स्मृति इरानी की लोकसभा में दी गयी स्पीच शानदार थी! उसमें एक्टिंग थी, इमोशन
था, ड्रामा था! ऑडियो-वीडियो का जोरदार कॉकटेल भी था जो किसी
फ़िल्म को हिट बनाता. स्मृति की ख़ूब चर्चा है. उन पर वाह-वाही भी लुटायी गयी है.
ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उसमें ‘सत्यमेव जयते’दिखायी
दिया. किसी नेता के लिए अपने नेता से शाबाशी मिलने से बड़ी दाद और क्या हो सकती
है! मोदी की तारीफ़ के बाद तो ‘प्रशंसकों’ ने
प्रचार किया कि शेरनी के आगे सारे विपक्षी सांसद चूहे जैसे डर गये. लेकिन स्मृति
ईरानी पर अभिनय के आवेग में संसद में तरह-तरह की ग़लतबयानी करने का बातें भी सामने
आयीं. ये चिन्ता भी है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि देश की शिक्षा मंत्री, झूठ
के किसी दलदल में जा फँसी हों!
संसद में स्मृति ईरानी का बयान, ‘तेलंगाना पुलिस की रिपोर्ट है-
वेमुला को बचाने की एक भी कोशिश नहीं हुई. डॉक्टर के पास ले जाने की बजाय उसके
शरीर को छिपाया गया. उसके शरीर को राजनीतिक हथियार की तरह यूज किया गया. अगले दिन
सुबह 6.30 बजे तक पुलिस को वहां जाने की इजाजत नहीं दी गई.’
अब कितना सच.. ये जानें हैदराबाद युनिवर्सिटी की डॉक्टर एमराजश्री की जुबानी, ‘उसको
देखने और मेडिकल जांच के बाद मैंने वहां मौजूद सिक्योरिटी ऑफिसर को बताया कि रोहित
मर चुका है. 15.20 मिनट बाद पुलिस वहां पहुंची. पुलिस ने मुझसे पूछा तो मैंने बताया- कि मेडिकल निरीक्षक के
बाद मैं इसे मृत घोषित करती हूं. पुलिस ने मुझसे कुछ देर वहां पर रूकने के लिए कहा
क्योंकि जांच में उनको मेरी जरूरत पड़ती. मैं करीब 40 मिनट तक वहां रूकी. जांच के
बाद पुलिस ने मुझसे पूछा कि क्या आप बता सकती हैं कि रोहित ने कब जान दी होगी.
मैंने उनको बताया कि मिनिमम दो घंटे. जब पुलिस को बॉडी हैंड ओवर की गई उस समय भी
मैं वहां मौजूद थी.’
अब ऐसा कैसे हो गया कि मेडिकल जांच के बावजूद पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में ये
पूरी बात छिपा गई? क्या स्क्रिप्ट राइटर की ग़लती थी? डॉक्टर
की मौज़ूदगी के ग़लत तथ्य मंत्री जी को क्यों दिये गये? पुलिस
रिपोर्ट में गड़बड़ी क्यों हुई? क्या इस चूक की जाँच होगी और
उसके नतीज़ों को भी ज़ाहिर किया जाएगा?
अब ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि ऐसा कैसे हो गया कि मेडिकल जांच के बावजूद
पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में ये पूरी बात छिपा गई? क्या स्क्रिप्ट राइटर की ग़लती
थी? डॉक्टर की मौज़ूदगी के ग़लत तथ्य मंत्री जी को क्यों दिये
गये? पुलिस रिपोर्ट में गड़बड़ी क्यों हुई? क्या
इस चूक की जाँच होगी और उसके नतीज़ों को भी ज़ाहिर किया जाएगा?
अपनी स्पीच में स्मृति ईरानी ने कई बार ये साबित करने की कोशिश की कि
केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में हुई तमाम सीधी-टेढ़ी नियुक्तियाँ यूपीए सरकार ने
कीं. लिहाज़ा, उन्हें उन लोगों के कसूर के लिए कैसे ज़िम्मेदार ठहराया जा
सकता है, जिनकी तैनाती उन्होंने की ही नहीं?स्मृति
ने सरकार चलाने के लिए इस बेहद विचित्र सिद्धान्त का प्रतिपादन कर दिया है! ये
उनकी अभिनय क्षमता का चरम है. वाह, क्या बात है! आप देश की एचआरडी
मिनस्टर हैं. आपके जवाब से कोई सन्तुष्ट हो या न हो, लेकिन उसमें भावुकता इतनी होनी
ही चाहिए कि शो हिट हो जाए.
संसद में सियासत नहीं करने की नसीहत और सियासत की गोटी आप पश्चिम बंगाल में
सेट कर रही हैं.. छोड़िए ये तो आपका पेशा’ है’, गंदा
है पर धंधा है.. चालू रखिए.. मुझे दिक्कत नहीं है. मुद्दे की बात पर आइए.
अब दूसरी सियासी चाल की खुली पोल
अपने ‘शो’ को हिट करने के लिए स्मृति ईरानी ने 2013
में आयोजित हुए ‘महिषासुर दिवस’ का भी उल्लेख किया. उन्होंने
माफ़ीनामे के साथ पढ़ा कि “ईश्वर मुझे माफ़ करें इस बात को पढ़ने के लिए. क्योंकि
महिषासुर दिवस मनाने वालों ने लिखा है कि दुर्गा पूजा सबसे ज़्यादा विवादास्पद और
नस्लवादी त्योहार है. जहाँ प्रतिमा में ख़ूबसूरत दुर्गा मां को काले रंग के
स्थानीय निवासी महिषासुर को मारते हुए दिखाया जाता है. महिषासुर एक बहादुर, स्वाभिमानी
नेता था, जिसे आर्यों द्वारा शादी के झाँसे में फँसाया गया. इसके लिए
जिस सेक्स वर्कर का सहारा लिया गया, उसका नाम दुर्गा था. दुर्गा ने
महिषासुर को शादी के लिए आकर्षित किया और 9 दिनों तक उसके साथ सुहागरात
मनाने के बाद उसकी हत्या कर दी.”
एक अभिनेत्री की तरह प्रचण्ड क्रोध से तमतमाते हुए स्मृति ने सवाल किया कि
क्या यही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? कौन मुझसे इस पर कोलकाता की
सड़कों पर बहस करना चाहेगा? तो अब बोलिए .. चुप मत रहिएगा.. जरा अगल-बगल झांक लीजिए ..
आपकी फिर पोल खुल गयी जब हमें ये सामने लाना पड़ा कि जेएनयू में 2013
में हुए महिषासुर दिवस वाले कार्यक्रम में बीजेपी सांसद उदित राज ने भी बतौर
वक़्ता हिस्सा लिया था. इस पर उदित राज ने सफ़ाई भी दी कि ‘मैं
इसलिए शामिल हुआ क्योंकि जाति के आधार पर भेदभाव करना ग़लत है. मैं जेएनयू का
छात्र रह चुका हूँ. मैं कई अन्य सेमिनार में भी हिस्सा ले चुका हूँ.’ इतना
तक तो चलता.. उन्होंने ये भी कहा कि महिषासुर दलितों का हीरो है. अब बताइए…भला
आप कुछ और बगल वाला कुछ और…
स्मृति की स्पीच ने सबसे ज़्यादा भाव-विभोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को
किया. मोदी ने भाषण को सोशल मीडिया पर ‘सत्यमेव जयते’ लिखकर
शेयर किया. ये अपने आप में अद्भुत बात थी क्योंकि प्रधानमंत्री को न तो पटियाला
हाउस कोर्ट में वकीलों की गुंडागर्दी पर शब्द सूझे थे और न ही पत्रकारों से हुई
मारपीट पर. जेएऩयू पर बवाल पर वो कुछ नहीं लिख पाये थे. लेकिन अब उन्हें ‘जीत
सच की ही होती है’ यानी ‘सत्यमेव जयते’ का
अहसास हुआ है. साफ़ है कि पीएम का सन्देश है कि स्मृति के संस्मरण ही ‘अन्तिम
सत्य’ है. लेकिन क्या प्रधानमंत्री उन ग़लतबयानियों के लिए भी
शिक्षा मंत्री के साथ अपनी ज़िम्मेदारियों को साझा करेंगे जिसने नयी बहस को छेड़
दिया है. या फिर वो पहले की तरह लम्बी चुप्पी तान लेंगे. वैसे स्मृति की तरह मोदी
ने भी वाराणसी में रोहित वेमुला की आत्महत्या पर भावुकतापूर्ण प्रतिक्रिया दी थी.
मालूम नहीं वे आँसू असली थे या स्क्रिप्टेड!
चलिए बाकि तो सब ठीक है.. आप मजे में रहिए.. कलाकारी और सियासत में समीकरण
दोनों सी फिलहाल आपका फिट है.. बस जरा ध्यान रखिएगा.. झुठ केवल सड़क पर बोलिए..
संसद की गरिमा का ख्याल रखिए.. मुझे कहना तो नहीं चाहिए था. क्योंकि आप मंत्री जी
हैं.. और मैं अदना.. फिर भी लगा कि कह दूं तो कह दिया बाकी आपका मुंह और …..!

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