राजनीतिक लिहाज से अहम उत्तर
प्रदेश में इन दिनों चौपाल यानी पंचायत चुनाव की राजनीति सुर्खियों में है। कभी
राजनीति से खुद को अलग रखने वाले दौलतमंद राजनीतिक पकड़ के चलते चौपाल की राजनीति
का हनीमून मना रहे हैं। उत्तर प्रदेश में दौलतमंद और सियासत के रसूखदार मिलकर यह
सब कर रहे हैं। देश भर में पंचायतों की त्रिस्तरीय व्यस्था है। तीन भागों जिला
पंचायत, ब्लॉक और ग्राम पंचायत में विभाजित यह व्यवस्था है। उप्र में तकरीबन 60 हजार ग्राम पंचायत हैं।
निर्वाचित प्रतिनिधि गांव की सरकार चलाते हैं। गांवों और जिला पंचायत के चुनाव हो
चुके हैं। इन चुनावों में किस तरह राजनीतिक रसूखदार और धन्नासेठों ने सीट पर कब्जा
करने के लिए पानी की तरह दौलत लुटाई इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। हालांकि
इसका तथ्यगत प्रमाण देना बेहद मुस्किल है। इस व्यवस्था के कारण चारित्रिक राजनीति
और लोकतंत्र का गला घोटा जा रहा है।
राजनीति का चरित्र गिर रहा है।
जिनके पास पूंजी और राजनीतिक रसूख नहीं हैं वे राजनीति नहीं कर सकते हैं। प्रदेश
में जिला पंचायत सदस्यों की खुले आम बोली लगी। मुंह मांगे उपहार भेंट किए गए, उन्हें सैर कराया गया जीत के
लिए हर सुविधाएं उपलब्ध कराई गई। आज चुनाव के बाद वहीं जिला पंचायत सदस्य लग्जरी
गाड़ियों से उसी जनता के समने धूल उड़ाते निकल रहे हैं जिसके सामने कभी वोट के लिए
हाथ जोड़ते रहे।
आज से 20 साल पूर्व पंचायत पदों का
अपना एक चरित्र रहा। गांव के मुखिया से लेकर पंचायत के बड़े ओहदों पर चरित्रवान और
ईमानदार व्यक्ति पदासीन होते थे। कोई इन चुनावों को जानता भी नहीं था। मुखिया के
पद पर गांव के सभ्रान्त परिवार या व्यक्ति का कब्जा होता था। लेकिन गंगा में अब
बहुत पानी बह चुका है। अब वह बात नहीं रहीं, हालांकि गांव की मूल आत्मा में आज भी परिवर्तन नहीं
आया है।
कल भी उस दौर के जागरुक और
सामाजिक रसूखवालों का दबदबा रहा आज भी वही हो रहा है लेकिन कुछ बदलाव जरूर आए हैं, लोग जागरुक हुए हैं। यह बदलाव
सत्ता के हस्तक्षेप के चलते हुआ है। तब की राजनीति में व्यक्ति का चरित्र और उसका
सामाजिक रसूख काम करता था, लेकिन आज दौलत और सत्ता में पकड़ अहम हो गई है।
व्यक्ति का चरित्र उसकी सादगी और ईमानदारी गौण हो चली है।
आज के संदर्भ में जिसकी लाठी
उसकी राजनीति हो गयी है। लेकिन राजनीतिक जागरूकता का उदय प्रबलता से हुआ है। ग्राम
पंचायत चुनावों में भी धनबल का खुला प्रयोग देखने को मिला। वोटरों को लुभा सत्ता
की कमान हथिया ली गयी। प्रदेश में क्षेत्र पंचायत प्रमुखों के चुनाव की अधिसूचना
जारी हो गयी है। यहां 10 फरवरी को वोटिंग होगी उसी दिन परिणाम आएगा। ब्लॉक
प्रमुखों की कुर्सी हथियाने के लिए जोड़तोड़ की राजनीति चरम पर है। सत्ता से जुड़े
विधायक और मंत्री अपने-अपने करीबियों और चहेतों को प्रमुख के सिंहासन पर विराजमान
कराने के लिए हर गणित लगा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं
इसलिए सपा सरकार इसे एक चुनौती के रूप में ले रहीं है। जिला पंचायत की कुछ सीटों
को छोड़ प्रदेश भर में उसका कब्जा हो चला है। अब प्रमुख सीटों पर भी वह अपना परचम
लहरना चाहती है। ऐसा नहीं है कि यह खेल केवल सपा राज में ही हो रहा है। पूर्ववर्ती
बसपा और दूसरी सरकारों में भी ऐसा हुआ है। आपको याद होगा जब प्रदेश में बसपा की
सरकार बनी थी तो जिला पंचायत की अधिकांश सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार जीते थे, लेकिन सत्ता का दबदबा कुछ और
होता है। बाद में जब सपा की सरकार आयी तो काफी तादाद में पदासीन जिला पंचायत
अध्यक्ष अपदस्थ हुए।
अब जब सपा की सरकार है तो जाहिर
सी बात है उसी के चहेते काबिज होंगे। सरकारों के रसूख के चलते चौपाल के चुनाव की
दशा और दिशा ही बदल गयी है। प्रमुख पदों के लिए बोलिया लग रहीं हैं। धन्नासेठों की
राजनीतिक दिल्लगी से उप्र में चौपाल चुनाव दिलचस्प हो चले हैं। आरक्षित सीटों पर
यह जंग उतनी रोमांचक नहीं जितनी कि सामान्य सीटों पर। इन पर सियासी दबाव और दौलतमंदों
का प्रभुत्व सीधा देखने को मिल रहा है। जिन सीटों पर राजनीतिज्ञों और धन्नासेठों
का मुकाबला है वहां चुनावी मुकाबला रोचक हो गया है। क्षेत्र पंचायत सदस्यों की
ऊंची बोली लग रही है।
प्रदेश के जिस जिले भदोही से मैं
आता हूं, दुनिया में उसका नाम बेहतरीन कालीन उत्पादन के लिए विख्यात है। धार्मधिक
नगरी काशी यानी वाराणसी से यह टूट कर 20 वर्ष पूर्व अलग जिला बना था। यहां भी चौपाल चुनाव
को लेकर बेहद सरगर्मी है। यहां प्रमुख पद की छह सीटें हैं। चार पर समाजवादी सरकार
का कब्जा माना जा रहा है। जबकि दो पर तस्वीर अलग है। एक पर बसपा के पूर्व मंत्री
का बेटा मैदान में है जबकि एक पर रसूखदार सपा विधायक का भतीजा और दूसरी सीटों पर
सपा की मजबूत स्थिति है। हालांकि दौलत का खुला खेल कमोबेस सभी सीटों पर है। लेकिन
एक सीट पर बसपा के पूर्व विधायक के बेटे और एक धन्नासेठ के बीच मुकाबला है, जिसके चलते विधायक की मुश्किल
बढ़ गयी है।
दावों को सच माने तो यहां एक-एक
क्षेत्र पंचायत यानी बीडीसी की कीमत पांच-पांच लाख रुपये लगायी गयी है। माफ कीजिए
धन्नासेठ की ओर से यह जुमला उछाला जा रहा है कि ‘अंडे खरीदने से बेहतर है कि मुर्गी ही खरीदी जाय’ यानी बीडीसी पर पैसा बहाने के
बजाय राजनीतिक आकाआंे पर दौलत लुटाई जाय। इस व्यवस्था के कारण ग्रामीण विकास और
पंचायत की आत्मा मर रहीं है।
गांधी जी की यह बात बेइमानी
साबित दिखती है कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। आज भी देश की 70 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर
है। पंचायत ग्रामीण विकास सपना बेमतलब साबित हो रहा है। बापू की विचारधारा में
गांवों को कुटीर और दूसरे उद्योग के माध्यम से स्वावलंबन बनाने की बात कब की दम
तोड़ चुकी है।
राजनीति से दौलतमन्दों और दबंगों
के लगाव के कारण इसकी परिभाषा बदल गयी है। राजनीति अब पूंजीगत व्यापार हो गया है।
इसके पीछे मूल पैसा ही है। क्योंकि ग्रामीण विकास पर सरकारें अकूत दौलत लुटा रहीं
हैं। लिहाजा इन पदों पर बैठे लोग ठीका, पट्टा और टेण्डर खुद लेते हैं। इस पर कोई अंगुली
उठाने वाला नहीं होता है। जिसका नतीजा होता है इनकी जेबें भरती हैं और आम आदमी का
अधिकार मारा जाता है। जबकि जनता ने जिसे चुना है वह मौन रहता है। क्योंकि उसकी तो
पहले ही बोली लगी होती है दूसरे सियासी दबंगों और रसूखवालो के आगे उसकी लगती नहीं
है। जिसका परिणाम असमान और अनियंत्रित विकास के रूप में देखने को मिलता है।
उप्र में चौपाल की राजनीति एक
कालगर्ल सरीखी हो गयी है। कोई भी राजनीतिक रसूखवाला और धन्नासेठ पैसे लूटा सियासी
पद, प्रतिष्ठा हासिल कर पंचायत की दुल्हन के साथ पांच सालों तक राजनीतिक हनीमून
मना सकता है। सभी जिलों की स्थिति यह नहीं है। लेकिन व्यापकता के आधार पर इसे
नकारा भी नहीं जा सकता है।
देश और प्रदेश की राजनीति में
धन्नासेठों और सियासी दबंगों के कारण जहां ग्रामीण विकास और लोकतंत्र का गला घोटा
जा रहा है वहीं आम आदमी के राजनैतिक अधिकारों का हनन भी हो रहा है, लेकिन फिर भी चौपाल की
राजनीति में बढ़ती दबंगई पर देश की संसद और राज्य विधानसभा मौन है यह असमानता कब
दूर होगी। आम आदमी के अधिकार का मसला संसद की बहस का केन्द्र कब बनेगा? कोई तो बताए

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