Friday, 19 February 2016

आरक्षण के लिए जंग

आरक्षण के नाम पर की जाने वाली जोर-जबरदस्ती की राजनीति और ऐसी राजनीति के वक्त शासन-प्रशासन की थोड़ी सी भी चूक कैसे दुष्परिणाम सामने लाती है, इसका ही परिचय दे रहे हैं हरियाणा के मौजूदा हालात। जाट आरक्षण का मसला एक लंबे अर्से से राजनीतिक कलह का कारण बना हुआ है। यह बेहद दुखद और चिंताजनक है कि हरियाणा में यह सामाजिक सद्भाव के साथ-साथ कानून एवं व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन गया। ऐसी स्थिति के लिए यदि राज्य सरकार की जवाबदेही बनती है तो आरक्षण मांग रहे विभिन्न संगठनों की भी। आरक्षण की मांग कितनी भी जायज हो उसके लिए जोर-जबरदस्ती का सहारा लेने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। मुश्किल यह है कि आरक्षण के मामले में ऐसा ही होता चला आ रहा है। कुछ दिनों पहले आंध्र में कापू समुदाय आरक्षण को लेकर सरकार से टकराव की राह पर था। इसके पहले पटेल गुजरात में और उसके और पहले गुर्जर राजस्थान में। चूंकि आरक्षण का इस्तेमाल राजनीतिक औजार की तरह किया जाने लगा है इसलिए लगता नहीं कि आरक्षण के बहाने की जाने वाली राजनीति पर विराम लगेगा। यह किसी से छिपा नहीं कि मनमोहन सरकार ने लोकसभा चुनावों के पहले किस तरह विभिन्न राज्यों में जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल करते हुए आरक्षण प्रदान कर दिया था। चूंकि यह फैसला चुनावी लाभ की दृष्टि से आनन-फानन किया गया और इस क्रम में तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। इसके बाद से ही अलग-अलग राज्यों में जाट नेता अपने समाज के लिए आरक्षण की मांग को लेकर संबंधित राज्य सरकारों के साथ-साथ केंद्र सरकार पर दबाव बनाने में लगे हुए हैं। 1सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते राज्य सरकारों और केंद्र की अपनी सीमाएं हैं। यदि कोई राज्य सरकार अथवा केंद्र सरकार जाट समुदाय को फिर से अन्य पिछड़ा वर्ग समुदाय में शामिल कर उसे आरक्षण देने की घोषणा कर भी देती है तो ऐसी किसी घोषणा का वही हश्र होगा जो मनमोहन सिंह सरकार की घोषणा का हुआ। इससे इन्कार नहीं कि जाटों एवं ऐसे ही अन्य समूहों की अपनी समस्याएं हैं और उनका समाधान खोजे जाने की जरूरत है, लेकिन मौजूदा हालात में आरक्षण मांग रही जातियों की समस्याओं का समाधान बीच के रास्ते के जरिये ही खोजा जा सकता है। हरियाणा सरकार ने ऐसा ही एक रास्ता तलाशने की कोशिश की थी, लेकिन वह जाट संगठनों को रास नहीं आया। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि हरियाणा में हालात इसलिए बिगड़े, क्योंकि प्रतिस्पर्धी जाट संगठन सरकार पर दबाव बनाने के मामले में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लग गए। रही-सही कसर सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं के अनावश्यक बयानों ने पूरी कर दी। ऐसा लगता है कि शासन और प्रशासन के स्तर पर यह समझने में चूक हुई कि जाट आरक्षण आंदोलन किस दिशा में जा रहा है? चूंकि ऐसे मौकों पर विपक्षी दल राजनीतिक रोटियां सेंकने में कोई कसर नहीं उठा रखते इसलिए हरियाणा में भी यह यह देखने को मिला कि जब सरकार समस्या के समाधान की राह तलाश रही थी तो अन्य राजनीतिक दल उसकी राह में रोड़े खड़े करने का काम कर रहे थे। बेहतर हो कि आरक्षण की मांग कर रहे जाट नेता एवं सत्तापक्ष व विपक्ष समेत सभी दल यह समङों कि यह ऐसा मामला है जिसका समाधान मिल बैठकर ही खोजा जा सकता है।

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