंडिया अभियान से नौजवानों को रोजगार भी मिलेगा। डिजिटल इंडिया कैंपेन को लेकर सरकार ने कुछ फैसले लिए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी हाई-स्पीड इंटरनेट सुविधा की घोषणा की। इसके साथ ही डिजिटल इंडिया प्लेटफॉर्म के जरिए शिक्षा और टेलिमेडिसिन सुविधाएं भी दी जाएंगी। इस सुविधा का इस्तेमाल गरीब अपना बैंक अकाउंट ऑपरेट करने के लिए भी कर सकते हैं।
मोदी सरकार ने देश भर में 100 स्मार्ट सिटी बनाने का फैसला किया है। सरकार ने ऐसे शहरों में आधुनिक तकनीक और आधुनिक बुनियादी ढांचे का विकास कर ऐसे इलाके का सपना बुना है, जहां रोजगार, आवास, पर्यावरण और जीवन से जुड़ी सुविधाएं व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध हों। सरकार ने 100 स्मार्ट सिटीज की स्थापना के लिए बजट में 7060 करोड़ रुपए के फंड का एलान किया है।
मोदी सरकार ने जन धन योजना की शुरुआत ही। इसके तहत हर गरीब परिवार के लिए एक बैंक अकाउंट खोलने, 5000 रुपए की ओवरड्राफ्ट की सुविधा और एक लाख रुपए का बीमा कवर दिया गया है।
एनडीए सरकार ने रक्षा और रेलवे में विदेशी निवेश को 49 प्रतिशत तक बढ़ा दिया। बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घोषणा की थी कि रेलवे के कुछ परियोजनाओं के लिए 100 फीसदी तक विदेशी निवेश को इजाजत दी जाएगी जबकि रक्षा क्षेत्र में 49 प्रतिशत विदेशी निवेश का स्वागत किया था।
मोदी ने कहा कि देश को योजना आयोग जैसी संस्था की जरूरत नहीं है। देश के लिए पांच वर्षीय योजना बनाने वाला योजना आयोग प्लान और फंड बांटने के लिए केंद्र सरकार और राज्यों पर निर्भर रहता था। मोदी सरकार ने अपने पहले ही बजट में बुलेट ट्रेन की घोषणा की। हाई-स्पीड टेन मुंबई-अमदाबाद के बीच शुरू की जाएगी। इसके अलावा मेट्रो शहरों में हाई-सीपड ट्रेन नेटवर्क बिछाया जाएगा।
नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सरकार को सबसे ज्यादा महंगाई को लेकर घेरा और अपने चुनाव प्रचार के दौरान जनता को महंगाई से राहत दिलाने का वादा किया था, इतना ही नहीं भाजपा अपने घोषणा पत्र में महंगाई के मुद्दे को सबसे ऊपर रखा लेकिन सरकार बनने के बाद महंगाई रोकने में मोदी सरकार विफल साबित हो रही है। इससे अलावे महिला सुरक्षा और रोजगार इस सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
सबसे ज्यादा महंगाई सब्जियों में दहाई अंक में बढ़ी 8.8% महंगाई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) की दर जनवरी 2014 में थी। जो जून तक नीचे आई, लेकिन जुलाई में तेजी से बढ़कर यह 7.5 से 7.96% पहुंच गई। अर्थव्यवस्था के एक्सपर्ट का कहना है कि देश में महंगाई अनाज की कमी से नहीं है बल्कि यह वायदा सौदों और भंडारण की अपर्याप्त व्यवस्था की वजह से है। जिसके चलते अनाज और खाने-पीने के सामानों की कीमत में भारी उतार चढ़ाव होता है।
वैसे तो किसी भी सरकार के कामों का मूल्यांकन करने के लिए 100 दिन नाकाफी है। लेकिन जनता को फौरी राहत पहुंचाने के लिए एक दिन भी काफी है। क्योंकि जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार को वह सारे फैसले लेने के अधिकार होते हैं जो जनहित के हों। इसलिए मोदी सरकार को बुलेट ट्रेन चलाने से पहले पैसेंजर ट्रेन को दुरूस्त करना चाहिए। देश के प्रत्येक नागरिक को दो वक्त की रोटी नसीब हो उस पर काम करना चाहिए। सबको मुफ्त बेहतर चिकित्सा का समान अवसर मिले इस पर तुरंत काम करना चाहिए। लेकिन मोदी सरकार ने फौरी राहत पर न ध्यान देते हुए बड़े फैसले लिए, जो हकीकत में कब तब्दील होगा यह वक्त ही बताएगा।
Friday, 29 August 2014
हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान पर मचा सियाशी घमाशान
कभी सोने का चिड़ियां कहा जाने वाला भारत देश आज राजनीतिक का शिकार हो गया हैं।
मोदी सरकार में अल्पसंख्यक मंत्री नजमा हेपतुल्लाह के उस बयान पर बवाल मच गया जिसमें
उन्होंने कहा था कि यदि हिन्दुस्तान में रहने वाले लोगों को हिन्दू कहा जाए तो इसमें
दिक्कत क्या है। हालांकि नजमा अब अपने बयान से पलट गई है।
एक अखबार को दिए इंटरव्यू में नजमा ने कहा कि हिंदुस्तान में रहने वाले लोगों के लिए हिन्दू शब्द एक राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है और किसी को इतिहास नहीं भूलना चाहिए। नजमा ने ये तर्क दिया कि अरब देशों में भी भारत को अल हिंद कहा जाता है। नजमा ने यह बयान आरएसएस के सर संघ चालक मोहन भागवत के 17 अगस्त को दिए उस बयान की पृष्टिभूमि में दिया था जिसमें कहा गया था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और यहां रहने वाले सभी लोग हिन्दू हैं। भागवत ने कहा था कि राष्ट्र की पहचान हिंदुत्व से है। हिंदुस्तान में रहने वाले सभी लोगों हिन्दू है।
नजमा हेपतुल्ला ने नजमा ने अपनी टिप्पणियों पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उन्होंने सभी भारतीयों को हिंदी कहा था जो कि भारत में रहने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला अरबी शब्द है। और जो उन्होंने कहा था वह धर्म के संबंध में नहीं था बल्कि राष्ट्रीयता के रूप में एक पहचान के संबंध में था। नजमा ने कहा कि उन्होंने उनको हिंदू नहीं कहा था।
सभी भारतीयों के लिए पहचान की समरूपता होने की जरूरत का संकेत देते हुए नजमा ने कहा कि वह नहीं समझती कि कोई ऐसा देश है जहां तीन विभिन्न भाषाओं में तीन नाम हों। उन्होंने कहा, अरबी में भारतीय हिंदी और हिंदुस्तानी कहे जाते हैं तथा फारसी और अंग्रेजी में इंडियन कहे जाते हैं।
नजमा की दलील है कि अरब देशों में भी भारत को अल हिंद कहा जाता है। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति ने उनसे इंटरव्यू किया, उसने हिन्दी को हिन्दू समझ लिया होगा।
दूसरी तरफ कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा, 'नजमाजी अगर भारत का संविधान पढ़ लें तो बेहतर रहेगा। भारतीय संविधान के हिसाब से हर नागरिक भारतीय है, हिंदू नहीं।'
राकांपा नेता तारीक अनवर ने नजमा की आलोचना करते हुए उनकी टिप्पणियों को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।
नजमा पर कटाक्ष करते हुए तारिक अनवर ने कहा कि यदि उन्होंने ऐसा बयान दिया है तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मुझे लगता है कि उन्होंने अपना मंत्री पद सुरक्षित रखने के लिए यह बयान दिया है। वह कहती हैं कि वह मौलाना आजाद के परिवार से हैं। ऐसा लगता है कि सत्ता में बने रहने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती हैं।
भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि उनके स्पष्टीकरण के बाद यह अध्याय समाप्त हो जाना चाहिए। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, ‘‘ मेरा मानना है कि नजमाजी की बात का मतलब भारत की सांस्कृतिक एकता से था और इन मामलों को राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। विविधता में एकता देश के मूल्यों में हैं और हम सभी को इसमें विश्वास करना चाहिए।
गौरतलब है कि 11 अगस्त को सरसंघचालक मोहन बागवत ने कहा था कि जब जर्मन के लोगों को जर्मनी, रूस के लगों को रशियन कहा जाता है तो हिन्दूस्तान के सभी लोगों को हिन्दू कहा जाना चाहिए।
एक अखबार को दिए इंटरव्यू में नजमा ने कहा कि हिंदुस्तान में रहने वाले लोगों के लिए हिन्दू शब्द एक राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है और किसी को इतिहास नहीं भूलना चाहिए। नजमा ने ये तर्क दिया कि अरब देशों में भी भारत को अल हिंद कहा जाता है। नजमा ने यह बयान आरएसएस के सर संघ चालक मोहन भागवत के 17 अगस्त को दिए उस बयान की पृष्टिभूमि में दिया था जिसमें कहा गया था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और यहां रहने वाले सभी लोग हिन्दू हैं। भागवत ने कहा था कि राष्ट्र की पहचान हिंदुत्व से है। हिंदुस्तान में रहने वाले सभी लोगों हिन्दू है।
नजमा हेपतुल्ला ने नजमा ने अपनी टिप्पणियों पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उन्होंने सभी भारतीयों को हिंदी कहा था जो कि भारत में रहने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला अरबी शब्द है। और जो उन्होंने कहा था वह धर्म के संबंध में नहीं था बल्कि राष्ट्रीयता के रूप में एक पहचान के संबंध में था। नजमा ने कहा कि उन्होंने उनको हिंदू नहीं कहा था।
सभी भारतीयों के लिए पहचान की समरूपता होने की जरूरत का संकेत देते हुए नजमा ने कहा कि वह नहीं समझती कि कोई ऐसा देश है जहां तीन विभिन्न भाषाओं में तीन नाम हों। उन्होंने कहा, अरबी में भारतीय हिंदी और हिंदुस्तानी कहे जाते हैं तथा फारसी और अंग्रेजी में इंडियन कहे जाते हैं।
नजमा की दलील है कि अरब देशों में भी भारत को अल हिंद कहा जाता है। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति ने उनसे इंटरव्यू किया, उसने हिन्दी को हिन्दू समझ लिया होगा।
दूसरी तरफ कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा, 'नजमाजी अगर भारत का संविधान पढ़ लें तो बेहतर रहेगा। भारतीय संविधान के हिसाब से हर नागरिक भारतीय है, हिंदू नहीं।'
राकांपा नेता तारीक अनवर ने नजमा की आलोचना करते हुए उनकी टिप्पणियों को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।
नजमा पर कटाक्ष करते हुए तारिक अनवर ने कहा कि यदि उन्होंने ऐसा बयान दिया है तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मुझे लगता है कि उन्होंने अपना मंत्री पद सुरक्षित रखने के लिए यह बयान दिया है। वह कहती हैं कि वह मौलाना आजाद के परिवार से हैं। ऐसा लगता है कि सत्ता में बने रहने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती हैं।
भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि उनके स्पष्टीकरण के बाद यह अध्याय समाप्त हो जाना चाहिए। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, ‘‘ मेरा मानना है कि नजमाजी की बात का मतलब भारत की सांस्कृतिक एकता से था और इन मामलों को राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। विविधता में एकता देश के मूल्यों में हैं और हम सभी को इसमें विश्वास करना चाहिए।
गौरतलब है कि 11 अगस्त को सरसंघचालक मोहन बागवत ने कहा था कि जब जर्मन के लोगों को जर्मनी, रूस के लगों को रशियन कहा जाता है तो हिन्दूस्तान के सभी लोगों को हिन्दू कहा जाना चाहिए।
Thursday, 28 August 2014
खामोश सफ़र!!!!!!: सपने सुहाने जनधन के
खामोश सफ़र!!!!!!: सपने सुहाने जनधन के: देश में शुरू हुई सबसे बड़ी योजना की खास कवरेज... जी हां हम बात कर रहे हैं... जमधन नाम से शुरू हुई....प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सबसे ...
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