राजधानी में चाकुओं से किए गए हमले के बाद घायल किशोर तड़पता रहा, लेकिन
कोई भी उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया। यह घटना दिल्लीवालों की संवेदनहीनता का
जीता-जागता सुबूत है। इससे पता चलता है कि इस शहर के लोगों को इससे कतई मतलब नहीं
है कि उनकी मदद से किसी की जान बच सकती है। सोचने की बात यह है कि ऐसी स्थिति के
लिए कौन जिम्मेदार है? निश्चित तौर पर इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार दिल्ली
पुलिस है, क्योंकि वारदात के बाद जब पुलिस पहुंचती है तो वह सबसे पहले
उन्हीं लोगों से पूछताछ करती है, जो वहां मौजूद होते हैं। कई
बार तो पुलिस मदद करने वाले को ही गुनहगार मानने लगती है और उससे वैसा ही बर्ताव
करती है। बार-बार पुलिस स्टेशन बुलाया जाता है और उन्हें बेवजह परेशान किया जाता
है। यही वजह है कि लोग मदद करने से बेहतर किनारा करना समझते हैं। यह स्थिति किसी
के लिए भी ठीक नहीं है। जरूरत शहर के माहौल को सुधारने की है ताकि लोग बिना किसी
डर के घायलों की मदद के लिए आगे आएं। जब तक ऐसा नहीं होगा इस तरह की घटनाएं होती
रहेंगी और घायल इलाज के लिए तड़पते रहेंगे।1इन सबके बीच सबसे बड़ी बात यह
है कि क्या सिर्फ पुलिस के डर से ही लोग किसी की मदद से परहेज करते हैं। ऐसा नहीं
है। दिल्लीवासियों में सबसे बड़ी
कमी यह भी है कि वे दूसरों से कोई वास्ता नहीं रखना चाहते। राजधानी में सामाजिक
ताना-बाना कुछ इस तरह बिखरा हुआ है कि लोगों का एक-दूसरे से कोई मतलब नहीं रह गया
है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि यहां का जीवन काफी भागदौड़ भरा है। लोगों को आपस
में मिलने-जुलने का मौका ही नहीं मिल पाता है। साथ ही सामाजिक कार्यो में खास रुचि
भी नहीं रही है। ऐसी स्थिति में सुधार करने की जरूरत है। सरकार को चाहिए कि वह
लोगों को एक-दूसरे की मदद के लिए प्रेरित करे। साथ ही वह लोगों को पुलिस को घटना
की जानकारी देने के लिए भी आगे आने को कहे। इसके साथ ही पुलिस को भी चाहिए कि वह
सूचना देने वाले से नरमी से पेश आए और जब तक उसके पास पुख्ता सुबूत न हो उसे
परेशान न करे।
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